संजीवनी टुडे

गांधी के आंदोलन में अखबारों की भूमिका

हृदयनारायण दीक्षित

संजीवनी टुडे 23-03-2019 10:55:36


भारतवासी प्रकृति से शांतिप्रिय हैं। इसके कारण उनकी उदात्त सभ्यता में खोजे जाने चाहिए। शांतिप्रियता उत्कृष्ट जीवन मूल्य भी है। लेकिन अंग्रेजी सत्ता भारत की शांतिप्रियता का गलत लाभ उठाती थी। अंग्रेजीराज में बर्बरता थी। राजनीतिक जागरण बुराई से लड़ने की प्रेरणा देता है। लेकिन भारतीय राजनीति के प्रति उदासीन थे। महात्मा गांधी ने 1895 में ही लिखा था कि 'इस विषय में कोई मतभेद नहीं हो सकता कि भारतीय साधारणतया राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप नहीं करते।

उन्होंने कभी राजनीतिक सत्ता हड़पने का प्रयास नहीं किया। उनका धर्म उन्हें भौतिक प्रवृत्तियों के प्रति उदासीन रहना सिखाता है।' गांधी जी का यह मत भारतीय धर्म पर भी सीधी टिप्पणी है। 'भौतिक प्रवृतियों' से उदासीनता के कारण ही वे कई बार जीते गए। गांधीजी आगे लिखते हैं कि 'जब तक वे इज्जत के साथ आजीविका कमा सकते हैं तब तक उन्हें संतोष रहता है। अगर उनके व्यापार धंधों को कुचलने का प्रयास न किया जाता, उन्हें समाज के अछूतों के दर्जे तक गिराने के प्रयत्न न किए गए होते या उन्हें सदा के लिए लकड़हारे, पनिहारे या गिरिमिटिया या उससे मिलती-जुलती हालत में रखने का प्रयत्न न किया जाता तो आन्दोलन होता ही नहीं।' (1⁄4संपूर्ण गांधी वांग्मय 1.2881⁄2)। 

गांधी की टिप्पणी में अत्याचार से न लड़ने वाली उदासीनता के विरूद्ध आक्रोश है। गांधीजी की यह वेदना अंग्रेजीराज के अफ्रीकी उपनिवेश को लेकर प्रकट हुई थी। यही स्थिति भारत की भी थी। गांधी उदासीन भारतीय मानस को पराक्रमी भारतीय मानस में बदलना चाहते थे। इसलिए विचार परिवर्तन करने वाले साहित्य की आवश्यकता थी। वे भारत के अखबारों में लेख लिखकर लोकमत का संस्कार कर रहे थे। वे अफ्रीकी अखबारों में भी लिखते थे। उनका अपना अखबार 'इण्डियन ओपिनियन' था।

गांधीजी ने इसका अग्रलेख लिखा था। यह इण्डियन ओपिनियन के प्रवेशांक के अंग्रेजी खण्ड में और उसका अनुवाद गुजराती, हिन्दी और तमिल खण्डों में छपा था। गांधीजी के लेख की शुरूआत थी - 'इस समाचार पत्र की जरूरत के बारे में हमारे मन में कोई संदेह नहीं है। भारतीय समाज दक्षिण अफ्रीका के राजकीय शरीर का अंग नहीं है। उसे जीवन्त अंग बनाए रखने के लिए यह पत्र निकाला गया है।

उनकी भावनाओं को प्रकट करने वाले, उनके हित में समाचार पत्र का प्रकाशन अनुचित नहीं समझा जाएगा।' फिर लिखा, 'देश में जो रीति परंपराएं नैतिक मार्गदर्शन द्वारा त्रुटियों का परिमार्जन करती रहती हैं, दक्षिण अफ्रीका में फंसे भारतीय उनके नेतृत्व से वंचित हैं। जो यहां कम उम्र में आ गए या जो यहीं पैदा हुए, उन्हें अपनी मातृभूमि के इतिहास या महानता को जानने का अवसर नहीं मिला। हमारा कर्तव्य होगा कि हम यथाशक्ति इंग्लैण्ड, भारत और इस उपमहाद्वीप के समर्थ लेखकों के लेख देकर उन्हें पूरा करें।' 

