संजीवनी टुडे

नशा नाश है जीवन का: योगेश कुमार गोयल

संजीवनी टुडे 24-06-2019 12:48:57

नशा आज न केवल गरीब तबके के युवाओं को बल्कि धनाढ्य परिवारों के युवाओं को भी किस कदर अपना गुलाम बना रहा है, इसका आभास रेव पार्टियों में अक्सर नशे में मदहोश सैकड़ों युवक-युवतियों की गिरफ्तारियों से हो जाता है।


नशा आज न केवल गरीब तबके के युवाओं को बल्कि धनाढ्य परिवारों के युवाओं को भी किस कदर अपना गुलाम बना रहा है, इसका आभास रेव पार्टियों में अक्सर नशे में मदहोश सैकड़ों युवक-युवतियों की गिरफ्तारियों से हो जाता है। लाखों युवा नशे की लत की पूर्ति के लिए न केवल अपना और अपने परिवार का जीवन तबाह कर डालते हैं बल्कि सभ्य समाज के लिए भी ग्रहण बनते हैं। एक समय था, जब पंजाब कृषि प्रधान राज्य के रूप में विख्यात था। 

आज वही पंजाब नशे की फैलती विषबेल के लिए बदनाम है। 'उड़ता पंजाब' के रूप में कुख्यात इस हरे-भरे राज्य में पिछले कुछ वर्षों से मादक पदार्थों के जरिये युवाओं की नसों में नशे का ऐसा जहर घोला जा रहा है, जो अब तक न जाने कितनी ही जिंदगियां तबाह कर चुका है। अब तो नशे का यह घृणित कारोबार पंजाब की सीमा लांघकर पड़ोसी राज्यों के युवाओं को भी लीलने लगा है। देश के कई राज्य भी नशा तस्करों के सॉफ्ट टारगेट हैं, जहां युवा दम पर दम मार रहे हैं और जिंदगी बर्बादी के मुहाने पर जा रही है। इन राज्यों में शराब, स्मैक, भांग, चरस, गांजा, अफीम, हेरोइन, भुक्की इत्यादि युवाओं को आसानी से सुलभ हो जाते हैं।

यह विडम्बना ही है कि जिस युवा पीढ़ी के भरोसे देश के विकास के स्वप्न देखे जा रहे हैं, वह नशे की दलदल में फंसकर अपना और देश का भविष्य अंधकारमय बना रही है। स्थिति कितनी चिंताजनक है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि देश में अंग्रेजों से गुलामी से मुक्ति के बाद बहुत बड़ी आबादी नशे की गुलाम हो गई है। आजादी के बाद से अभी तक देश में शराब की खपत 60 से 80 गुना गढ़ गई है। गरीबी रेखा से नीचे गुजारा कर रहे करीब 37 फीसदी लोग तो ऐसे हैं, जो नशे के आदी हैं और अपने परिवार का जीवन यापन करने की बजाय अपनी रोज की कमाई नशे पर ही उड़ा देते हैं। 

नशा करने वाले युवाओं की औसत आयु देश में जहां पहले 16 से 18 वर्ष थी, वहीं अब यह 13 से 15 वर्ष हो गई है। स्थिति इतनी गंभीर है कि कुछ समय पहले तक जहां स्कूल-कॉलेजों के किशोर और युवा ही नशे के तस्करों के निशाने पर थे। अब स्कूल-कॉलेजों की लड़कियां और बहुत-सी महिलाएं भी नशे की आदी हो रही हैं। ऐसे में सहज कल्पना की जा सकती है कि जब देश की मातृशक्ति ही नशे की दलदल में इस कदर धंसती जाएगी तो ऐसे परिवारों को नशे से कौन बचाएगा? प्रायः देखा गया है कि महिलाएं ही परिवार के किसी सदस्य के नशे के शिकंजे में फंसने पर उसे इस दलदल से बाहर निकालने में सर्वाधिक प्रयास करती हैं। अगर वही नशे की आदी होने लगें तो कैसा समाज बनेगा, इसकी कल्पना मात्र से ही रूह कांप उठती है। 

नशे के मामले में पंजाब देश में पहले पायदान पर है, जहां हर तीसरा छात्र और हर दसवीं छात्रा नशा करने लगे हैं। राज्य में हर माह 112 लोग ड्रग्स और नशे के शिकार होकर मौत के मुंह में समा रहे हैं। करीब पचास हजार लोग एचआईवी पीड़ित हो चुके हैं। कुछ ही समय पहले सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में करीब नौ लाख लोग ड्रग्स ले रहे हैं। इनमें करीब साढ़े तीन लाख इसके आदी हो चुके हैं। नशे की उपलब्धता न हो पाने के चलते ऐसे ही लोगों में से पिछले दस वर्षों में करीब पच्चीस हजार लोग अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या कर चुके हैं। 

प्रतिदिन औसतन तीन लोग इसी वजह से आत्महत्या करते हैं। ये आंकड़े तो तब हैं जबकि ग्रामीण अंचलों में लोग बदनामी और पुलिस के लफड़ों से बचने के लिए ऐसे मामले दर्ज ही नहीं कराते। सूत्रों का कहना है कि आत्महत्याओं के ऐसे करीब 70 फीसदी मामले तो पुलिस तक पहुंचते ही नहीं। स्थिति कितनी भयावह है, इसकी बानगी इसी से मिल जाती है कि जहां 2013 में देश के बाकी राज्यों में ड्रग्स अपराधों से जुड़े मामलों की संख्या 14564 थी, वहीं अकेले पंजाब में यह संख्या 34688 थी। 2018 तक कुल चार वर्षों के अंतराल में राज्य में करीब 39064 टन ड्रग्स बरामद किए जा चुके हैं। प्रदेश के सामाजिक सुरक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2016 के अंत में जारी आंकड़ों के अनुसार पंजाब के गांवों में करीब 67 फीसदी घर ऐसे हैं, जहां कम से कम एक व्यक्ति नशे की चपेट में है।

