संजीवनी टुडे

माया के जाल में मायावती: प्रमोद भार्गव

संजीवनी टुडे 20-07-2019 16:45:26

मायावती के भाई आनंद कुमार की बेनामी संपत्ति आखिरकार आयकर विभाग की चपेट में आ ही गई। हाल ही में आनंद की बहुजन समाज पार्टी के उपाध्यक्ष पद पर दोबारा नियुक्ति की गई है। आनंद की कुछ ही सालों में चल-अचल संपत्ति सुरसा के मुख की तरह बढ़ी है।


मायावती के भाई आनंद कुमार की बेनामी संपत्ति आखिरकार आयकर विभाग की चपेट में आ ही गई। हाल ही में आनंद की बहुजन समाज पार्टी के उपाध्यक्ष पद पर दोबारा नियुक्ति की गई है। आनंद की कुछ ही सालों में चल-अचल संपत्ति सुरसा के मुख की तरह बढ़ी है। उनकी 400 करोड़ रुपए की संपंत्ति जब्त की गई है। आनंद की संपत्ति पर प्रवर्तन निदेशालय की भी नजर है। उनके खिलाफ जांच चल रही है। इस कार्यवाही के बाद मायावती की मुश्किलें बढ़नी तय हैं। क्योंकि आनंद कोई ऐसा व्यापार नहीं करते हैं, जिसकी आमद के चलते देखते-देखते वे अकूत धन-संपदा के मालिक बन जाए? उनकी आमदनी में सात साल के भीतर 18,000 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, जो अपने आप में एक अचंभा है। 

मायावती पर टिकट बेचने, बेहिसाब चंदा लेने और परिवारवाद को अनैतिक ढंग से बढ़ावा देने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। लिहाजा इन विवादों पर सफाई देना अब आसान नहीं है। क्योंकि उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों में ही भाजपा की सरकारें हैं। इसीलिए कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संयुक्त निर्देश पर नोएडा और ग्रेटर नोएडा में भूमि आवंटन से जुड़ी फाइलों को नए सिरे से खंगाला जा रहा है। हालांकि 2011-12 में भाजपा के सांसद किरीट सोमैया ने दिल्ली आयकर विभाग को दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ इस क्षेत्र में दो लाख करोड़ रुपए से अधिक भूमि आवंटन घोटाले की फाइल सौंपी थी, लेकिन केंद्र में मनमोहन सिंह और उप्र में समाजवादी पार्टी की सरकार होने के कारण नतीजा शून्य रहा।

इस घोटाले के उजागर होने के साथ ही मायावती की घेराबंदी शुरू हो गई है। दलित चिंतक डॉक्टर चरण सिंह ने कहा है, ‘बहुजन समाज पार्टी के नारे बहुजन हिताय को सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय में बदलकर मायावती सत्ता में वापसी की कोशिशों में जुटी हुई हैं। लेकिन अब खुद माया के जाल में मकड़ी तरह उलझ गई हैं। परिवारवाद का विरोध करने वाली बसपा कांशीराम के मूल उद्देश्य से भटक गई है। समर्पित कार्यकर्ताओं को किनारे कर भाई-भतीजे को संगठन में शीर्ष पदों पर मनोनीत कर दिया गया है। पार्टी के भीतर फिलहाल भले ही विरोध मुखर नहीं हुआ है लेकिन असंतोश चहुंओर व्याप्त हो चुका है।' साफ है कि कालांतर में भीम आर्मी जैसे दलित संगठनों को आनंद की इस संपंत्ति के बाबत सवाल उठाने और मायावती को घेरने का सुनहरा अवसर मिल गया है। 

