संजीवनी टुडे

सुरक्षा परिषद् की जरूरत पर सवाल: प्रमोद भार्गव

संजीवनी टुडे 17-03-2019 14:37:29


संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार और विस्तार की मांग कई मौकों पर उठाई जाती है। यह सवाल अब ज्यादा अहम है क्योंकि चीन ने हठधर्मिता अपनाते हुए जिस तरह जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में शामिल कराने के प्रयासों पर अड़ंगा लगाया है, उससे साफ है कि संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद् सक्षम नहीं रह गए हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर ये शक्तिशाली देशों की बात ही क्यों सुनती है। 

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चीन ने जिस तरह से भारत की इच्छा के ख़िलाफ़ वीटो का इस्तेमाल किया, उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है। उसने चौथी बार यही किया है। इसबार चीन का रुख़ बदलने की उम्मीद इसलिए थी क्योंकि अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की ओर से पेश किया गया था। जर्मनी और जापान समेत विश्व जनमत इसके पक्ष में था। इसके बावजूद कामयाबी नहीं मिली तो इस बात को बल मिलता है कि इस वैश्विक संगठन का महत्व कम हो रहा है। 

चीन ने वीटो का इस्तेमाल करते हुए तकनीकी कारणों का हवाला दिया है। उसने प्रस्ताव की पड़ताल के लिए थोड़ा समय और मांगा है। अब यह तकनीक छह माह के लिए बाध्यकारी है। इसके बाद तीन माह का समय और बढ़ाया जा सकता है। चीन का यह रवैया तब है, जब चीन खुद शियामेन ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणा पत्र में आतंकवाद के सभी स्वरूप व प्रकारों की निंदा कर चुका है। 

चीन के इस प्रस्ताव में जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकी संगठन शामिल थे। तब चीन की इस निंदा को भारत की सफल कूटनीति के परिप्रेक्ष्य में देखा गया था। बावजूद चीन ने जिस तरह से अजहर का पक्ष लिया है, उससे साफ है कि वह इस मुद्दे पर दोहरा रुख अपना रहा है। 

दरअसल, पाकिस्तान से जुड़े चीन के अपने हित हैं। वह 14.5 अरब डाॅलर खर्च करके चीन-पाक आर्थिक गलियारा और वन बेल्ट, वन रोड जैसी बड़ी परियोजनाएं पाक व पीओके की धरती पर उतार रहा है। इन्हें अमल में लाने के लिए चीन के हजारों कर्मचारी पाकिस्तान में काम कर रहे हैं। चीन अच्छी तरह से जानता है कि पाक के शासन-प्रशासन पर कट्टरपंथियों का बोलबाला है। 

नतीजतन, मसूद अजहर जैसे क्रूर आतंकी से दुश्मनी मोल लेता है तो उसके कर्मचारियों को इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। बावजूद चीन के रुख पर अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर चीन इसी तरह आतंकी संगठनों और सरगनाओं को प्रोत्साहित करता रहा तो सुरक्षा परिषद् के शेष सदस्यों को नए कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। अमेरिका की यह पहल इशारा करती है कि संयुक्त राष्ट्र का औचित्य अप्रासंगिक हो रहा है। लिहाजा, इसका पुनर्गठन जरूरी है।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शांति प्रिय संगठन के रूप में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का गठन हुआ था। इसका मुख्य मकसद दुनिया की भविष्य की पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से सुरक्षित रखना था। इसके सदस्य देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन को स्थायी सदस्यता प्राप्त है। याद रहे चीन जवाहरलाल नेहरू की अनुकंपा से ही सुरक्षा परिषद् का सदस्य बना था। जबकि उस समय अमेरिका ने सुझाया था कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लिया जाए और भारत को सुरक्षा परिषद् की सदस्यता दी जाए। 

हालांकि अपने उद्देश्य में परिषद् को पूरी सफलता नहीं मिली। पाकिस्तान से दो बार और चीन के साथ एकबार भारत का युद्ध हो चुका है। इराक और अफगानिस्तान, अमेरिका और रूस के जबरन दखल के चलते युद्ध की ऐसी विभीषिका के शिकार हुए कि आजतक उबर नहीं पाए हैं। इजराइल-फिलिस्तीन के बीच युद्ध एक नहीं टूटने वाली कड़ी बन गया है। अनेक इस्लामिक देश गृह कलह से जूझ रहे हैं। उत्तर कोरिया और पाकिस्तान खुले और छिपे तौर पर परमाणु युद्ध की धमकी देते रहते हैं। 

साम्राज्यवादी नीतियों के क्रियान्वयन में लगा चीन किसी वैश्विक पंचायत का आदेश नहीं मानता। इसका ताजा उदाहरण अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने पर चीन का वीटो लगाना है। दुनिया के सभी शक्ति संपन्न देश व्यापक मारक क्षमता के हथियारों के निर्माण और भंडारण में लगे हैं। इन तमाम तथ्यों के बावजूद सुरक्षा परिषद् की भूमिका वैश्विक संगठन होने की दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि उसके एजेंडे में प्रतिबंध लागू करने और संघर्ष की स्थिति में सैनिक कार्रवाई की अनुमति देने के अधिकार शामिल हैं। इस नाते उसकी मूल कार्यपद्धति में शक्ति संतुलन बनाए रखने की भावना अंतनिर्हित है।

