संजीवनी टुडे

प्रासंगिक है महावीर की अमृतवाणी: योगेश कुमार गोयल

संजीवनी टुडे 15-04-2019 10:17:05


'अहिंसा परमो धर्मः' सिद्धांत के लिए जाने जाते रहे भगवान महावीर का अहिंसा दर्शन आज के समय में सर्वाधिक प्रासंगिक हो गया है। मनुष्य अपने स्वार्थ के वशीभूत कोई भी अनुचित कार्य करने में गुरेज नहीं करता। यहां तक कि अपने फायदे के लिए वह हिंसा के लिए भी तत्पर दिखाई देता है। 

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आज के परिवेश में हम जिस प्रकार की समस्याओं और जटिल परिस्थितियों में घिरे हैं, उन सभी का समाधान भगवान महावीर के दर्शन में समाहित है। अपने जीवनकाल में उन्होंने ऐसे अनेक उपदेश और अमृत वचन दिए, जिन्हें आचरण में अमल में लाकर हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं।

उनका कहना था कि संसार के सभी प्राणी बराबर हैं। अतः हिंसा को त्यागिये और 'जीओ व जीने दो' का सिद्धांत अपनाइए। महावीर अक्सर कहते थे कि जिस प्रकार अणु से छोटी कोई वस्तु नहीं और आकाश से बड़ा कोई पदार्थ नहीं, उसी प्रकार अहिंसा के समान संसार में कोई महान व्रत नहीं है। 

उनका मानना था कि जो मनुष्य स्वयं प्राणियों की हिंसा करता है या दूसरों से हिंसा करवाता है अथवा हिंसा करने वालों का समर्थन करता है, वह जगत में अपने लिए वैर बढ़ाता है। महावीर की मान्यता थी कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है और अहिंसा, तप व संयम उसके प्रमुख लक्षण हैं। जिन व्यक्तियों का मन सदैव धर्म में रहता है, उन्हें देव भी नमस्कार करते हैं।

महावीर कहते थे कि मानव व पशुओं के समान पेड़-पौधों, अग्नि, वायु में भी आत्मा वास करती है। इसलिए पेड़-पौधों में भी मनुष्य के समान सुख-दुख अनुभव करने की शक्ति होती है। उनका दृढ़ मत था कि जिस जन्म में कोई भी जीव जैसा कर्म करेगा, भविष्य में उसे वैसा ही फल मिलेगा। वह कर्मानुसार ही देव, मनुष्य व पशु-पक्षी की योनि में भ्रमण करेगा।

महावीर कहते थे कि कर्म स्वयं प्रेरित होकर आत्मा को नहीं लगते बल्कि आत्मा कर्मों को आकृष्ट करती है। जिस मनुष्य का मन सदैव अहिंसा, संयम, तप और धर्म में लगा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। धर्म का स्थान आत्मा की आंतरिक पवित्रता से है। 

बाह्य साधन धर्म के एकान्त साधक व बाधक नहीं हो सकते। उनकी मान्यता थी कि संसार का प्रत्येक प्राणी धर्म का अधिकारी है। वह कहते थे कि क्रोध प्रेम का नाश करता है। मान विषय का, माया मित्रता का और लालच सभी गुणों का नाश करती है। जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे पाप बढ़ाने वाले चार दोषों क्रोध, मान, माया और लालच का त्याग कर देना चाहिए।

महावीर रूग्णजनों की सेवा-सुश्रुषा के कार्य को प्रभु की परिचर्या से भी बढ़कर मानते थे। वह कहते थे कि वासना, विकार व कर्मजाल को काटकर नारी व पुरूष दोनों समान रूप से मुक्ति पाने के अधिकारी हैं। जब तक कर्म बंधन है, तब तक संसार मिट नहीं सकता। गति भ्रमण ही संसार है। छोटे-बड़े किसी भी प्राणी की हिंसा न करना, बिना दी गई वस्तु स्वयं न लेना, विश्वासघाती असत्य न बोलना आत्मा निग्रह सद्पुरूषों का धर्म है।

भगवान महावीर कहते थे कि ज्ञानी होने का यही एक सार है कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा न करे। यही अहिंसा का विज्ञान है। जो लोग कष्ट में अपने धैर्य को स्थिर नहीं रख पाते, वे अहिंसा की साधना नहीं कर सकते। अहिंसक व्यक्ति तो अपने से शत्रुता रखने वालों को भी अपना प्रिय मानता है। संसार में रहने वाले चल और स्थावर जीवों पर मन, वचन एवं शरीर से किसी भी तरह के दंड का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 

वह कहते थे कि ब्राह्मण कुल में पैदा होने के बाद यदि कर्म श्रेष्ठ हैं, वही व्यक्ति ब्राह्मण है किन्तु ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी यदि वह हिंसाजन्य कार्य करता है तो वह ब्राह्मण नहीं है। इसके विपरीत नीच कुल में पैदा होने वाला व्यक्ति अगर सुआचरण, सुविचार एवं सुकृत्य करता है तो वह बाह्मण है। 

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प्रत्येक प्राणी एक जैसी पीड़ा का अनुभव करता है और हर प्राणी का एकमात्र लक्ष्य मुक्ति ही है। आत्मा शरीर से भिन्न है। आत्मा चेतन है, आत्मा नित्य है, आत्मा अविनाशी है। आत्मा शाश्वत है। वह कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेती है। इसलिए कहना न होगा कि महावीर के उपदेश आज ज्यादा प्रासंगिक हैं।

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