गांधीजी ने अखबार का उद्देश्य भारतीय संस्कृति व नैतिकता के तत्वों को पहुंचाना बताया। इस उद्देश्य में प्रत्येक भारतीय पत्रकार के लिए पत्रकारिता का ध्येय है। लेकिन गांधीजी का तात्कालिक उद्देश्य भी था। भारतीय रीति परंपरा के लेख पढ़वाने से परिवर्तन का काम धीमी गति से चलता। गांधी पत्रकारिता के माध्यम से आन्दोलन के मुद्दों के प्रति जनजागरूकता भी चाहते थे। गांधीजी का अखबार कई अर्थों में मार्गदर्शक था। अखबार घाटे में था। घाटे से बचने के लिए छापाखाना वाले मजदूरों को हिस्सेदार बनाया गया।

अखबार लोकतंत्री युद्ध का पैना शस्त्र था। गांधीजी ने लिखा 'मेरी मान्यता है कि जिस लड़ाई का आधार आंतरिक बल हो वह लड़ाई बिना अखबार के नहीं चलाई जा सकती। अनुभव यह भी है कि इण्डियन ओपिनियन होने से हमे कौम को आसानी से शिक्षा दे सकने और संसार में जहां-जहां हिन्दुस्तानी रहते थे, वहां-वहां हमारी हलचलों की खबरें भेजने में आसानी हुई। लड़ाई के साधनों में इण्डियन ओपिनियन भी एक बहुत उपयोगी व सबल साधन था।' गांधी ने अपने ध्येय के लिए आदर्श साधनों पर जोर दिया। प्रतिबद्ध अखबार ऐसा ही उपकरण था।

अखबार लोकमत बनाते हैं। घटनाओं से संसूचित भी करते हैं। निष्पक्ष अखबार की बातें और प्रतिमान बाद के हैं। निष्पक्षता सापेक्ष मूल्य है। जनपक्षधरता भी अपने आप में एक पक्ष है। जनता के हित में आन्दोलन करना स्थापित व्यवस्था के विरूद्ध एक पक्ष है लेकिन आन्दोलन की भागीदारी और उद्देश्य की सही सूचना देना निष्पक्षता है। 'इण्डियन ओपिनियन' आन्दोलनों की सही सूचना देता था। लेकिन आन्दोलन के उद्देश्य भारतीय पक्ष के पैरोकार थे। गांधीजी ने अखबारों की ध्येय सेविता को भारतीयता से जोड़ा था।

लगभग सवा सौ वर्ष पहले दक्षिण अफ्रीका में बिना विज्ञापन चलने वाले इस अखबार की मांग लगातार बढ़ रही थी। भारत के आधुनिक अखबारों को बिना विज्ञापन चलाना असंभव है। इण्डियन ओपिनियन ग्राहकों के दम पर चलता था। संप्रति भारी प्रसार संख्या व बिक्री के बावजूद अखबार चलाना मुश्किल है। अखबार का लागत मूल्य बढ़ा है। स्वाधीनता संग्राम के दौर में अखबारों में छपी सामग्री पर आम जनता का विश्वास था। अब अखबारों के प्रति वैसा जनविश्वास नहीं है। पेड न्यूज के चलन से भी यह भरोसा टूटा है। कारण और भी हैं।

आमजन का शिक्षण राष्ट्रीय कर्तव्य है। लोक शिक्षण प्रत्येक राजनीतिक दल व कार्यकर्ता का भी दायित्व है। शिक्षित और जागरूक लोकमत से ही जनतंत्र स्वस्थ होता है। सभी समाचार पत्रों को भी लोकमत का परिष्कार और संस्कार करना चाहिए। समाज में बहुत कुछ अच्छा भी घटता है। समाचार पत्रों में उसे महत्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए। इससे समाज प्रेरित होता है। आशावाद भी बढ़ता है।

बुराई के ज्यादा चित्रण से समाज में निराशा बढ़ती है। निराश समाज यथास्थितिवादी हो जाते हैं। वे बुरे से लड़ने की तैयारी नहीं करते। वे बुराई को जस का तस स्वीकार कर लेते हैं। गांधीजी की 'हिन्द स्वराज' पहले 'इण्डियन ओपिनियन' में छपी थी। इसने बड़े पैमाने पर भारत का स्वाभिमान जगाया। ब्रिटिश सत्ता, सभ्यता व साम्राज्यवाद से लड़ने का साहस भी बढ़ाया था। आमजनों का सामाजिक पुनर्जागरण कठिन काम है। 

 

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