संजीवनी टुडे

भ्रष्ट नौकरशाही पर लगाम जरूरी: प्रमोद भार्गव

संजीवनी टुडे 14-06-2019 12:42:01

आजादी के बाद भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सबसे बड़ी कार्यवाही को अंजाम नरेंद्र मोदी सरकार ने दिया है। आयकर विभाग के मुख्य आयुक्त श्रेणी के 12 भ्रष्ट अधिकारियों की सेवाएं समाप्त कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। जिस दिन इन्हें नौकरी से निकाला जा रहा था, उसी दिन प्रधानमंत्री मोदी देश के शीर्ष अधिकारियों से सीधा संवाद कर गतिशील बनाए रखने के दिशा-निर्देश दे रहे थे।


आजादी के बाद भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सबसे बड़ी कार्यवाही को अंजाम नरेंद्र मोदी सरकार ने दिया है। आयकर विभाग के मुख्य आयुक्त श्रेणी के 12 भ्रष्ट अधिकारियों की सेवाएं समाप्त कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। जिस दिन इन्हें नौकरी से निकाला जा रहा था, उसी दिन प्रधानमंत्री मोदी देश के शीर्ष अधिकारियों से सीधा संवाद कर गतिशील बनाए रखने के दिशा-निर्देश दे रहे थे। इस बैठक में कई मंत्रालयों के सचिव स्तर के अधिकारी शामिल थे। एक सफल शासक की यह दूरदर्शिता ही मानी जाएगी।

एक ओर वे भ्रष्टाचार और अपने ही अधीनस्थ महिलाकर्मियों के यौन उत्पीड़न में लिप्त अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई कर रहे थे, दूसरी तरफ कार्य-कुशलता में दक्ष अधिकारियों को प्रोत्साहित रहे थे। मोदी ने इनके कामकाज की प्रशंसा की और चुनाव में जीत का श्रेय भी दिया। ईमानदार और कर्मठ अधिकारियों को मोदी कितना चाहते हैं, यह इस बात से प्रमाणित हुआ है कि उन्होंने भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी एस जयशंकर को विदेश मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया है।

देश में भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए इस तरह की पहल सराहनीय है। इन अधिकारियों के खिलाफ लगे आरोपों की पड़ताल करें तो पता चलता है कि ये मामले कदाचरण के साथ आय से अधिक संपत्ति जमा करने से भी जुड़े हैं। एक दशक से भी ज्यादा समय से इन मामलों में जांच लंबित थी। इन अधिकारियों पर रिश्वत लेने, व्यापारियों से जबरन धन वसूलने, बदनीयती से फैसले देने और अपने ही विभाग की दो महिला अधिकारियों से यौन शोषण जैसे आरोप लगे थे। ये महिलाएं सह-आयुक्त स्तर की थीं। 

साफ है, महिलाएं भले ही वरिष्ठ अधिकारी की पद-प्रतिष्ठा पा लें, बावजूद उन्हें यौन-उत्पीड़न का दंश झेलने का संकट बना रहता है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि कार्य-स्थलों पर महिलाओं को शारीरिक शोषण से सुरक्षा के लिए बहुत कुछ करना शेष है। राजस्व विभाग के इन सभी अधिकारियों को नियम 56 जे के तहत मिली विशेष शक्तियों के बूते अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई है। यहां सवाल उठता है कि जब ये अधिकारी करोड़ों के भ्रष्टाचार, अवैध धन-वसूली और बदनीयती से मामलों के निराकरण के अलावा यौन-उत्पीड़न के दोषी थे, तो इन पर प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई? 

इस तरह के मामले भारतीय प्रशासनिक, पुलिस और वन सेवा के अधिकारियों पर भी लंबित हैं। आखिर उन्हें क्यों बख्शा जा रहा है? यदि भ्रष्टाचारियों से शासन-प्रशासन मुक्त हो जाए तो साफ-सुथरी प्रतिस्पर्धा का रास्ता खुल जाएगा। फिर जो कल्पनाशील युवा कुछ नवाचार कर देश को समृद्ध और शक्तिशाली बनाना चाहते हैं, उन्हें अवसर मिलने लग जाएंगे। तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी बाधा कोई है, तो वे कालाधन और भ्रष्टाचार हैं। भारत के समावेशी विकास में यही सबसे बड़ा रोड़ा हैं।

