संजीवनी टुडे

लॉकडाउन की घरेलू गाइडलाइन में खरबूजा

- रामविलास जांगिड़

संजीवनी टुडे 03-06-2020 14:51:05

धूप खुद तलाश रही है अपने लिए कहीं छाया। वहीं बेलें पसर रही है अपनी छांव में। जैसे मजदूर बेकारी की गर्मी में पसरा पड़ा है अपने ही गांव में।


धूप खुद तलाश रही है अपने लिए कहीं छाया। वहीं बेलें पसर रही है अपनी छांव में। जैसे मजदूर बेकारी की गर्मी में पसरा पड़ा है अपने ही गांव में। जैसे सरकारी सहायता उलझी पड़ी है अपने ही सियासी दांव में। जैसे नमक रगड़ा जा रहा हो छाले भरे पांव में। खरबूजे और तरबूजे की बेलें पसर रही है गर्मी में किसी कुम्हार के आवं में। तपती धूप में खरबूजे को तोड़कर किसान ने एक बड़ी सी खेली में डाल दिया है। हर एक खरबूजा दूसरे खरबूजे को देखकर रंग बदलने का बिल्कुल नाम नहीं ले रहा है। खरबूजे को खेली में रगड़ा जा रहा है। जैसे मजदूरों को कोई रगड़ता हो उनका मालिक। खरबूजा संग बच्चों ने भी खेली में उधम मचाई। रगड़-रगड़ के खरबूजे की मिट्टी उतारी गई। रगड़-रगड़ कर उसकी पीठ सुजाई। उसे धोया, निचोया और गाड़ी में फेंक दिया। सब्जी मंडी की यात्रा के लिए गाड़ी में खरबूजा। खरबूजे पर दिहाड़ी मजदूर। दोनों आपस में एक दूसरे को कुचलते। मंडी में आने पर खरबूजे को तोला और सैनिटाइजर से रगड़ कर फिर खंगाला। चिलचिलाती धूप में खरबूजा चला ठेले पर। बिकने के लिए बाजार। जैसे मजदूर खड़ा हो कोई चौखटी पर। जैसे नेता खड़ा हो कोई रिसोर्ट पर। बिकने के लिए तैयार खरबूजा, मजदूर और नेता। यहां भी ठेले पर उसे खूब रगड़ा। हैंडपंप और नाली के पानी से खूब धोया। रगड़ा और सजाया। कोरोना के इस हाहाकार में खरबूजे को खरीदने आए मास्क ढके कई चेहरे। कई चेहरों ने उसे बजा-बजाकर देखा और फिर पटक दिया ठेले पर। जैसे मजदूरों को खरीदता हो कोई सियासी पार्टी का ठेकेदार। मास्क में लिपटे चेहरे। हाथों में लगे ग्लवज़।

एक जीव ने पीट-पीटकर देखा और खरीदा। एक अदद खरबूजा। घर लाया। उसे गर्म पानी की बाल्टी में डाल दिया। जैसे मजदूरों को डाल देते हैं किसी फैक्ट्री में। उसे खूब धोया। फल-फ्रूट लाने की घरेलू गाइडलाइन के वशीभूत उस जीव ने खरबूजे को खूब रगड़ा। बेचारा खरबूजा! वह बाल्टी से निकलकर हाथ जोड़ने लगा। कहने लगा- 'मेरे बाप! अब तो मुझे इतना मत रगड़। तूने मुझे इतना रगड़ा, इतना रगड़ा की अब मेरी धारियां भी लाल हो गई। नीली-नीली धारियां जाने कहां चली गई और लाल होकर बाल्टी में पसर गई है। तूने मुझे खरबूजे से बदलकर टिंडा बना दिया है। हे मेरे बाप! अगर चक्कू ना हो, तो मुझे मुक्का मारकर ही फोड़ दे। खा ले। लेकिन अब इतना तो मत रगड़। खेत से चलकर आते-आते मुझे 135 बार तो रगड़ ही दिया।' खरबूजा रो रहा है। गिड़गिड़ा रहा है। परेशान है मजदूर। मामला कोरोना काल का चल रहा है। खरबूजा स्वामी ने जब घंटे भर तक खरबूजे को गरम पानी की बाल्टी में रगड़ा। बाहर निकाल कर उसे चिलचिलाती धूप में छत पर डाल दिया। कहीं किधर से भी कोरोना न आ जाए, इसलिए इस खरबूजे और मजदूर की गत बुरी कर रखी है। खरबूजा गुहार लगा रहा है- 'प्लीज! मुझे काट लो। काट डालो और खा जाओ। ताकि मेरी आत्मा को शांति मिले। मुझे इतना तो मत तड़पाओ।' लेकिन खरबूजा मालिक ने अब उसे छत पर छोड़ दिया है, खुली धूप में। खरबूजा अब भी खून के आंसू रो रहा है। कोई आए। मुझे काटे और खा जाए, लॉकडाउन की घरेलू गाइडलाइन के कारण ऐसा संभव नहीं है। मजदूरों की भी खरबूजों सी गत बन गई है यारों।

ऐसी ही ताजा खबरों व अपडेट के लिए डाउनलोड करे संजीवनी टुडे एप

More From editorial

Trending Now
Recommended