संजीवनी टुडे

प्रधानमंत्री की पहल का स्वागत करना चाहिए

-आशीष वशिष्ठ

संजीवनी टुडे 16-06-2019 14:01:07

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के ग्राम प्रधानों और मुखियाओं को निजी तौर पर पत्र लिखकर ज्यादा से ज्यादा वर्षा जल संग्रहित करने की अपील की है। ये शायद पहला ऐसा मौका होगा जब किसी प्रधानमंत्री ने देशभर के ग्राम प्रधानों को किसी प्रधानमंत्री ने जल सरंक्षण के लिये पत्र लिखा है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के ग्राम प्रधानों और मुखियाओं को निजी तौर पर पत्र लिखकर ज्यादा से ज्यादा वर्षा जल संग्रहित करने की अपील की है। ये शायद पहला ऐसा मौका होगा जब किसी प्रधानमंत्री ने देशभर के ग्राम प्रधानों को किसी प्रधानमंत्री ने जल सरंक्षण के लिये पत्र लिखा है।  असल में संरक्षण के अभाव में वर्षा से प्राप्त जल या तो बहकर बेकार चला जाता है या फिर वाष्पीकरण से खत्म हो जाता है। हमारे देश में वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती है, फिर भी हम लोग पानी का संकट झेलते हैं। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया के लगभग 1.4 अरब लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। 

पिछले साल नीति आयोग द्वारा जारी ‘समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (सीडब्ल्यूएमआई)’ रिपोर्ट के अनुसार देश में करीब 60 करोड़ लोग पानी की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। करीब दो लाख लोग स्वच्छ पानी न मिलने के चलते हर साल जान गंवा देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ‘2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण की दोगुनी हो जाएगी। जिसका मतलब है कि करोड़ों लोगों के लिए पानी का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा और देश की जीडीपी में छह प्रतिशत की कमी देखी जाएगी।’ स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा जुटाए डाटा का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि करीब 70 प्रतिशत प्रदूषित पानी के साथ भारत जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में 120वें पायदान पर है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक स्थितियां अलग हैं। भारत में वर्षा के मौसम में एक क्षेत्र में बाढ़ के हालात होते हैं, जबकि वहीं दूसरे क्षेत्रों में भयंकर सूखे की स्थिति होती है। कई क्षेत्रों में पर्याप्त बारिश के बावजूद लोग पानी की एक-एक बूंद के लिये तरसते हैं तथा कई जगह संघर्ष की स्थिति भी पैदा हो जाती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि हमने प्रकृति प्रदत्त अनमोल वर्षा जल का संचय नहीं करते हैं और वह बेकार में बहकर में बहकर दूषित जल बन जाता है। वास्तव में प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हमारी सोच यह रही है कि ये कभी खत्म नहीं होंगे। पानी के बारे में भी हम यही सोचते हैं। परन्तु पानी के लगातार हो रहे अत्यधिक दोहन से भूजल भण्डार खाली होने की कगार पर हैं। गांवों और शहरों में भूजल स्तर निरन्तर नीचे खिसक कर खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। यदि यही स्थिति रही तो जल्दी ही धरती भूगर्भीय जल भण्डारों से खाली हो जाएगी। अतः अब समय आ गया है कि हम जितना पानी धरती से लेते हैं उतना ही पानी धरती को किसी-न-किसी रूप में लौटाएं। इसका सबसे सरल उपाय रेनवाटर हार्वेस्टिंग से ही सम्भव है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग-अर्थात् वर्षा जल का संचय एवं संग्रह करके इसका समुचित प्रबन्धन एवं जरूरत के अनुसार सप्लाई।

वर्षा जल संरक्षण का इतिहास काफी पुराना है। इतिहास के पन्ने पलटे तो हमारे देश में प्राचीन काल से ही जल संचय की समृद्ध परम्परा विद्यमान रही है। विश्व विरासत में सम्मिलित जार्डन के पेट्रा में की गई पुरातात्विक खुदाई में ईसा पूर्व सातवीं सदी में बनाए गए ऐसे हौज निकले जिनका इस्तेमाल वर्षा जल को एकत्र करने में किया जाता था। इसी प्रकार श्रीलंका स्थित सिजिरिया में बारिश के पानी को एकत्र करने के लिये राॅक कैचमेंट सिस्टम बना हुआ था। यह सिस्टम ईसा पूर्व 425 में बनाया गया था। इसे भी विश्व विरासत में शामिल किया गया है। भारत में राजस्थान प्रदेश के थार क्षेत्र में साढे चार हजार वर्ष पूर्व बारिश के पानी को एकत्र करने के प्रमाण हड़प्पा में की गई खुदाई के दौरान पाए गए हैं।