दूसरे पड़ोसी राज्यों का हाल भी अब पंजाब जैसा ही होने लगा है। हिमाचल प्रदेश को 'उड़ता हिमाचल' की संज्ञा दी जाने लगी है। हरियाणा में भी विगत 6-7 वर्षों में नशे का सेवन करने वाले युवाओं की संख्या चार गुना बढ़ चुकी है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान, दिल्ली, चण्डीगढ़, जम्मू कश्मीर इत्यादि राज्यों में भी नशेड़ियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। शराबबंदी होने के बावजूद बिहार में शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब वहां शराब न बरामद होती हो। 

महाराष्ट्र में मुम्बई और ठाणे के करीब 70 कॉलेजों में गांजा तथा अन्य नशीले पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ रही है। कुछ ही महीनों में वहां 8000 किलो से भी अधिक गांजा पकड़ा गया। देशभर में नशे की इस कदर फैलती विषबेल के मद्देनजर ही गत वर्ष नशा और नशे के सौदागरों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखण्ड, राजस्थान, दिल्ली और चण्डीगढ़ सरकारों ने संयुक्त अभियान शुरू करने का फैसला किया था। 

इसके तहत हरियाणा के पंचकूला में साझा सचिवालय गठित कर वहां सभी राज्यों के नोडल अधिकारियों की नियुक्ति के पश्चात इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की साल में दो बार तथा सचिव स्तर पर चार बार बैठकें आयोजित करने का निर्णय लिया गया था। इस साझा अभियान से उत्तरप्रदेश तथा जम्मू कश्मीर को भी जोड़ा जाना है। निश्चित रूप से इस प्रकार की मुहिम का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि नशा आज केवल एक राज्य की ही समस्या नहीं रह गया है और न ही यह किसी खास भौगोलिक सीमा तक सीमित है। इसलिए कई राज्यों की साझा रणनीति के तहत इसकी जड़ों पर प्रहार करना ही अब समय की मांग है।

अभी तक की यही नियति रही है कि नशे के खिलाफ हर राज्य द्वारा अपने-अपने स्तर पर जंग लड़ने के कोई सार्थक परिणाम हासिल नहीं हुए। पंजाब सहित कई राज्यों में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, नेपाल आदि देशों से नशे की खेप पहुंचाई जाती रही हैं। धीरे-धीरे नशे के तस्करों का यह नेटवर्क पूरे देश में फैलता जा रहा है। कहना असंगत नहीं होगा कि नशे के इस काले कारोबार के फलने-फूलने में स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक तंत्र में मौजूद कुछ काली भेड़ों की मिलीभगत भी अहम भूमिका निभा रही है। 

ऐसे में ऐसी काली भेड़ों की पहचान कर उन्हें दण्डित किया जाना बेहद जरूरी है। नशे के खिलाफ अभियान तभी सफल हो सकता है, जब प्रभावित राज्य एकजुट और सचेत होकर सूचनाओं का आदान-प्रदान करें और इन सभी राज्यों का पुलिस-प्रशासन आपसी तालमेल बनाकर इस दिशा में काम करे क्योंकि किसी एक राज्य के बूते यह संभव नहीं। तमाम प्रयासों के बावजूद देशभर में नशीले पदार्थों की खपत और लत तेजी से बढ़ती गई है। ऐसे में नशा तस्करों के सिंडिकेट को तबाह करने के लिए सभी राज्यों के पुलिस-प्रशासन को भी अपना एक साझा सिंडिकेट खड़ा करना होगा, ताकि ऐसे अपराधी किसी दूसरे राज्य में जाने पर भी कानून की पेचीदगियों का लाभ उठाकर बचने न पाएं।

इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जिन क्षेत्रों में ड्रग्स की आसानी से आपूर्ति हो जाती है, वे इस संकट से ज्यादा जूझ रहे हैं। ऐसे में सबसे जरूरी है कि नशे की मांग और आपूर्ति दोनों पर ही अंकुश लगाया जाए। लेकिन इसके लिए सिर्फ सरकार और प्रशासन पर ही आश्रित होकर बैठ जाना समस्या का हल कदापि नहीं हो सकता। नशे की दलदल में फंसकर शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकलांग होती युवा पीढ़ी को इस नरक से बाहर निकालने के लिए जरूरत है एक बड़े जन-आन्दोलन की। 

बेहतर होगा कि देश का हर जिम्मेदार नागरिक इस मुहिम में पुलिस-प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस सामाजिक बुराई का समूल नाश करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करे, क्योंकि सिर्फ कानूनों के सहारे ऐसी गंभीर समस्याओं का समाधान कदापि संभव नहीं। देश का भविष्य मानी जाती रही युवा पीढ़ी को नशे के मकड़जाल से बचाने के लिए नशे के खिलाफ राष्ट्रव्यापी जंग ही एकमात्र विकल्प है, जिसमें हर आम और खास व्यक्ति की भागीदारी अपेक्षित है।

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