संजीवनी टुडे

महासंग्राम-2019: पंजाब में किस करवट बैठेगा ऊंट?

योगेश कुमार गोयल

संजीवनी टुडे 15-05-2019 21:52:09


दिल्ली तथा हरियाणा में 12 मई को मतदान प्रक्रिया सम्पन्न हो जाने के पश्चात् अब सभी की नजरें पड़ोसी राज्य पंजाब पर केन्द्रित हैं, जहां चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण में 19 मई को सभी 13 सीटों अमृतसर, आनंदपुर साहिब, भटिंडा, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालंधर, खडूर साहिब, लुधियाना, पटियाला तथा संगरूर के लिए 2.03 करोड़ मतदाता कुल 278 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करेंगे। करीब दो तिहाई मतदाता ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां देशभर में प्रचंड मोदी लहर के बावजूद भाजपा केवल दो सीटें जीतने में ही सफल हो सकी थी जबकि भाजपा की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) 4 सीटें, कांग्रेस 3 सीटें तथा पंजाब में पहली बार चुनाव लड़ने वाली ‘आप’ 4 सीटें झटकने में कामयाब हुई थी। बाद में उपचुनाव में भाजपा ने एक सीट गंवा दी थी और कांग्रेस की सीटों की संख्या बढ़कर 4 हो गई थी। 2009 के चुनाव में ‘आप’ का कोई अस्तित्व ही नहीं था, अतः मुकाबला भाजपा-शिअद गठबंधन तथा कांग्रेस के बीच ही सीमित था। तब कांग्रेस को 8 और इस गठबंधन को 5 सीटें मिली थी।
 
2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 45.23 फीसदी, अकाली दल को 33.85 फीसदी तथा भाजपा को 10.06 फीसदी मत मिले थे किन्तु 2014 में आप के भी मैदान में आ जाने से स्थितियां बदली और कांग्रेस का मत प्रतिशत गिरकर 33.1 फीसदी रह गया था जबकि अकाली दल का मत प्रतिशत भी 26.3 फीसदी पर आ गया था और सहयोगी भाजपा को महज 8.7 फीसदी वोट ही मिले थे। पहली बार चुनाव लड़ने वाली आप को रिकॉर्ड 24.4 फीसदी वोट मिले थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में आप का जहां 23.7 फीसदी मतों के साथ अपना मत प्रतिशत लगभग स्थिर रखने में सफल रही, वहीं कांग्रेस अपनी स्थिति सुधारते हुए 38.5 फीसदी मतों के साथ विजयी रही। शिअद को 25.2 और भाजपा को महज 5.4 फीसदी मत ही प्राप्त हुए।
 
2014 में पहली बार आप पंजाब में एक प्रमुख पार्टी बनकर उभरी, जिसने देशभर में 4 सीटों पर विजय प्राप्त की और ये चारों सीटें पंजाब की ही थी लेकिन पिछले साल राज्य में भारी टूट-फूट की शिकार हो चुकी आप की स्थिति अब पहले जितनी मजबूत नहीं रही है किन्तु फिर भी इस बार कांग्रेस, अकाली-भाजपा गठबंधन तथा आप के बीच ही त्रिकोणीय मुकाबला है। वैसे अकाली-भाजपा गठबंधन तथा आप के लिए पिछली जीत को दोहरा पाना इतना आसान नहीं लगता। भाजपा तो पंजाब में अपना अस्तित्व बनाए रखने की ही लड़ाई लड़ रही है, आप की हालत बेहद खस्ताहाल है। ऐसे में स्पष्ट है कि मुख्य मुकाबला कांग्रेस तथा शिअद के बीच ही होना तय है। वैसे आप के साथ-साथ शिअद भी आंतरिक कलह और विभाजन की स्थिति का सामना कर रही है।
 