उत्तर प्रदेश की 12 विधानसभा सीटों पर जो उपचुनाव होने हैं, उनपर भी इस गड़बड़ी का साफ असर दिखाई देगा। क्योंकि आनंद व उनकी पत्नी विचित्रलता के नाम कुल 1350 करोड़ रुपए की संपंत्ति का पता चला है। उन पर सत्ता के दुरुपयोग का भी आरोप है। दरअसल, आनंद ने 1996 में नोएडा विकास प्राधिकरण में महज 700 रुपए के मासिक वेतन पर कनिष्ठ सहायक के पद पर नौकरी की शुरूआत की थी। सात साल के भीतर ही उन्होंने इतनी नामी-बेनामी संपत्ति एकत्रित कर ली कि वे आयकर विभाग की नजरों में चढ़ गए।

इसके पहले मायावती पर नसीमुद्दीन सिद्धिकी ने भी पचास करोड़ रुपए लेने का आरोप लगाया था। मायावती ने उन्हें तत्काल पार्टी से निष्कासित कर दिया था। जबकि सिद्धिकी पार्टी के संस्थापक कांशीराम के साथी होने के साथ ही पार्टी का मुस्लिम चेहरा भी थे। दलित-मुस्लिम समीकरण को एक समय जमीन पर उतारने में भी उनकी अहम भूमिका रही थी। किंतु 50 करोड़ रुपए की मांग पूरी न करने पर मायावती ने उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। 

सिद्धिकी ने आरोपों को प्रमाणित करने के लिए वे ऑडियो टेप भी प्रेसवार्ता में प्रस्तुत किए थे, जिसमें मायावती और सिद्धिकी के बीच लेन-देन का वार्तालाप स्पष्ट तौर पर सुनाई दे रहा था। मायावती पर टिकट बेचने के आरोप भी लगते रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 के ठीक पहले बसपा के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी अचानक पार्टी छोड़ दी थी। ये आरोप इस बात के संकेत थे कि मायावती पार्टी की बुनियादी सामाजिक न्याय की अवधारणा पर खरी उतरने में नाकाम साबित हो रही हैं।

सवर्ण नेतृत्व को दरकिनार कर दलित और पिछड़ा नेतृत्व तीन दशक पहले इसलिए उभरा था, जिससे लंबे समय तक केंद्र व उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों की सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय के जो लक्ष्य पूरे नहीं कर पाई थी, वे पूरे हों। सामंती, बाहुबली और जातिवादी कुच्रक टूटे। किंतु ये लक्ष्य तो पूरे हुए नहीं, उल्टे सामाजिक शैक्षिक और आर्थिक विषमता उत्तोत्तर बढ़ती चली गई। 

सामाजिक न्याय के पैरोकारों का मकसद धन लेकर टिकट बेचने और आपराधिक पृष्ठभूमि के बाहुबलियों को अपने दल में विलय तक सिमट कर रह गया। राजनीति के ऐसे संक्रमण काल में जब विपक्ष को अपनी शक्ति और एकजुटता दिखाते हुए भाजपा से लड़ने की जरूरत अनुभव हो रही है, तब एक के बाद एक विपक्षी दल अंदरूनी व पारिवारिक संकट से जूझते दिखाई दे रहे हैं। सपा, बसपा, राजद, और द्रमुक ने पारिवारिक कलह के चलते अपनी साख लगभग खो दी है।

बसपा को वजूद में लाने से पहले कांशीराम ने लंबे समय तक दलितों के हितों की मुहिम डीएस-4 के जरिए लड़ी थी। इसीलिए तब बसपा के कार्यकर्ता इस नारे की हुंकार भरा करते थे, ‘ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर चोर, बाकी सारे डीएस-फोर।‘ इसी डीएस-4 का सांगठनिक ढांचा खड़ा करने के वक्त बसपा की बुनियाद पड़ी और पूरे हिंदी क्षेत्र में बसपा की संरचना तैयार किए जाने की ईमानदार कोशिशें शुरू हुईं। कांशीराम के वैचारिक दर्शन में डाॅ. भीमराव अंबेडकर से आगे जाने की सोच तो थी ही दलित और वंचितों को करिश्माई अंदाज में लुभाने की प्रभावशाली शक्ति भी थी। 