1945 में परिषद् के अस्तित्व में आने से लेकर अबतक दुनिया बड़े परिवर्तनों की वाहक बन चुकी है। इसीलिए भारत लंबे समय से परिषद् के पुनर्गठन का प्रश्न परिषद् की बैठकों में उठाता रहा है। कालांतर में इसका प्रभाव यह पड़ा कि संयुक्त राष्ट्र के अन्य सदस्य देश भी इस प्रश्न की कड़ी के साझेदार बनते चले गए। परिषद् के स्थायी व वीटोधारी देशों में अमेरिका, रूस और ब्रिटेन भी इस प्रश्न के समर्थन में अपना मौखिक समर्थन देते रहे हैं। 

संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से दो तिहाई से भी अधिक देशों ने 2015 में सुधार और विस्तार के लिखित प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस मंजूरी के चलते अब यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे का अहम मुद्दा बन गया है। यह मसला परिषद् में सुधार की मांग करने वाले भारत जैसे चंद देशों का मुद्दा न रहकर महासभा के सदस्य देशों की सामूहिक कार्यसूची का प्रश्न बन गया है। 

अमेरिका ने शायद इसी पुनर्गठन के मुद्दे का ध्यान रखते हुए सुरक्षा परिषद् में नई पहल के संकेत दिए हैं। यदि पुनर्गठन होता है तो सुरक्षा परिषद् के प्रतिनिधित्व को समतामूलक बनाए जाने की उम्मीद बढ़ जाएगी। इस मकसद की पूर्ति के लिए परिषद् के सदस्य देशों में से नए स्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ानी होगी। यह संख्या बढ़ती है तो परिषद् की असमानता दूर होने की संभावना स्वतः बढ़ जाएगी।

परिषद् की 69वीं महासभा में इन प्रस्तावों का शामिल होना, बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि तो था लेकिन परिणाम भारत और इसमें बदलाव की अपेक्षा रखने वाले देशों के पक्ष में आएंगे ही, इसमें संदेह है। असमानता दूर करने के लिए उचित प्रतिनिधित्व हेतु सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से जुड़े मामलों पर लंबी चर्चा होगी। इस सभा में बहुमत से पारित होने वाली सहमतियों के आधार पर अंतिम अभिलेख की रूपरेखा तैयार होगी। किंतु यह जरूरी नहीं कि यह अभिलेख किसी देश की इच्छाओं के अनुरूप ही हो। 

क्योंकि इसमें बहुमत से भी लाए गए प्रस्तावों को खारिज करने का अधिकार पी-5 देशों को है। ये देश किसी प्रस्ताव को खारिज कर देते हैं तो यथास्थिति और टकराव बरकरार रहेंगे। साथ ही यदि किसी नए देश को सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता मिल भी जाती है तो यह प्रश्न कायम रहेगा कि उन्हें वीटो की शक्ति दी जाती है अथवा नहीं? इसलिए भारत के लिए फिलहाल यह प्रश्न अनुत्तरित है कि उसके लिए प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय संस्था में स्थायी सदस्यता पाने का रास्ता खुल जाएगा।

हालांकि भारत कई दृष्टि से न केवल सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता की हैसियत रखता है, बल्कि वीटो शक्ति हासिल करने की पात्रता भी उसमें है। क्योंकि वह दुनिया का सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश है। सवा अरब की आबादी वाले देश भारत में अनेक अल्पसंख्यक धर्मावलंबियों को वही संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं जो बहुसंख्यक हिंदुओं को मिले हैं। भारत ने साम्राज्यवादी मंशा के दृष्टिगत कभी किसी दूसरे देश की सीमा का अतिक्रमण नहीं किया। 

जबकि चीन ने तिब्बत पर तो अतिक्रमण किया ही, तिब्बतियों की नस्लीय पहचान मिटाने में भी लगा है। यही हरकत वह चीन में रह रहे दस लाख उईगर मुसलमानों के साथ कर रहा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भी अहम भूमिका निभाई है। बावजूद सुरक्षा परिषद् की सदस्यता हासिल करने में बाधा बनी पेंच अपनी जगह बने हुए हैं। दरअसल पी-5 देश यह कतई नहीं चाहते कि जी-4 देश सुरक्षा परिषद् में शामिल हो जाएं। जी-4 देशों में भारत, जापान, ब्राजील और जर्मनी शामिल हैं। 

यही चार वे देश हैं, जो सुरक्षा परिषद् में शामिल होने की सभी पात्रता रखते हैं। किंतु परस्पर हितों के टकराव के चलते चीन यह कतई नहीं चाहता कि भारत और जापान को सदस्यता मिले। क्योंकि दक्षिण एशिया में वह अकेला ताकतवर देश बने रहना चाहता है। ब्रिटेन और फ्रांस, जर्मनी के प्रतिद्वंद्वी देश हैं। जर्मनी को सदस्यता मिलने में यही रोड़े अटकाने का काम करते हैं। 

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महाद्वीपीय प्रतिद्वंद्विता भी अपनी जगह कायम है। यानी एशिया में भारत का प्रतिद्वंद्वी चीन है। लातीनी अमेरिका से ब्राजील, मैक्सिको और अर्जेन्टीना सदस्यता के लिए प्रयासरत हैं। तो अफ्रीका से दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया जोर आजमाइश में लगे हैं। जाहिर है कि परिषद् का पुनर्गठन होता भी है तो भारत जैसे देशों को बड़े पैमाने पर अपने पक्ष में प्रबल दावेदारी तो करनी ही होगी, बेहतर कूटनीति का परिचय भी देना होगा। सुरक्षा परिषद् का पुनर्गठन होता है तो पी-5 देशों की शक्ति के विभाजन का द्वार खुल जाएगा। इस शक्ति के विभाजन से दुनिया के अधिक लोकतांत्रिक होने की उम्मीदें बढ़ जाएंगी।

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