संजीवनी टुडे

जैविक खेती की ओर लौटना ही होगा

--रामविलास जांगिड़

संजीवनी टुडे 20-09-2019 14:26:00

ग्रीन हाउस गैसों के खतरे को और अधिक स्पष्ट करने के लिए जलवायु परिवर्तन का नया नाम जलवायु आपातकाल, जलवायु संकट या किसी दुर्घटना और बाधा के कारण होने वाली रुकावट यानी ब्रेकडाउन करने पर विचार किया जा रहा है।


ग्रीन हाउस गैसों के खतरे को और अधिक स्पष्ट करने के लिए जलवायु परिवर्तन का नया नाम जलवायु आपातकाल, जलवायु संकट या किसी दुर्घटना और बाधा के कारण होने वाली रुकावट यानी ब्रेकडाउन करने पर विचार किया जा रहा है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और ग्रीन हाउस गैसों को तापमान बढ़ाने के लिए जिम्मेदार माना गया है। देश में खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैस की मात्रा काफी बढ़ रही है। पराली जलाने की वजह से भी प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ रहा है। देश में 1970 से लेकर 2014 के बीच में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 80 फीसदी बढ़ गया है। चावल के खेतों से 33 लाख टन मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। इसी तरह 0.5 से 2.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रस ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन होता है। कुल नाइट्रस ऑक्साइड गैस का 75 से 80 फीसदी हिस्सा रासायनिक खाद से निकलता है। एक आकलन के मुताबिक भारत में हर साल 550-550 मीट्रिक टन पराली का उत्पादन होता है। हर वर्ष इसका 15.9 प्रतिशत हिस्सा जला दिया जाता है जो प्रदूषण को लगातार बढ़ाता चला जा रहा है। पराली जलाने की वजह से कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैस निकलती है और इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग होता है। एक टन धान की पराली जलाने पर तीन किलो पार्टिकुलेट मैटर (पीएम), 60 किलो कार्बन मोनोऑक्साइड, 1460 किलो कार्बन डाईऑक्साइड और दो किलो सल्फर डाईऑक्साइड निकलता है। कुल पराली जलाने में 40 प्रतिशत हिस्सा धान का है। इसके बाद 22 प्रतिशत हिस्सा गेहूं और 20 प्रतिशत हिस्सा गन्ने का है।

कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग की वजह से वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और जल प्रदूषण हो रहा है। ज्यादातर कीटनाशकों का प्रयोग बिना किसी सावधानी प्रक्रिया के होता है जिसकी वजह से शरीर, मृदा, पानी और हवा में बुरा प्रभाव पड़ता है। ग्रीनहाउस गैसों को कम करने में जैविक खेती की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जैविक खेती में पहले से ही काफी नाइट्रोजन की मात्रा होती है। इसकी वजह से रासायनिक नाइट्रोजन युक्त खाद का प्रयोग नहीं करना पड़ता है। जैविक खेती की वजह से कार्बन डाईऑक्साइड की भी मात्रा घटती है। हमें जैविक खेती को और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है क्योंकि रासायनिक उर्वरक आधारित खेती ग्रीन हाउस गैसों में 50 प्रतिशत का योगदान करती हैं। जैविक खेती वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों का 100 प्रतिशत समाधान प्रदान कर सकती है और कार्बनिक पदार्थों के उपयोग से मिट्टी की पानी रोकने की क्षमता (जल प्रतिधारण क्षमता) भी बढ़ जाती है। जैविक खेती में उत्पादकता रासायनिक खेती के माध्यम से हासिल की गई उत्पादकता की तुलना में कम नहीं है। जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत जितनी राशि दी जाती है वे पर्याप्त नहीं है। जैविक किसानों को और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी को धीरे-धीरे कम किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसी सब्सिडी मिट्टी, स्वास्थ्य और जलवायु में गिरावट के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने जैसी है। जैविक खेती की तरफ किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को जैविक इनपुट जैसे बायो-खाद, जैविक कंपोस्ट, जैविक कीटनाशक इत्यादि चीजों पर रासायनिक खाद की तरह सब्सिडी दी जानी चाहिए। सहज व आनंददायी जीवन के लिए जैविक खेती व प्रकृति के अनुकूलन में साम्य लाना होगा।

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