संजीवनी टुडे

अब ये कयास कि कौन बनेगा- ’प्रधानमंत्री’

डाॅ. विलास जोशी

संजीवनी टुडे 19-05-2019 14:26:32


जाहिर ही है कि मतदान के पूर्व पार्टी कार्यकर्ताओं को एक ही धुन रहती है कि अपने नेताभैेयाजी को अधिकतम मतों से जीताना। उसके लिए वे न तो रात  देखते है और न दिन। बस लगे रहते है उनके प्रचार कार्य में। मतदान के दिन सुबह सूर्य की पहली किरण के पहले वे उठ जाते है और अपने मुहल्ले की गली गली के घर घर जाक कर मतदाताओं को मतदान करने के लिए उनके निवास से निकालने के लिए निवेदन करते है।कोई ’बीमार’ हो तो  उसे अपने मोटर साइकल/स्कुटर  पर बैठाकर मतदान केन्द्र  तक छोड़ आते है। चुनाव के बाद कार्यकर्ताओं की दिवानगी देखने लायक होती है। मतदान का समय समाप्त होने के बाद ’’ये महारथी’’ भैयाजी के दरबार में पहुंच जाते है ओैर अपनी अपनी गली-मुहल्ले में उनके द्वारा कराए गए मतदान का आंकड़ा उनके सामने पेश करते है। उसके बाद  वे रात को खा-पी के वही सुस्ताते है।
 
मतदान होने के बाद का अगला दिन उनके लिए ’’जिज्ञासा’’ का होता है। उनमें ’’जीत-हार’’का एक अलग कुतुहल होता है। फिर वे अपना ’’वर्चुवल सर्वे’’ करने में जूट जाते है। इसके तहत वे अपने भैया साहब के समूचे चुनाव क्षेत्र में लोगों से मिलते है और धीरे से यह जानने का प्रयास करते है कि -’’चुनाव मेें कौनसी पार्टी के भैयाजी या बहनजी  के पक्ष में किस किस मतदान केन्द्र पर कितना मतदान हुआ और किसके जीतने की संभावना है, किस पार्टी के कितने उम्मीदवार मैदान मारेंगे और आखिरकार कौनसी पार्टी  सरकार बनाने में कामयाब होगी’’। जब कोई आदमी उन्हे यह कहता है कि मुझे तो लगता है कि फंला ....फंला भैयाजी जीतने की संभावना लग रही है, तब उसका मन उसकी बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं होता। वह ’’लोकल टीवी चैनलों’’ पर चल रही बहस को गौर से सूनते है, फिर भी उनको यकीन नहीं होता, तब वह किसी ’’भविष्यवक्ता’’  के घर जाता है और उनसे  पूछते है कि -’’फंला ...फंला भैयाजी’’ और ’’फंला... फंला नेताजी’’ के बीच चुनावी मुकाबले में आपका ज्योतिष्य विज्ञान क्या कहता है’’? फिर वह भविष्यवक्ता अपना राजनीतिक ज्ञान बघारता है। उसे उसकी भविष्यवाणी पर भी विश्वास नहीं होता, तब वह’’ एक पान की दुकान’’ पर जमा भीड़ के बीच घूसता है,वहां बेसिरपैर  के दो-चार राजनीतिक विश्लेषक आपस में बाते  करते रहते है कि-’’इस बार फंला...फंला पार्टी और भैयासाहब पर मतदाता बूरी तरह नाराज है। तब उनकी बात काटते हुए दूसरा राजनीतिक विश्लेषक  कहता है कि- ’’इस बार फंला...फंला पार्टी के पक्ष में लहर  होने के कारण  उसके उम्मीदवार भी जीतेंगे और पार्टी भी सत्ता में आएगी’’। सच तो फोकट कयास लगाने में किसी का जाता भी क्या है? फिर आखिरकार ये हेेै तो सिर्फ कयास ही न!

बेचारा कार्यकर्ता यह बहस की बातें सुनते सुनते अपने घर आ जाता है ओैर ’’मतगणना वाले दिन’’ का इंतजार करने लगता है, इस विश्वास के साथ कि कुछ भी हो जाए मैंन जिस पार्टी के भैया साहब का प्रचार किया हेै, वे ही जीतेंगे, वही पार्टी ’’सत्ता का सिंहासन’’ संभालेगी और उसी पार्टी का मुखिया प्रधानमंत्री भी बनेगा। 

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