प्राचीन भारत में वर्षा जल का संग्रहण करने के लिये तमाम उपाय अपनाये जाते थे। परिणामस्वरूप कुएं, बावड़ी, तालाब, नदियां आदि पानी से लबालब भरे रहते थे। नतीजतन भूजल का स्तर भी ऊपर हो जाता था तथा सभी जलस्रोत सालभर के लिये रिचार्ज हो जाते थे। परन्तु मानवीय उपेक्षा, लापरवाही, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण तमाम परंपरागत जलस्रोत लुप्त हो चुके हैं। गांवों और शहरों में जलस्रोतों पर अवैद्य कब्जे हो चुके हैं। मिट्टी और गाद भर जाने से इन प्राकृतिक जलस्रोतों की जल ग्रहण क्षमता खत्म हो गई है। अभी भी समय है कि इनमें से कई परम्परागत जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करके उन्हें बचाया जा सकता है। इजराइल, सिंगापुर, चीन, आस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग पर काफी समय से काम हो रहा है। अब समय आ चुका है जबकि भारत में भी इस तकनीक को अनिवार्यतः लागू करने के लिये जन-जागरण को प्रोत्साहन दिया जाये।

भारत में औसत वर्षा 125 सेंटीमीटर होती है। मानसून की प्रकृति के वजह से प्रतिवर्ष, वर्षा की दर में हमेशा परिवर्तन होता रहता है। वहीं क्लाइमेट चेंज की वजह से वर्षा प्रभावित हो रही है। कम समय में अधिक तीव्रता से हो जानेवाली बारिश से भू गर्भ जल का पुनर्भरण एवं जल क्षेत्रों में सतही जल का संचयन नहीं हो पा रहा है। साथ ही जलग्रहण क्षेत्र, कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण हो गया है। उसमें बारिश के पानी जाने के अधिकतर रास्ते बंद हो गये है। आंकड़ों के मुताबिक 60-65 प्रतिशत घरेलू उपयोग भू गर्भ जल पर ही निर्भर है। शहर दोहरी समस्या से जूझ रहे हैं। शहर कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे हैं। इससे भू-गर्भ जल के पुनर्भरण के रास्ते भी बंद हो रहे हैं। जिस अनुपात में जमीन के अंदर से पानी निकाला जा रहा है, उसी अनुपात में उसका पुनर्भरण नहीं हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में नेचुरल रिचार्ज पिट हैं, लेकिन समय के साथ वो भी खत्म होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। 

रेन वाटर हार्वेस्टिंग से भू-गर्भ जल का पुनर्भरण अर्थात दोबारा भरा जाता है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग अत्यन्त आसान तकनीक है। इसके अन्तर्गत वर्षा जल को व्यर्थ बहने से रोककर इसे नालियों, पाइप लाइनों के माध्यम से इस प्रकार संग्रहीत किया जाता है ताकि इसका उपयोग फिर से किया जा सके। भूजल भण्डारों में वर्षा जल के द्वारा भण्डारण बढ़ाया जा सकता है। भू-गर्भ जल भंडार में वृद्धि होती है और जल स्तर के गिरावट पर रोक लगता है। भू-गर्भ जल की गुणवक्ता में सुधार होता है। इस पूरी प्रक्रिया में प्रकृति एवं पर्यावरण का हित है क्योंकि जमीन के भीतर जो पानी संचित किया जाएगा उसका इस्तेमाल हम भविष्य में कर सकेंगे। दूसरे शब्दों में हमने जो प्रकृति से लिया है वह प्रकृति को ही वापस लौटाना भी है। वर्तमान जलसंकट में यह न केवल जरूरी है, बल्कि बेहद सस्ता व फायदेमन्द भी है।

विश्व के अन्य देशों के मुकाबले हमारे देश में पानी की उतनी कमी नहीं है। हमारे यहां पानी के नियोजन की कमी है। पानी की बचत करना और बेहतर जल प्रबंधन कुछ ऐसे काम हैं जिनसे जल संकट से आसानी से निपटा जा सकता है। वर्तमान जल संकट को दूर करने के लिये वर्षा जल संचय ही बेहतर विकल्प है। यदि वर्षा जल के संग्रहण की समुचित व्यवस्था हो तो न केवल जल संकट से जूझते शहर और गांव अपनी तत्कालीन जरूरतों के लिये पानी जुटा पाएंगे बल्कि इससे भूजल भी रिचार्ज हो सकेगा। अतः जल प्रबन्धन में वर्षा जल की हर बूंद को सहेजकर रखना जरूरी है। वर्षा जल की कोई भी बूंद बेकार जाए, इसके लिए संसाधन विकसित करने होंगे। जल संकट से निपटने का ये सबसे सस्ता और सरल उपाय भी है। सही मायने में प्रधानमंत्री की इस पहल का बढ़-चढ़कर स्वागत करना चाहिए। वास्तव में, वर्षा जल संरक्षण से ही हमारा आज और कल सुरक्षित होगा।

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