वयोवृद्ध प्रकाश सिंह बादल की सक्रियता बेहद कम हो गई है और पार्टी अध्यक्ष सुखबीर बादल ही पार्टी को सक्रिय रखने की कोशिशों में जुटे नजर आते हैं लेकिन उनके पास मजबूत प्रत्याशियों की कमी साफ झलकती है। इन परिस्थितियों में 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिअद गठबंधन को पटखनी देते हुए तीन चौथाई सीटों पर परचम लहरा चुकी कांग्रेस अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई पड़ती है। दस साल तक सत्ता पर काबिज रहे भाजपा-अकाली दल गठबंधन को 117 में से 20 सीटें भी नहीं मिली थी और आप पहली बार पंजाब में दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी थी, जिसके बाद लगने लगा था कि राज्य में अगली सरकार आप की भी हो सकती है लेकिन बुरी तरह से आंतरिक फूट का शिकार हुई आप ने बहुत थोड़े ही समय में राज्य में अपना आधार खो दिया है। प्रदेश की राजनीति में दबदबा रखने वाले उसके कई बड़े नेता पार्टी मुखिया केजरीवाल के कुछ मनमाने फैसलों से खफा होकर पार्टी को अलविदा कह दूसरे दलों का थामन चुके हैं तो कुछ ने आप से अलग होकर अपनी ही पार्टी बना ली।
 
वर्ष 2004 में पंजाब में लोकसभा चुनाव ‘शाइनिंग इंडिया’ तथा सोनिया गांधी के विदेशी मूल जैसे देशव्यापी मुद्दों पर लड़ा गया था, वहीं 2009 में सिख समुदाय के डा. मनमोहन सिंह के आर्थिक विकास के नारे की गूंज स्पष्ट सुनाई दी थी। 2014 का चुनाव तो पूरी तरह नरेन्द्र मोदी के नाम पर ही लड़ा गया था किन्तु प्रदेश की राजनीति में यह पहला अवसर है, जब लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय खेती-किसानी से जुड़े मसलों, किसानों की कजर्माफी, पंजाब को नशामुक्त करने जैसे स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जा रहा है। हालांकि विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने सरकार बनने पर चार हफ्तों में नशा खत्म करने का वादा किया था। सरकार बनने पर दो साल के भीतर दो लाख से ज्यादा नशा कारोबारियों को जेल भेजने का दावा भी किया गया किन्तु उनमें ड्रग रैकेट चलाने वाले बड़े लोग न होकर अधिकांश नशा करने वाले व्यक्ति ही शामिल हैं। विपक्ष इस मुद्दे पर भी कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रहा है।

कांग्रेस ने हालांकि लोकसभा चुनावों को ‘मिशन-13’ नाम दिया है किन्तु हाल ही में कांग्रेस के थिंकटैंक माने जाने वाले सैम पित्रोदा के सिख दंगों संबंधी दिए गए असंवेदनशील बयान ने अपने इस मजबूत गढ़ में भी पार्टी को फ्रंटफुट से बैकफुट पर आने को मजबूर कर दिया है। बड़बोले सिद्धू के चलते पार्टी पहले ही संकटों से घिरी रही है। आप से एनआरआई समुदाय के मोहभंग को भुनाने के लिए सैम की अगुवाई में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस पिछले काफी समय से सक्रिय थी और इसमें कांग्रेस को लाभ मिलता भी दिखाई दे रहा था लेकिन सैम के ‘हुआ तो हुआ’ बयान ने सारे किये कराये पर पानी फेर दिया। अब पंजाब में सिख समुदाय के आक्रोश से बचने के लिए पार्टी डा. मनमोहन सिंह तथा कै. अमरिन्दर सिंह सरीखे नेताओं की साख का इस्तेमाल कर रही है। राज्य में जहां करीब 38.5 फीसदी हिन्दू आबादी है, वहीं सिखों की आबादी करीब 58 फीसदी है। मुस्लिम 1.9 फीसदी तथा ईसाई आबादी 1.3 फीसदी ही है। ऐसे में सिख समुदाय के मतों महत्व को बखूबी समझा जा सकता है। एक ओर जहां कांग्रेसी नेताओं के बयान उसके गले की फांस बनते जा रहे हैं, वहीं दो साल से सत्ता में होने के बावजूद अधिकांश वायदे पूरे न होना कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकता है तो दूसरी ओर अकाली-भाजपा के पास मोदी सरकार की चंद उपलब्धियों का हवाला देने के सिवा पिटारे में और कुछ नहीं है।

