संजीवनी टुडे

जरूरत मानवीय मूल्यों को सहेजने की है: लालजी जायसवाल

संजीवनी टुडे 17-04-2019 14:48:58


भले ही आज भारत विश्व में तीव्र गति से उभरती अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है। लेकिन भारतीय समाज में लगातार हो रहे माननीय मूल्यों के अवसान चिंतित करनेवाले हैं। उपभोक्तावादी नीतियों तथा धन कमाने के प्रबल इच्छा के लोभ में हम अपनी मानवीय मूल्य रुपी विरासत को भूलते जा रहे हैं। यही कारण है कि समाज पतन के गर्त की ओर जा रहा है। इसका दुष्परिणाम समूल मानवीय समाज को भुगतना पड़ रहा है।

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समाज के बदलते परिदृश्य का सबसे गहरा प्रभाव संबंधों पर पड़ा है। परिणाम यह हुआ कि माता-पिता और संतानों के बीच संबंध दबाव में आ गए हैं। सन् 1992 में अकेले या अपने जीवन साथी के साथ रहने वाले बुजुर्गों का प्रतिशत 9 था, वह 2006 में बढ़कर 19 प्रतिशत हो गया। 

दिल्ली के एक गैर सरकारी संगठन एजवेल फाउंडेशन ने हाल ही में 10,000 बुजुर्गों को लेकर एक सर्वेक्षण किया। इसके मुताबिक करीब हर चौथा बुजुर्ग (23.44 फीसदी) इस देश में अकेला रह रहा है। प्रजातांत्रिक परिवर्तनों के साथ हो रहा आधुनिकीकरण और व्यक्तिवादी संस्कृति तथा कुछ ऐसे कारण हैं जिन्होंने समाज को इस ओर धकेला है, जिसमें मानवीय संबंधों का दोहन भी भरपूर हुआ है।

सरकार की समाज में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए तथा उनके कल्याण के लिए चलाई गई योजनाएं कागज तक सिमट कर रह गई हैं। बुजुर्गों की बढ़ती समस्या, सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए सरकार ने सन 2007 में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण के लिए मासिक भत्ता देना अनिवार्य कर दिया है। 

अर्थात् यह अब यह कानूनी दायित्व बन गया है। वर्ष 2018 में इस कानून का और विस्तार करके गैरजिम्मेदार संतानों को जेल भेजने का भी प्रावधान कर दिया गया है, लेकिन बुजुर्गों के लिए सरकार की नीतियों से ज्यादा मानवीय मूल्यों की दरकार है जो व्यक्ति को स्वयं आभास कराएगी कि वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल तथा उनकी सुरक्षा का दायित्व सरकार का नहीं बल्कि उस प्रत्येक व्यक्ति का है जो समाज का अंग है।

समाज में मूल्यों के क्षरण से वृद्ध आश्रमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम एक उत्कृष्ट सहायता के रूप में उभर कर आये हैं। जिसमें वृद्ध दंपति अपना जीवन यापन कर सकते हैं। वृद्धाश्रमों में चिकित्सा, मनोरंजन आदि की व्यवस्था यथोचित होती है। भले ही इससे संतानों के ऊपर बढ़ता दबाव कम हो जाता है लेकिन सत्य तो यह है कि व्यक्ति के मूल्यों का क्षरण यहीं से प्रारंभ हो जाता है। 

समाज का पतनोन्मुख होना प्रारंभ हो जाता है। सन् 2011- 15 के बीच केरल में वृद्धाश्रमों में रहने वालों की संख्या 69 फीसदी बढ़ गई है। यह सामान्य-सी बात है कि प्रगति के बढ़ते अवसरों के चलते परिवार को उसी परंपरागत रुप में चला पाना संभव नहीं प्रतीत होता, किंतु देखना यह है कि व्यक्ति अपने परंपरागत मूल्यों और नैतिक मूल्यों के बीच संतुलन कैसे बना पाता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि आर्थिक सुरक्षा के अलावा पारिवारिक मधुरता के मामले में कानून भी कुछ नहीं कर सकता। इससे बुजुर्गों के एकाकीपन की समस्या बढ़ती जा रही है। बुजुर्गों में एक बहुत बड़ी जनसंख्या उपेक्षा और उदासी का जीवन व्यतीत कर रही है। लगातार संयुक्त परिवारों की कमी, बिगड़ती हुई स्वास्थ्य सेवाएं, वरिष्ठ नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार की कमी, परिवहन सुविधाओं की कमी, अपर्याप्त आवासीय सुविधाएं आदि कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिस पर अभी सक्रिय नीति नहीं बन पाई है। 

वैसे भी सरकार ने बुजुर्गों के लिए कई योजनाएं बनाई जरूर है किंतु उनका क्रियान्वयन ठीक से न होने के कारण मात्र हाथी के दांत के समान ही प्रतीत होती हैं। देश के 50 प्रतिशत से भी अधिक वृद्ध आज आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर हैं। आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाएं और सामाजिक व्यवस्था की वजह से वृद्धों की समस्याएं और ज्यादा बढ़ने के आसार हैं।

इसलिए सबसे महत्वपूर्ण कदम युवाओं की मानसिकता पर कुठाराघात करने की है ,क्योंकि बच्चे अगर माता-पिता को बदतर हालत में जीने को मजबूर करते हैं, तो भी माता-पिता न्यायालय जाने की बजाय बदहाली में रहना मंजूर कर लेते हैं। अतः आज वरिष्ठ नागरिकों को आधिकारिक तौर पर स्वास्थ्य, आवास और गरिमा तीनों स्तरों को प्रदान करने के कदम उठाए जाने की जरूरत है। 

साथ ही दोनों के स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं में सुधार की भी दरकार है। अनेक व्यवसाय ऐसे हैं जहां सेवानिवृत्त व्यक्तियों के अनुभव एवं कौशल का उपयोग किया जा सकता है। उनके लिए उनकी क्षमता के अनुसार काम के घंटे भी तय किये जा सकते हैं, जिससे वृद्धों की आर्थिक स्वतंत्रता व सार्थकता की भावना बनी रहे।

आज आवश्यकता है उन मानवीय मूल्यों की स्थापना करने की, जिनका क्षरण होता जा रहा है। साथ ही व्यक्तियों को अपने कर्तव्यों के प्रति प्रेरित किया जाए। कर्तव्यों के साथ जनमानस का परम धर्म भी यही है कि अपने वरिष्ठ जनों के साथ समुचित व्यवहार करें क्योंकि समाज एक सभ्य समाज तभी बन सकता है जब व्यक्ति अपने बुजुर्गों के प्रति एक अनमोल धरोहर की छवि का एहसास करें। 

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यह सब तभी संभव होगा जब व्यक्ति नैतिक गुणों से युक्त तथा संवेदनावान होगा। ध्यान रखिये जो आज जवान हैं, वह भी कल बूढ़े होंगे। बुजुर्ग माता-पिता हमारी धरोहर होते हैं। वह अपने खून-पसीने से नई पीढ़ी का निर्माण करते हैं। नौजवान पीढ़ी के बुलंदियों के शिखर छूने में यदि किसी का सबसे बड़ा योगदान होता है तो वे उसके माता-पिता ही होते हैं। 

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