संजीवनी टुडे

मरांडी की घर वापसी के निहितार्थ

बद्रीनाथ वर्मा

संजीवनी टुडे 22-02-2020 11:47:30

झारखंड और दिल्ली में मिली हार के बाद भारतीय जनता पार्टी पुराने ढर्रे पर चलने के बजाय नई रणनीति अपनाने पर जोर दे रही है।


रांची। झारखंड और दिल्ली में मिली हार के बाद भारतीय जनता पार्टी पुराने ढर्रे पर चलने के बजाय नई रणनीति अपनाने पर जोर दे रही है। पार्टी राज्यों में अब 50 प्रतिशत वोट हासिल करने के लिए नई रणनीति पर विचार कर रही है। इसके लिए लोकप्रिय स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा देने और समान विचारधारा वाले क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी की घर वापसी को इसी नजरिये से देखा जा रहा है। मरांडी, करिया मुंडा, जुएल ओराव और नंद कुमार साय उन आदिवासी नेताओं में शामिल थे, जिन्‍हें राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ ने तैयार किया था। बहरहाल, 14 साल बाद बाबूलाल मरांडी की भाजपा में वापसी जहां पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, खुद मरांडी के लिए भी यह राजनीतिक जीवनदान की तरह है। मरांडी ने 2006 में भाजपा से अलग होकर झारखंड विकास मोर्चा नाम से पार्टी तो बना ली लेकिन कुछ खास कमाल नहीं कर पाये। 2014 में उनकी पार्टी के 9 विधायक चुने गये थे लेकिन उनमें से छह सूबे में रघुवर दास के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद भाजपा में शामिल हो गये थे।

2019 के चुनाव में मुख्यमंत्री रघुवर दास से नाराजगी की वजह से झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त मिली। यह नाराजगी कितनी गहरी थी इसे इसी से जाना जा सकता है कि खुद रघुवर दास को उन्हीं के मंत्रीमंडलीय सहयोगी रहे सरयू राय के हाथों हार का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके कि सरयू राय मुख्यमंत्री के खिलाफ बतौर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे थे। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवेलपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार के मुताबिक इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश में सबसे लोकप्रिय नेता हैं लेकिन प्रदेशों के चुनाव में उनकी सीमाएं हैं। मतदाता अब देश और राज्य के आधार पर अलग-अलग सोच-विचार कर मतदान करता है।

पिछले छह साल में राज्‍यों में नए तरह के नेतृत्‍व को लेकर भाजपा ने कई प्रयोग किए। हालांकि ऐसे प्रयोग नाकाम साबित हुए। हरियाणा में सरकार चलाने के लिए जहां क्षेत्रीय दल पर निर्भर होना पड़ा है। वहीं, महाराष्‍ट्र में पार्टी जीत कर भी हार चुकी है। ऐसे में बाबूलाल मरांडी की वापसी को भाजपा की ओर से अबतक की गई गलतियों में सुधार के तौर पर देखा जा रहा है। पांच साल तक राज्य के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री रहने के बाद रघुवर दास की हार भाजपा को अखर गई। पार्टी को अब ऐसे नेता की तलाश थी जो आदिवासी तो हो ही उसकी राज्य की राजनीति में स्वीकार्यता भी हो। कारण, राज्य की 28 आदिवासी बहुल सीटों में से पार्टी को 26 सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा। ऐसे में भाजपा की तलाश अपने ही पुराने सिपहसालार बाबूलाल मंराडी पर आकर खत्म हुई। बाबूलाल मरांडी को भी अपने राजनीतिक भविष्य के लिए एक मजबूत कंधे की जरूरत थी क्योंकि उनकी पार्टी भी इस चुनाव में हेमंत, कांग्रेस व राजद की तिकड़ी की हवा में हवा हवाई साबित होकर महज तीन सीटें जीत पाई। बाबूलाल मरांडी की 14 साल बाद हुई घर वापसी के साथ झारखंड की राजनीति का नया अध्याय शुरू हो चुका है।

बहरहाल, दिल्ली में चुनावी हार के बाद हुई समीक्षा बैठकों में मौजूद सूत्रों के मुताबिक झारखंड और दिल्ली के चुनावों में बतौर मुख्यमंत्री कोई सशक्त चेहरा नहीं देने का बेशक कुछ न कुछ नुकसान हुआ है। झारखंड में मुख्यमंत्री रघुवर दास के नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव लड़ा था, जिनके खिलाफ कार्यकर्ताओं में जबरदस्त नाराजगी थी। वहीं, दिल्ली में भाजपा ने किसी को भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया। सूत्रों की मानें तो भाजपा भविष्य में प्रदेशों में होने वाले चुनावों में, जहां संभव होगा, मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार देने को प्राथमिकता देगी। उल्लेखनीय है कि 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर 15 राज्यों में 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिले, जबकि बिहार और महाराष्ट्र में वह अपने साथी दलों के साथ क्रमश: 52 और 50 प्रतिशत मत हासिल करने में सफल रही।

लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद हरियाणा और झारखंड में पार्टी बहुमत का आंकड़ा हासिल नहीं कर सकी और तमाम कोशिशों के बाद भी दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा में दहाई का आंकड़ा तक नहीं छू पाई। जाहिर है लोकसभा चुनाव के बाद लगातार मिल रही पराजय ने पार्टी को चुनावी रणनीति बदलने के लिए बाध्य कर दिया है। बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भाजपा का मुकाबला क्षेत्रीय दलों से ही है। पार्टी का जोर अब 50 फीसदी से अधिक वोट हासिल करने की है। इसके लिए प्रदेश नेतृत्व में फेरबदल के साथ ही क्षेत्रीय दलों से गठजोड़ की रणनीति पर गंभीर मंथन चल रहा है।

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