राज्य की 13 में से पांच सीटें बठिंडा, फिरोजपुर, संगरूर, गुरदासपुर तथा पटियाला सबसे हॉट मानी जा रही हैं, जिनके चुनाव परिणामों पर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें टिकी रहेंगी। बठिंडा तथा फिरोजपुर सीटें शिअद के लिए अस्तित्व का सवाल बन चुकी हैं। बठिंडा से शिअद की मौजूदा सांसद हरसिमरत कौर को कांग्रेस के राजा वडि़ंग, आप की बलजिंदर कौर तथा पंजाब डेमोक्रेटिक अलायंस के सुखपाल सिंह खैरा चुनौती दे रहे हैं लेकिन यहां तीनों दलों के मतों का विभाजन होने से शिअद को लाभ मिलने का अनुमान है। 25 वर्षों से लगातार अकाली दल के ही कब्जे में रही फिरोजपुर सीट से अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल को दो बार इसी सीट से अकाली दल के ही सांसद रह चुके शेर सिंह घुबाया इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनौती देने के लिए मैदान में हैं। सिख बहुल इस सीट पर घुबाया को मजबूत प्रत्याशी माना जा रहा है किन्तु बादल को भी कमतर आंकना ठीक नहीं होगा। वैसे घुबाया के कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरने से सिख समुदाय का एक वर्ग नाराज भी है। अब इस नाराजगी को अपने पक्ष में बदलने में बादल कितने कामयाब होंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।

संगरूर सीट से आप के प्रदेशाध्यक्ष व सांसद भगवंत मान को कांग्रेस के केवल सिंह ढिल्लों तथा शिअद के पूर्व वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींढसा चुनौती दे रहे हैं। इस इलाके में मान की छवि बहुत अच्छी और मजबूत मानी जाती है। पंजाब की एकमात्र यही सीट है, जहां से ‘आप’ के लिए कुछ संभावनाएं नजर आती हैं और यही सीट प्रदेश में आप के अस्तित्व के लिए भी निर्णायक साबित होगी। गुरदासपुर सीट से कांग्रेस ने प्रदेशाध्यक्ष सुनील जाखड़ को मैदान में उतारा है, जिन्हें चुनौती देने लिए भाजपा ने बालीवुड अभिनेता सनी देओल पर दांव लगाया है। हालांकि देओल द्वारा रोड़ शो में जबरदस्त भीड़ जुटाने से इस सीट पर चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है लेकिन यह भीड़ वोटों में परिवर्तित होगी, कहना मुश्किल है। इस सीट से सातों विधायक कांग्रेस के ही हैं, ऐसे में जाखड़ की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। पटियाला वीवीआईपी सीट है, जो मुख्यमंत्री कै. अमरिंदर सिंह का गढ़ है और यह सीट उनके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है। यहां से उनकी पत्नी परनीत कौर कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। पिछली बार परनीत ‘आप’ प्रत्याशी धर्मवीर गांधी से पराजित हो गई थी किन्तु इस बार परिस्थितियां बिल्कुल अलग है, न तो राज्य में आप की कोई लहर है और न ही धर्मवीर गांधी आप के उम्मीदवार हैं। वह आप से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतरे हैं जबकि शिअद ने पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा को अपना उम्मीदवार बनाया है।

वैसे पंजाब की राजनीति में डेरों की भी बहुत बड़ी भूमिका रही है। यहां छोटे-बड़े करीब 9 हजार डेरे हैं, जिनके कई लाख ऐसे कट्टर समर्थक हैं, जो आंख मूंदकर इन डेरों के हर आदेश को शिरोधार्य करके चलते हैं। यही कारण है कि कमोवेश हर राजनीतिक दल इन डेरों को अपने-अपने तरीके से प्रभावित करने के प्रयासों में जुटा रहता है ताकि डेरों के समर्थकों के एकमुश्त वोट उन्हें मिल सकें। ऐसे में यह कहना असंगत नहीं होगा कि पंजाब के चुनाव में ये डेरे भी अपनी ताकत का अहसास बखूबी कराएंगे। बहरहाल, अब यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि पंजाब में लोकसभा चुनावों में ऊंट किस करवट बैठेगा?

More From editorial

Trending Now
Recommended