देश में शीर्ष नौकरशाहों का भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाना कोई नई बात नहीं है। देश की पहली महिला आईएएस सुधा यादव से लेकर मध्यप्रदेश के अरविंद-टीना जोशी दंपति तक सैकड़ों नौकरशाह भ्रष्टाचार के दलदल में घंसे हैं। सीबीआई के प्रमुख रहे रंजीत कुमार व एपी सिंह कठघरे में हैं। छत्तीसगढ़ के प्रमुख सचिव बीएल अग्रवाल को भी सीबीआई ने भ्रष्ट आचरण में दबोचा था। प्रवर्तन निदेशालय के पूर्व निदेशक जेपी सिंह क्रिकेट की सट्टेबाजी और मनी लांड्रिंग में हिरासत में लिए गए थे। मध्यप्रदेश के आईएफएस बीके सिंह पर आमदनी से अधिक संपत्ति बनाने का मामला विचाराधीन है। यह फेहरिश्त इतनी लंबी है कि किसी एक आलेख में समा नहीं सकती। इसीलिए भारत 180 भ्रष्ट देशों की सूची में 84वें स्थान के इर्द-गिर्द रहता है। इस भ्रष्ट नौकरशाही का बचाव वे कानून सुरक्षा कवच बने हुए हैं, जो पराधीनता से लेकर अब तक वर्चस्व में हैं। इस कारण भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। चपरासी से लेकर मुख्य सचिव तक ये कानून समान रूप से अधिकारी-कर्मचारियों का बचाव करते हैं।

संविधान के अनुच्छेदों से लेकर उच्च और उच्चतम न्यायालयों की रूलिंग भी इनके लिए सुरक्षा-कवच का काम करते हैं। इसीलिए नौकरशाही इस्पाती ढांचा बना हुआ है। 1030 केंद्रीय और 6227 राज्य अधिनियमों का उपयोग व दुरुपयोग कर इन्हें तो नागरिकों को नियंत्रित करने का अधिकार है, लेकिन जब नागरिक या नागरिक समूह इनकी कार्य-कुशलता, शिथिलता पर थोड़ा ही आक्रामक होते दिखाई देते हैं तो उन्हें सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप में सीखचों के भीतर कर देने की ताकत ये रखते हैं। शायद इसीलिए संविधान विशेषज्ञ निर्वाचित मंत्रिमंडल को अस्थाई और प्रशासन तंत्र को स्थायी सरकार की संज्ञा देते हैं। 

केंद्रीय कर्मचारियों को सीआरपीसी की धारा 197 और भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा-19 में सुरक्षा प्रदान की गई है। भ्रष्टाचार के मामले में वरिष्ठ नौकरशाहों की जांच शुरू करने से पहले अनुमति की अनिवार्यता एक बड़ी बाधा है। इससे समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लघंन होता है। सीबीआई जांच की अनेक विभागों पर निर्भरता, इसकी निष्पक्षता में रोड़ा है। इसका अपना कोई स्वतंत्र अधिनियम नहीं होना भी इसे दुविधा में ला खड़ा करता है। दरअसल 1941 में अंग्रेजों ने दिल्ली पुलिस विधेयक के तहत 'दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट एक्ट' नाम की संस्था बनाई थी।

इसका दायित्व केवल भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच और उन्हें परिणाम तक पहुंचाना था। आजादी के बाद 1963 में एक सरकारी आदेश के जरिये महज इसका नाम बदलकर 'केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो' कर दिया गया था। यह बदलाव भी संसद से नहीं हुआ। इसलिए इसकी संविधान-सम्मत मान्यता भी नहीं है। इसे एक परंपरा के रूप में संजोया जा रहा है। इसे संवैधानिक रूप देने का विधेयक 35 साल से विचाराधीन है। इसकी धारा-6ए भ्रष्टाचार निरोधक कानून-1988 के उद्देश्यों और कारणों में अवरोधक का काम करती है। इसकी वैधता पर जनहित याचिकाओं के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में सवाल खड़े किए गए हैं। बावजूद यह धारा चीन की दीवार की तरह अडिग है।

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