संजीवनी टुडे

हैवानों के मानवाधिकारों पर गरमाई सियासत

-बाल मुकुन्द ओझा

संजीवनी टुडे 09-12-2019 14:26:00

मानव अधिकारों को पहचान देने और उसके हक की लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। दुनियाभर में मानवता के खिलाफ हो रहे जुल्मों और अत्याचारों को रोकने और उसके खिलाफ आवाज उठाने में इस दिवस की महत्वपूर्ण भूमिका है।


मानव अधिकारों को पहचान देने और उसके हक की लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। दुनियाभर में  मानवता के खिलाफ हो रहे जुल्मों और अत्याचारों को रोकने और उसके खिलाफ आवाज उठाने में इस दिवस की महत्वपूर्ण भूमिका है।

 देश में इस समय मानव अधिकारों को लेकर एकबार फिर सियासत गरमा उठी है। मीडिया विशेषकर सोशल मीडिया में यह जोरदार बहस चल रही है की क्या दुर्दांत राक्षसों और हैवानों के भी मानव अधिकार होते है। भारत में महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा और दुष्कर्म की वारदातों में आरोपी अपराधियों के एनकाउंटर को लेकर मानव अधिकारों पर एक नयी बहस छिड़ गयी है। एक पक्ष ऐसे दुर्दांत अपराधियों के एनकाउंटर को जायज ठहरा रहे है तो कुछ लोग इसे न्याय  व्यवस्था पर चोट की संज्ञा दे रहे है।  मानवाधिकारों पर नए सिरे से विचार करना होगा। हजारों निर्दोष लोगों को गोलियों से भून देने, बम से उड़ा देने, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों और निर्मम हत्या के दोषियों के मानवाधिकारों की बात करना सर्वथा बेमानी है। भारत में इस समय दुष्कर्मियों के विरुद्ध आंदोलन चल रहा है। विशेषकर महिलाएं ऐसे अपराधियों को मृत्यु दंड की मांग कर रही है। महिलाएं आवाज उठा रही है की मानवाधिकार मानवों के लिये बनाये गये हैं या हैवानों के लिये? क्या जो लड़कियां जिंदा जला दी गईं, उनके कोई मानवाधिकार नहीं थे।

सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ने हैदराबाद में गैंगरेप के आरोपियों के एनकाउंटर पर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि अगर न्याय बदले की भावना से किया जाए तो अपना मूल चरित्र खो देता है। न्यायमूर्ति की बात सही है मगर हमें यह भी देखना होगा की न्याय में अनावश्यक विलम्ब हुआ तो लोगों के धैर्य की सीमा समाप्त हो जाएगी और फिर हैदराबाद जैसी घटनाओं को नहीं रोका जा सकेगा और लोगों को  तुरंत न्याय की आवाज बुलंद करने से रोकना नामुमकिन हो जायेगा। गौरतलब है हैदराबाद में जिस तरह से महिला डॉक्टर को बर्बरता से गैंगरेप के बाद जिंदा जलाकर मार दिया गया, उसके बाद  हैदराबाद पुलिस ने सभी चार आरोपियों को एनकाउंटर में ढेर कर दिया। इस एनकाउंटर के बाद लोग देशभर में पुलिस की कार्यवाही का समर्थन कर रहे है वहां कुछ लोग अपराधियों के मानवाधिकारों की बात उठा रहे है। अब देश के लोगों को यह फैसला करना है की पीड़िता के मानव अधिकार ज्यादा अहम् और न्यायसंगत है या दुर्दांत राक्षसों के। लोगों का कहना है आरोपियों ने पुलिस कस्टडी से भागने की कोशिश की, ऐसे में पुलिस ने जो किया वह सही है।

महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा और अत्याचार सदियों से चला आरहा है। रामायण और महाभारत की कथाएं इसके साक्षात् उदाहरण है। रामायण में बाली वध का एक दृष्टांत बहुत चर्चित है। बाली ने भगवान राम से उसे मारने का कारण पूछा तो राम ने कहा छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या, इन चारों को जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कोई पाप नहीं होता। खैर वर्तमान में हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था में रह रहे है जहाँ न्याय का शासन है। यहाँ ऐसे अपराधियों को भी न्याय व्यवस्था से गुजरना पड़ता है। न्याय में देरी से लोग आनदोलन का रास्ता अख्तियार कर रहे है। न्याय और दंड विधान में सुधार कर लोगों के गुस्से को शांत किया जा सकता है। मानव अधिकार दिवस पर हमें नहीं भूलना चाहिए की जो महिला दुष्कर्म की शिकार हुई है उसके भी कुछ अधिकार है और ऐसे प्रकरणों को अतिशीघ्र निपटाकर मानव अधिकारों को संरक्षित किया जा सकता है।  

मानव अधिकारों से हमारा अभिप्राय मौलिक अधिकार एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार।

भारत में  मानव अधिकार आयोग होने और उनके संरक्षण के लिए कारगर कानून होने के बावजूद बच्चों और महिलाओं पर अत्याचार, तस्करी, ऑनर किलिंग, अस्पृश्यता, गरीबी, महिलाओं के साथ घर या सार्वजनिक तौर पर होने वाली हिंसा आजादी के 7 दशक बीत जाने के बाद भी जारी है। इसलिए हमें सब कुछ सरकार पर न छोड़कर अपने स्तर पर भी अपने आसपास होने वाले इन अपराधों को रोकने के लिए मिलकर कदम उठाने होंगे। हमें अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करना है तो यह तभी संभव होगा जब एक सभ्य समाज के नागरिक होने के नाते हम एक-दूसरे के दुःख  दर्द को समझें और एक-दूसरे के अधिकारों को बना रहने दें।  इसकी सार्थकता तभी होगी जब हम एक दूसरे के प्रति सद्भाव बनाये रखते हुए मानवाधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित होंगे।

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