यही वजह थी कि बसपा दलित संगठन के रूप में मजबूती से स्थापित हुई, लेकिन कालांतर में मायावती की पद व धनलोलुपता ने बसपा के बुनियादी ढांचे में विभिन्न जातिवादी बेमेल प्रयोगों का तड़का लगाकर उसके मूल सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ ही कर डाला। इसी फाॅर्मूले को अंजाम देने के लिए मायावती ने 2007 के विधानसभा चुनाव में दलित और ब्राह्मणों का गठजोड़ करके उत्तर प्रदेश का सिंहासन हासिल किया लेकिन 2012 आते-आते ब्राह्मण व अन्य सवर्ण जातियों के साथ मुसलमानों का भी मायावती की कार्य-संस्कृति से मोहभंग हो गया। 

नतीजतन, सपा ने सत्ता की बाजी जीत ली थी। किंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में एकबार फिर सपा और बसपा मोदी को चुनौती देने के लिए इस मंसूबे के साथ एकजुट हुए कि दलित, यादव और मुस्लिमों के वोट एकमुश्त मिल जाएंगे तो सपा-बसपा गठबंंधन की नैया पार हो जाएगी। लेकिन मोदी द्वारा चलाई गई राष्ट्रवाद की आंधी में सभी मंसूबे ध्वस्त हो गए।

हालांकि मायावती अपने बेमेल गठबंधनों के चलते उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बना लेने के साथ पार्टी को अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित करने में सफल रही हैं। लेकिन मोदी-लहर के आते ही बेमेल गठबंधनों का दौर खत्म हो गया। इसके साथ ही बसपा के लिए दुर्गति का दौर शुरू हो गया। नतीजतन 2014 के लोकसभा चुनाव में वह एक भी सीट नहीं जीत पाई। उत्तर प्रदेश में अपने ही दल के बूते बहुमत की सरकार बना चुकी बसपा को 2017 के विधानसभा चुनाव में महज 19 सीटों पर बमुश्किल जीत मिल पाई। लेकिन 2019 में हुए आम चुनाव में भतीजे अखिलेश यादव को तो कोई राजनैतिक लाभ नहीं हुआ लेकिन मायावती ने 10 सीटें जीतकर लोकसभा में अपनी उपस्थिति मजबूत कर ली है।

हालांकि मायावती की तो यह कार्य-संस्कृति ही रही है कि उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं का जब जैसा चाहा इस्तेमाल किया और जब कोई नेता कानून के शिकंजे में फंस गया तो उसे तत्काल पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। किंतु अब नरेंद्र मोदी के केंद्रीय सत्ता में काबिज होने के बाद राजनीतिक चाल और चरित्र बदल रहा है। अब महज जातीय और सांप्रदायिक समीकरणों के बूते राजनीति करना मुश्किल हो गया है। मतदाताओं का जाति, धर्म और क्षेत्रीय भावनाओं से मोहभंग हो रहा है। इस लिहाज से अब वही दल और नेता राजनीति की मुख्यधारा में रह पाएंगे, जो अपने तौर-तरीके पूरी तरह बदल लेंगे। 

कांग्रेस जो राष्ट्रीय पार्टी है, उसका दायरा लगातार इसीलिए सिमट रहा है क्योंकि वह न तो चेहरा बदलने को तैयार है और न ही तौर-तरीके। राजनीति में आ रहे बदलाव इस बात के भी संकेत हैं कि अब दलों को संगठन के स्तर पर मजबूत होने के साथ नैतिक दृष्टि से भी मजबूती दिखानी होगी। क्योंकि बेनामी संपंत्ति के खिलाफ कानून को 2016 में संशोधित करके मजबूत कर दिया गया है। इसलिए देश में भाई-भतीजों के रूप में जितने भी आनंद कुमार हैं, उनका आनंद अब सुरक्षित नहीं है।

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