संजीवनी टुडे

पथिक जी के बलिदान को पलीता लगाता राजस्थान आन्दोलन: डाॅ.राकेश राणा

संजीवनी टुडे 11-02-2019 15:55:57


राजस्थान अपनी सौम्यता, सभ्यता और अहिंसक सहिष्णु छवि के कारण देश-विदेश सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। ’पधारो म्हारे देश’ जगह-जगह लिखा मिल जायेगा। उस प्रदेश के वासी रोज कभी सड़कें रोकें तो कभी रेल का चक्का जाम करें। यह उस समाज की संस्कृति और राजनीति को एक दूसरे के बरक्स खड़ा करता है। कई सवाल भी खड़ा करता है। क्या राजस्थान की राजनीतिक संस्कृति इतनी बंजर हो गई कि वहां राजनीतिक गतिविधियां ठूंठ तौर-तरीकों और वैचारिक अकाल का ग्रास बन रही हैं? राजस्थान का गुर्जर आरक्षण संघर्ष क्या स्वतंत्रता संघर्ष के योद्धा विजय सिंह पथिक की परम्परा से कुछ सीख ले पाया। 

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राजपूताना को सर्वप्रथम राजस्थान नाम देने वाले विजय सिंह पथिक संयोग से उसी गुर्जर समुदाय से आते हैं जो पिछले डेढ़ दशक से आरक्षण के लिए संघर्षरत है। क्या पथिक के उन प्रेरक प्रसंगों को इतनी जल्दी भूल गया राजस्थान, जो लोकतंत्र को शक्तिशाली राजे-रजवाड़ों की छाती पर स्थापित कर गया। गरीबों, ग्रामीणों और वंचितों को सत्ता से लोहा लेने के ऐसे हथियार थमा गया, जिसने राजस्थान के राजतंत्र सहित देश से ब्रिटिश हुकुमत को उखाड़ फेंका। गांधी को भी जिसे असली सत्याग्रही कहना पड़ा। 

आज पथिक का वही राजस्थान और उनका समुदाय हिंसा जैसे ठूठ हथियारों को लेकर अपने हक-अधिकारों को पाने निकला है। ये विरोधाभास पथिक के प्रदेश में कई तरह की शंकाओं को जन्म देते हैं। क्या राजस्थान का गुर्जर समुदाय राजनीतिक नेतृत्व के संकट और षड्यंत्र का शिकार हो गया है? क्या किसी समुदाय में राजनीतिक परिपक्वता का इतना अभाव हो सकता है कि उसका नेतृत्व जब चाहे अपने स्वार्थों के लिए उसे सड़कों पर उतार दे? क्या 21 वीं सदी में कबिलाई कल्चर किसी समुदाय को इतनी ऊर्जा दे सकती है कि 72 लोग राज्य द्वारा मार दिये जायं और उन्हीं पुनरावृत्तियों के लिए उत्सर्ग को तैयार रहे? 

जरुर आरक्षण का यह संघर्ष किसी कबिलाई नेता के जाल में फंस गया हैं जिसे सरकारें अपने इशारों पर संचालित करने में सफल रही है। राजस्थान का गुर्जर समुदाय अपनी कबिलाई छवि का लाभ सरकारी सुविधाएं लेने में करना चाहता है तो उन विरोधाभासों और आग्रहों का क्या होगा जो वह अपने समृद्ध इतिहास में संजोये बैठा है। क्या पथिक जी की परम्परा औॅर नेतृत्व शैली एक अदद नेता भी उसके समुदाय को नहीं दे पा रही, जिसने बेगू और बिजौलिया जैसे बड़े आन्दोलनों को नेतृत्व दिया हो। 

’’पथिकजी के आह्वान पर बिजोलिया के किसानों ने युद्ध का चन्दा देने से इन्कार कर दिया। पथिक जी छिपे हुए और साधु सीताराम दास और प्रेमचन्द भील प्रकट रुप से चन्दा न देने का प्रचार करते थे। प्रेमचन्द भील स्वयं भजन बनाते और उन्हें गाकर किसानों का इस सत्याग्रह के लिए उद्बोधन करते। पथिकजी ने उसी समय गणेश शंकर विद्यार्थी को लिखा कि वे बिजोलिया सत्याग्रह चला रहे हैं। उनके प्रसिद्ध पत्र प्रताप की सहायता की आन्दोलन को अत्यन्त आवश्यकता है। साथ में बिजोलिया के किसानों की ओर से उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी को राखी भेजी। 

