संजीवनी टुडे

लोकतंत्र में नेता की योग्यता पर सवाल

हर्ष शर्मा

संजीवनी टुडे 17-09-2019 14:52:30

आजादी के बाद हमारे देश भारत ने दुनिया की सबसे अच्छी लोकतंत्रात्मक प्रणाली को चुना। हमारे संविधान निर्माताओं को विश्वास था की लोकतंत्र के रास्ते पर चलकर देश को प्रगति और विकास की ऊंचाइयों पर पहुँचाया जा सकता है साथ ही गाँधी के रामराज्य का सपना साकार किया जा सकता है। आजादी के 73 वर्षों बाद हम अपने लोकतंत्र पर निगाह डालें तो देखेंगे जिन्हें हमने अपना रहनुमा चुना उन्होंने ही देश को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


आजादी के बाद हमारे देश भारत ने दुनिया की सबसे अच्छी लोकतंत्रात्मक प्रणाली को चुना। हमारे संविधान निर्माताओं को विश्वास था की लोकतंत्र के रास्ते पर चलकर देश को प्रगति और विकास की ऊंचाइयों पर पहुँचाया जा सकता है साथ ही गाँधी के रामराज्य का सपना साकार किया जा सकता है। आजादी के 73 वर्षों बाद हम अपने लोकतंत्र पर निगाह डालें तो देखेंगे जिन्हें हमने अपना रहनुमा चुना उन्होंने ही देश को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।   

नेता लोगों का चेहरा होते हैं जो आम आदमी की मुखर आवाज का  प्रतिनिधित्व करते हैं। वे संसद में निर्वाचित होकर नागरिकों की समस्याओं को उठाते हैं। इनमें से ही चुनकर राज्य और केंद्र सरकार में मंत्री नियुक्त होते है। फिर शासन प्रशासन में लोक कल्याणकारी योजनाओं को अमली जमा पहनाने के साथ लोगों के सुख दुःख में भागीदारी निभाते है।

एक आईएएस अधिकारी को दुनिया की सबसे कठिन परीक्षा में से गुजरना पड़ता है। आईएएस, आईपीएस या किसी अन्य संगठन को नियंत्रित करने वाले राजनेताओं को किसी योग्यता से नहीं गुजरना होता है। भारत के लोकतंत्र ने नेताओं को असीम अधिकार प्रदान किये है। वे बिना किसी शैक्षणिक योग्यता के देश के भाग्य विधाता बन सकते है। 

इस देश में बहुसंख्यक राजनेता आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं लेकिन फिर भी सत्ता में हैं लेकिन अगर एक आम आदमी पुलिस या सेना की सेवा में शामिल होना चाहता हैं तो उन्हें पुलिस सत्यापन की आवश्यकता होती है और यदि वे भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप का सामना कर रहे हैं तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।

हमें यह कहते हुए बहुत गर्व होता है कि, हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हम लोकतंत्र के संकट के युग में जी रहे हैं।  हमारा मीडिया भी सत्ता के गुणगान में अव्वल रहता है। आज हम लिंचिंग, बलात्कार, छेड़छाड़ आदि की खबरें सुनते हैं। खबरिया चैनलों में समाजोपयोगी  कोई बहस नहीं देखि जाती सिवाय हल्ला गुल्ले के।  यदि आप अपने टीवी को चालू करते हैं तो आपको केवल हिंदू बनाम मुस्लिम, भारत बनाम पाकिस्तान दिखाई देगा, वहाँ गरीबी, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था की मंदी के बारे में चर्चा एक दो दिन से ज्यादा दिखाई नहीं देती है।

अमेरिका दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है और हमें यह सीखने की जरूरत है कि वे चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों का चयन कैसे करते हैं, उनका मीडिया स्वतंत्र है, वे सार्वजनिक रूप से राजनेताओं से सभी प्रश्न स्वतंत्र रूप से पूछ सकते हैं, इसलिए बड़ी रैलियां करने और करोड़ों का पैसा लगाने के बजाय वे आमने सामने देश को बेहतर बनाने के मुद्दों पर बहस करते है। इससे वे अपने एजेंडा को और अधिक कुशलता से व्यक्त कर पाते है, यदि आप हमारे देश में रैलियों को देखते हैं, तो आप केवल जुमलों के अलावा कुछ और नहीं नजर आयेगा।

लगता है हमारे संविधान निर्माताओं ने देश में लोकतंत्र का जो सपना देखा है वह उनकी आकांशाओं के अनुरूप नहीं है। भारतीय लोकतंत्र उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है।  ऐसे में युवा शक्ति को गाँधी के भारत के सपने को साकार करने के लिए मजबूती से अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।

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