संजीवनी टुडे

पुस्तकालय को बनाएं युवा अपना मित्र

बाल मुकुन्द ओझा

संजीवनी टुडे 14-11-2019 14:51:25

भारत में राष्ट्रीय पुस्तकालय सप्ताह 14 से 20 नवंबर तक मनाया जाता है। इस अवसर पर आमजन को पुस्तक और पुस्तकालय की महत्ता की जानकारी दी जाती है।


भारत में राष्ट्रीय पुस्तकालय सप्ताह 14 से 20 नवंबर तक मनाया जाता है। इस अवसर पर आमजन को पुस्तक और पुस्तकालय की महत्ता की जानकारी दी जाती है। यह भी बताया जाता है लाइब्रेरियां ज्ञान का भंडार हैं और छात्रों को रोजाना लाइब्रेरी जाना चाहिए और किताबों को अपना दोस्त बनाना चाहिए। पुस्तकालय वह स्थान है जहाँ विविध प्रकार के ज्ञान, सूचनाओं, स्रोतों, सेवाओं,सन्दर्भों आदि का संग्रह होता है। पुस्तकालय शब्द अंग्रेजी के लाइब्रेरी शब्द का हिंदी रूपांतर है।

लाइबेरी शब्द की उत्पत्ति लेतिन शब्द लाइवर से हुई है, जिसका अर्थ है पुस्तक। 1713 ई. में अमरीका के फिलाडेलफिया नगर में सबसे पहले चंदे से चलनेवाले एक सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना हुई। लाइब्रेरी ऑव कांग्रेस अमरीका का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। इसकी स्थापना वाशिंगटन में सन 1800 में हुई थी। इसमें ग्रंथों की संख्या साढ़े तीन करोड़ है। पुस्तकालय में लगभग 2,400 कर्मचारी काम करते हैं।
जिस पुस्तकालय का उद्देश्य संपूर्ण राष्ट्र की सेवा करना होता है उसे राष्ट्रीय पुस्तकालय कहते हैं। भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय कोलकाता में स्थित है। इस सार्वजनिक पुस्तकालय  की स्थापना  21 मार्च, 1836 ई. हुई। यहाँ करीब 1800000 पुस्तकों तथा दस्तावेजों का संग्रह है।

पुस्तकालय दो शब्दों को लेकर बना है। पुस्तक़ और आलय अर्थात् पुस्तक का घर जहाँ विभिन्न प्रकार की पुस्तकें होती हैं। पुस्तकालय अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे निजी पुस्तकालय, विद्यालय और महाविद्यालयों  के पुस्तकालय, सार्वजनिक पुस्तकालय आदि। पुस्तकालय ज्ञान के मंदिर हैं । पुस्तकालय में बैठकर कोई भी व्यक्ति एक ही विषय पर अनेक व्यक्तियों के विचारों से परिचित हो सकता है। पुस्तकालय से हम अपनी आवश्यकता और रूचि  की पुस्तकें प्राप्त कर उनका अध्ययन करके अपने ज्ञान में वृद्धि कर सकते हैं। पुस्तकालय हमारे राष्ट्र के विकास की अनुपम धरोहर हैं। यहाँ यह कहा जाना समीचीन होगा की भारत में आज भी गावं गावं में पुस्तकालय  है मगर वहां जाने वाले लोगों की संख्या नगण्य है। ऐसा लगता है प्रगति और विज्ञानं की दौड़ में हमने पुस्तकालयों से अपनी दूरी बना ली है।
आज का युवा पुस्तक और पुस्तकालय का मतलब पाठ्यपुस्तक ही समझता है। स्कूल और कॉलेज में पुस्तक लाइब्रेरी जरूर है मगर उसमें जाने का समय विद्यार्थी के पास नहीं है। कक्षा में विषयों के पीरियड अवश्य होते है खेलकूद का भी समय होता है मगर पुस्तक पढ़ने अथवा पुस्तकालय का कोई पीरियड नहीं होता। अध्यापक भी बच्चों को पुस्तक या सद साहित्य पढ़ने संबंधी कोई जानकारी नहीं देते। यही कारण है कि इन्टरनेट के इस युग में हम पुस्तक को भूल गए है। पढ़ने का मतलब इस संचार क्रांति में इन्टरनेट ही रह गया है युवा चैबीसों घंटे हाथ में मोबाइल लिए इन्टरनेट पर चैट करते मिल गाएंगे। वे पुस्तक से परहेज करने लगे है मगर मोबाइल को रिचार्ज करना नहीं भूलते। उन्हें घर या बाहर यह बताने वाला कोई नहीं है की पुस्तकों का भी अपना एक संसार है। वे प्रेमचंद की किसी पुस्तक के बारे में नहीं जानते। कॉमेडियन कपिल के शो के बारे में जरूर जानते है। शरत चंद्र या हरिशंकर परसाई की किसी शख्सियत से वाकिफ नहीं है।

 जमाना जिस तेजी से बदल रहा है उसे देखते हुए लगता है पुस्तक और पुस्तकालय अब गुजरे जमाने की चीज रह जाएगी अब उन्हें कौन समझाएं की उसके अभिभावक पुस्तक के ज्ञान को सहेज कर आगे बढे है। अब तो गली मोहल्ले में कोई वाचनालय या पुस्तकालय भी नहीं है। जहाँ शांति से बैठकर पढ़ा जाये।  यदि कहीं ऐसी जगह भूल से मिल भी जाये तो उनका मोबाइल उसे पढ़ने नहीं देगा। आखिर वह कैसे पुस्तक के बारे में जाने और ज्ञान प्राप्त करें।

आम आदमी के विकास के लिए जरूरी शिक्षा और साक्षरता का एकमात्र साधन किताबें हैं।  आज संचार क्रांति ने पुस्तकों से उसके पाठक छीन लिये है ऐसे में हमारे कंधो पर बड़ी चुनौती है। पुस्तक ज्ञान का अकूत भंडार ही नहीं हमारे सच्चे मित्र भी हैं। पुस्तक के बगैर ज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती है। ये हमें ज्ञान प्रदान करती हैं। आज महात्मा गांधी तथा महात्मा बुद्ध जैसे महान व्यक्तित्वों के सिद्धांतों को पुस्तकों के माध्यम से ही जाना जा रहा है। कहानियों के जरिये बच्चे बहुत सी नई चीजों को सीखते हैं। पुस्तकों का अध्ययन कम हो गया है।

पुस्तकें चरित्र निर्माण का सर्वोत्तम साधन हैं । उत्तम विचारों से युक्त पुस्तकों के प्रचार और प्रसार से राष्ट्र के युवा कर्णधारों को नई दिशा दी जा सकती हैं । देश की एकता और अखंडता का पाठ पढ़ाया जा सकता है और एक सबल राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है । पुस्तकें पढ़कर जीवन में कुछ महान कर्म करने की भावना जागती है । महात्मा गाँधी को महान बनाने में गीता, टालस्टाय और थोरो का भरपूर योगदान था। इंटरनेट और ई-पुस्तकों की व्यापक होती पहुंच के बावजूद छपी हुई किताबों का महत्व कम नहीं हुआ है और वह अब भी प्रासंगिक हैं ।

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