संजीवनी टुडे

राजनीति व अपराध के जोड़ को खोलने की सार्थक पहल

सियाराम पांडेय शांत

संजीवनी टुडे 15-02-2020 14:06:09

राजनीति में अपराधियों का बेतहाशा प्रवेश, लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। सर्वोच्च न्यायालय भी राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण से चिंतित है। पिछले चार आम चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि लोकसभा में दागी उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी है।


राजनीति में अपराधियों का बेतहाशा प्रवेश, लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। सर्वोच्च न्यायालय भी राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण से चिंतित है। पिछले चार आम चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि लोकसभा में दागी उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी है। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की अवमानना याचिका पर सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने जो निर्देश दिए, वे काबिलेगौर हैं। चुनाव सुधार के लिहाज से सर्वोच्च न्यायालय की पहल अत्यंत मुफीद है। सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों से बताने को कहा है कि उन्होंने आपराधिक छवि के लोगों को टिकट क्यों दिये? राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाने का इससे बेहतर सवाल दूसरा नहीं हो सकता।

अपने निर्णयों से सर्वोच्च न्यायालय ने हमेशा ही देश को नई दिशा दी है, यह भी उसी श्रृंखला का हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने कहा है कि उम्मीदवारों का चयन योग्यता और मेरिट के आधार पर होना चाहिए। सिर्फ चुनाव जीतने का पैमाना दागियों को टिकट देने का कारण नहीं हो सकता। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर कहा था कि उम्मीदवार अपने चुनावी हलफनामे में आपराधिक मामलों की जानकारी देने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के सितंबर 2018 के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। 

इस याचिका के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों से वेबसाइट पर आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों के चयन की वजह बताने और उनके खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी अपलोड करने का निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय के मुताबिक राजनीतिक दलों को प्रत्याशियों के आपराधिक मामलों की जानकारी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अखबारों में प्रकाशित कराना है। उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी साझा करना है।प्रत्याशियों के चयन के 72 घंटे में उनके खिलाफ दायर मामलों की जानकारी चुनाव आयोग को देने के निर्देश दिए गए हैं। आदेश का अनुपालन नहीं होने पर चुनाव आयोग को अपने अधिकार के मुताबिक राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।

इस तरह के निर्णय पहले भी दिए गए थे लेकिन राजनीतिक दलों ने उसे हल्के में लिया। यही वजह है कि हर पांच साल में देश की संसद में दागियों की तादाद बढ़ती गई। वर्ष 2004 में देश के 24 प्रतिशत सांसद दागी थे। 2009 में यह संख्या बढ़कर 30 प्रतिशत हो गई थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में दागी सांसदों की तादाद बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव जीतने वाले ऐसे सांसदों की संख्या 43 प्रतिशत हो गई। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े और जस्टिस बीआर गवई ने दो माह पूर्व 25 नवंबर को चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए आदेश पारित करे, ताकि तीन महीने के अंदर राजनीतिक दलों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को टिकट देने से रोका जा सके। राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग ने अगर अपनी भूमिका सही ढंग से निभाई होती तो न्यायालय को ऐसा निर्णय बार-बार नहीं देना पड़ता।

थोड़ा और पहले जाएं तो 2014 में लोकसभा चुनाव से पूर्व नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सरकार बनते ही वे स्पेशल कोर्ट बनवाएंगे। आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं के खिलाफ तेजी से कार्रवाई कराएंगे। उन्होंने अपना यह वादा निभाने की पहल शुरू की लेकिन यह सब करने में उन्हें तीन साल लग गए। मोदी सरकार ने 1581 सांसदों और विधायकों पर लंबित मुकदमों पर तेजी से सुनवाई के लिए 12 स्पेशल कोर्ट बनवाने का जो मसौदा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा था, उसे कोर्ट ने हरी झंडी दिखा दी। यही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को ऐसे सभी माननीयों के खिलाफ लंबित मामलों का डेटा जुटाने के लिए दो महीने का वक्त भी दिया था और 1 मार्च 2018 तक इन कोर्ट में कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए थे। 

सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों को भी हाईकोर्ट के साथ मिलकर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के निर्देश दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे लेकर केंद्र सरकार को निर्देशित किया कि विशेष फास्ट अदालतों के गठन के लिए राज्य सरकारों को तय 7.8 करोड़ में से आवश्यक राशि जारी करे। केंद्र सरकार ने दो स्पेशल कोर्ट सांसदों के खिलाफ सुनवाई के लिए तय किए थे। इसके अतिरिक्त एक-एक कोर्ट आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में बनाने का प्रस्ताव दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि सजा पाने वाले नेता की सदस्यता समाप्त हो, उसे चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य माना जाए। लेकिन बिहार में लालू यादव को जब चारा घोटाला मामले में सजा हुई तो विपक्ष केंद्र सरकार को निशाना बनाने लगा। उसपर आरोप लगाने लगा कि कोर्ट के आदेश की आड़ में मोदी सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बना रही है। सर्वोच्च न्यायालय के कुछ फैसलों पर सरकार को घेरने का ट्रेंड इन दिनों तेजी से विकसित हुआ है। ऐसे में नए आदेश पर राजनीतिक दल कितना अमल करेंगे, यह देखने वाली बात होगी।

यह खबर भी पढ़ें:​ LOVE AAJ KAL: कार्तिक-सारा के बीच इंटिमेट और किसिंग सीन्स पर चली सेंसर बोर्ड की कैंची

यह खबर भी पढ़ें:​ इस मॉडल का प्लस साइज फिगर देख बूढ़े भी हो जायेंगे जवान, देखें PICS

यह खबर भी पढ़ें:​ उर्वशी रौतेला का यह वीडियो जमकर हो रहा वायरल, ट्रोलर्स बोले- क्या फूंका है बहन?

जयपुर में प्लॉट मात्र 289/- प्रति sq. Feet में  बुक करें 9314166166

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

More From editorial

Trending Now
Recommended