संजीवनी टुडे

महिला आरक्षण पर अभिनंदनीय पहल

प्रमोद भार्गव

संजीवनी टुडे 14-03-2019 10:57:29


लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात तो सभी राजनीतिक दल करते हैं, किंतु अपने स्तर पर अपने दल में इसकी पहल नहीं करते। अलबत्ता अब तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राज्य में पार्टी उम्मीदवारों के चयन में इसे अमलीजामा पहना दिया है। उन्होंने 41 प्रतिशत महिलाओं को उमीदवार बनाया है। इसी कड़ी में बीजू जनता दल के अध्यक्ष और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का नाम लिया जाना चाहिए। उन्होंने 17वीं लोकसभा के चुनाव में 33 प्रतिशत महिलाओं को उम्मीदवार बनाए जाने का निर्णय लिया है। पटनायक इससे पहले भी संसद और विधानसभा में महिलाओं के आरक्षण की पैरवी करते रहे हैं। 

हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी कह चुके हैं कि उनकी पार्टी केंद्र में आती है तो महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराया जाएगा। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो पंचायत चुनाव की तरह संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की सुविधा मिल जाएगी। फिलहाल यह विधेयक 9 मार्च 2010 में राज्यसभा से पारित होने के बाद ठंडे बस्ते में बंद है। सोनिया गांधी ने भी नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस विधेयक को पारित कराने की पहल की थी, लेकिन मोदी सरकार ने किन्हीं कारणों से उसे तवज्जो नहीं दी। 

16वीं लोकसभा में भाजपा स्पष्ट बहुमत में थी। वह चाहती तो विधेयक पारित कराने में कोई संशय ही नहीं था। इस मुद्दे को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा बुलाए गए महिला विधायकों के राष्ट्रीय सम्मेलन में भी उठाया था। तब प्रधानमंत्री ने बड़ी चतुराई से कह दिया था कि 'महिलाओं को सशक्त बनाने वाले पुरुष कौन होते हैं? देश के निर्माण में आधी आबादी की सशक्त भूमिका रही है और वह पुरुषों से बेहतर घर चलाती हैं।' 

लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव की तिकड़ी शुरू से इस विधेयक के पक्ष में नहीं हैं। 12 सितंबर 1996 को जब एचडी देवगौड़ा सरकार ने विधेयक को पेश करने की कोशिश की तो इन तीनों नेताओं ने इसका जबरदस्त विरोध किया था। तब अनमयस्क दिखी कांग्रेस देवगौड़ा सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी।

राज्यसभा से पारित इस विधेयक को कानूनी रूप लेने के लिए अभी लोकसभा और पन्द्रह राज्यों की विधानसभाओं का सफर तय करना होगा। इसके कानून बनते ही ऐसे कई दोहरे चरित्र के चेहरे हाशिये पर चले जाएंगे, जो पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, गाहे-बगाहे बीते 21 सालों से गतिरोध पैदा किए हुए हैं। महिला आरक्षण विधेयक का मूल प्रारूप संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान गीता मुखर्जी ने तैयार किया था। लेकिन अक्सर इस विधेयक को लोकसभा सत्र के दौरान अंतिम दिनों में पटल पर रखा गया।

 इससे यह संदेह हमेशा बना रहा कि एचडी देवगौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की सरकारें इसे टालती रही हैं। गठबंधन के दबाव और राजनीतिक असहमतियों के चलते इस पर निर्णय नहीं ले सकीं। मनमोहन सिंह ने जरूर इसे 2010 में राज्यसभा से पारित करा दिया था। लेकिन उनकी सरकार को अपने ही सहयोगी दलों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था। यहां तक की समर्थक दलों ने कांग्रेस को समर्थन वापसी की धमकी भी दी थी।

 हालांकि प्रजातंत्र में तार्किक असहमतियां, संवैधानिक अधिकारों व मूल्यों को मजबूत करने का काम करती हैं, लेकिन असहमतियां जब मुट्ठीभर सांसदों की अतार्किक हठधर्मिता का पर्याय बन जाएं तो ये संसद की गरिमा को ठेंगा दिखाने वाली साबित होती हैं।

उस समय विधेयक से असहमत दलों की प्रमुख मांग थी कि '33 फीसदी आरक्षण के कोटे में पिछड़े और मुस्लिम समुदायों की महिलाओं को विधान मंडलों में आरक्षण का प्रावधान रखा जाए।' जबकि संविधान के वर्तमान स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के समुदायों को आरक्षण की सुविधा हासिल है। ऐसे में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को लाभ कैसे संभव है? हमारे लोकतांत्रिक संविधान में धार्मिक आधार पर किसी भी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। लिहाजा इस बिना पर मुस्लिम महिलओं को आरक्षण की सुविधा कैसे हासिल हो सकती है ?
आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने सच्चर व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को आधार मानते हुए मुसलमान व ईसाईयों को नौकरियों में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन न्यायालयों ने इन्हें संविधान-विरोधी फैसला जताकर खारिज कर दिया था।

दरअसल इस कानून के वजूद में आ जाने के बाद अस्तित्व का संकट उन काडरविहीन दलों को है, जो व्यक्ति आधारित दल हैं। इसी कारण लालू, मुलायम और शरद यादव इस बिल के विरोध में खड़े हो जाते हैं। उत्तरप्रदेश और बिहार में जातीयता के बूते क्रियाशील इन यादवों की तिकड़ी का दावा रहता है कि इस अलोकतांत्रिक विधेयक के पास होने के बाद पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के लिए जम्हूरियत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। हालांकि, इनकी वास्तविक चिंता यह नहीं है। दरअसल 33 फीसदी आरक्षण के बाद बाहुबली बने पिछड़े वर्ग के आलाकमानों का लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक आधार तो सिमटेगा ही, सदनों में संख्याबल की दृष्टि से भी इन दलों की ताकत घट जाएगी। 

अन्यथा ये सियासी दल वाकई उदार और पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के ईमानदारी से हिमायती हैं, तो सभी आरक्षित सीटों पर इन्हीं वर्गों से जुड़ी महिलाओं को उम्मीदवार बना सकते हैं। साथ ही अनारक्षित सीटों का भी इन्हें प्रतिनिधित्व सौंप सकते हैं। दरअसल, इन कुटिल राजनेताओं के दिखाने और खाने के दांत अलग-अलग हैं। 

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