प्रताप के यशस्वी संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने उत्तर दिया कि बिजोलिया आन्दोलन के लिए प्रताप के पृष्ठ सदैव खुले रहेंगे, आप निश्चिन्त रहिए। अब प्रताप के द्वारा बिजोलिया आन्दोलन का प्रचार देश भर में होने लगा। समस्त देश का ध्यान उस ओर आकर्षित हुआ। 

पथिक जी की जीवनी से लिया यह उद्धहरण आरक्षण आन्दोलन के नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर पूछ रहा है कि लोकतांत्रिक परम्पराओं की होली जलाकर अपने स्वार्थों के उत्सव मनाने का अधिकार आपको किसने दिया। भोले-भाले-अनपढ़-गरीब गुर्जर समुदाय का इस्तेमाल राजनीतिक दलों के इशारे पर कच्चे माल की तरह पिछले 15 वर्षों से राजस्थान में गुर्जर अभिजन वर्ग कर रहा है। 

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का धनाढ्य गुर्जर आंदोलन में केन्द्रीय भूमिका में है। वे ही राजस्थान में जाकर विधायक/सांसद बने हैं। आरक्षण संघर्ष समिति के लीडर इसमें डीलर की भूमिका में हैं। क्या कभी राज्य ने इन पेचीदगियों की पड़ताल करने की जहमत उठायी। क्या राज्य किसी समुदाय को इसी तरह मरने-मारने के लिए अपरिपक्व नेतृत्व के भरोसे छोड़े रखेगा? 

क्या यह राजनीतिक साजिशों से अनभिज्ञ सरल, शिक्षा से वंचित गुर्जर समुदाय के लोगों के अधिकारों का यह हनन नहीं है? जो इमोश्नल ब्लैकमेकिंग इन पिछड़े समुदायों के साथ लोकतंत्र के नाम पर हो रही है, क्या इसकी जवाबदेही मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में कहीं है? क्या समुदायों की वंचनाएं पढ़े लिखे चालाक लोगों को सत्ता तक पहुचाने का जरिया इसी तरह बनती रहेगी? 

गुर्जर समुदाय के लिए आरक्षण का यह संघर्ष किसी नेतृत्व को पैदा करता तो जरूर पिछले पन्द्रह वर्षोंं में यह एक सुव्यवस्थित आन्दोलन बना होता, किसी वैचारिकी का प्रस्फुटन हुआ होता। चूंकि यह तो नेताओं द्वारा खड़ा किया गया छदम् आन्दोलन है, एक रिटायर्ड आर्मी अधिकारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षओं में मथकर। जिन्हें देश के राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं। समुदाय का अपरिपक्व नेतृत्व अपने ही समाज का शोषण, दमन और उत्पीड़न करा रहा है, अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए। 

सवाल गंभीर है कि राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे एक समुदाय को कैसे बार-बार शिकार होने से बचाया जाय? शिकारी का लालच भी ऐसा है, जिसे छोड़ना आसान नही है। राजस्थान के गुर्जर आरक्षण आन्दोलन को परिपक्व काबिल राजनीतिक नेतृत्व खोजना होगा। पथिक परम्परा इसके लिए पथ-प्रशस्थ करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। 

सामाजिक महत्व के आन्दोलनों को अहिंसक ढंग से कैसे जन आन्दोलन बनाया जाय, इसकी प्रेरणा पथिक प्रसंगों से प्रेरित नेतृत्व ही दे सकता है। आन्दोलनों के प्रबंधन और कुशल संचालन की कार्यशैली राजस्थान के बिजौलिया और बेगू के आन्दोलनों से बेहतर कहां होगी। 

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कैसे देशभर का समर्थन महत्वपूर्ण मुददों पर लिया जाता है, कैसे सामाजिक मांगों के लिए अहिंसक वातावरण में जनमत निर्माण की प्रक्रिया सामाजिक सहयोग से चलाई जाती है, सामाजिक आन्दोलनों से निकले रचनात्मक कार्यक्रमों से कैेसे सामाजिक बुराइयों पर प्रहार धीरे से किये जाते है और बड़े सामाजिक परिवर्तन दर्ज किये जाते हैं, यह सब विजय सिंह पथिक के जीवन दर्शन से ही हम सीख सकते हैं। 

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