संजीवनी टुडे

धरोहरों की अनदेखी चिंताजनक

संजीवनी टुडे 15-04-2019 15:20:27


दुनिया में संभवतः भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां के भूगोल में विविधता बिखरी पड़ी है। इसीलिए भारत को 'विविधता में एकता' का संदेश देने वाली कहावत से जाना जाता है। लेकिन भारत में इतिहास पुरातत्व, संस्कृति और साहित्य से जुड़े ऐसे अनेक स्थल और पुस्तकें हैं, जिनका विश्व धरोहर सूची में शामिल न होना चिंताजनक है। यूनेस्को यानी 'संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संगठन' द्वारा जिन धरोहरों को 'विश्व धरोहर' में शामिल किया जाता है, वह इस संगठन के मानदंडों के अनुरूप सबसे ज्यादा कहीं हैं तो भारत में हैं। भारत में भी विविध आयामों में यदि ये प्रकृति प्रदत्त अथवा मानव निर्मित विरासतें सबसे अधिक कहीं हैं तो वे मध्यप्रदेश और अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा रहे छत्तीसगढ़ में हैं। विडंबना है कि इस संगठन के 16 नवंबर 1945 को अस्तित्व में आने से लेकर अब तक देश की केवल 37 और मध्यप्रदेश की केवल तीन धरोहर खजुराहो, सांची और भीमबेटका को ही विश्व धरोहर की श्रेणी में लिया गया है। छत्तीसगढ़ की तो एक भी धरोहर इसमें शामिल नहीं है। छत्तीसगढ़ के सिरपुर स्मारकों को जरूर इस श्रेणी में स्थान दिलाने के प्रयास हो रहे हैं। ओरछा को भी विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की कोशिश तेज हुई है। सूची में भारत की कुल 1074 धरोहरें दर्ज हैं।

प्राचीन ग्रंथ वेद भी गड़रियों के गीत के रूप में दर्ज हैं। 195 सदस्यीय देशों के इस संगठन का मुख्यालय फ्रांस की राजधानी पेरिस में है। धरोहर या विरासत शब्द का स्मरण होते ही पर्यटन की जिज्ञासा अनायास ही मन-मष्तिष्क में जग जाती है। प्राचीनकाल में पर्यटन शब्द का अर्थ सिर्फ भ्रमण से लिया जाता था। उस समय ये यात्राएं दीर्घकालिक व रोमांचकारी हुआ करती थीं। इनमें कोई बड़ा उद्देश्य भी अंतर्निहित रहता था। चीनी यात्री फाहयान ने भारत, श्रीलंका और नेपाल की यात्राएं बौद्ध ग्रंथों को इकट्ठा करने के लिए की थीं। भारत में यही काम राहुल सांस्कृत्यायन ने तिब्बत, नेपाल और चीन की यात्रा कर बड़ी संख्या में प्राचीन भारतीय साहित्य की पांडुलिपियां एकत्रित करके किया था। पुर्तगाली वास्को डी गामा ने भारत की यात्रा अपने व्यापार को भारत में स्थापित करने की दृष्टि से की थी। 20 मई 1498 को गामा केरल के कालीकट के समुद्री तट पर जहाज से पहुंचा था। उसने वहां के राजा जमूरिन से अरबी व फारसी व्यापारियों को बाहर करके पुर्तगालियों को राज्य का व्यापार सुपुर्द करने को कहा, किंतु राजा ने यह बात नहीं मानी। तब गामा लौट गया। लेकिन 1502 में 20 जहाजी बेड़ों के साथ लौटा। इनमें तोपें भी लदी थीं। कालीकट पर गामा ने तोपों से हमला करके उसे अपने अधीन कर लिया और वहां का व्यापार पुर्तगालियों के हवाले कर दिया। 1524 में उसकी कोच्चि में मलेरिया से मौत हो गई।

चार्ल्स डार्विन की समुद्री यात्रा बेहद महत्वपूर्ण थी। वह 22 साल की उम्र में ही बीगल नाम के जहाज पर सवार होकर प्रकृति को समझने के लिए निकल पड़ा। इस दौरान डार्विन ने जीव-जंतुओं, कीट-पतंगों और पत्थरों व चट्टानों को जांचा-परखा और उनके नमूने लिए। इनका विश्लेषण करके 'ऑरिजन ऑफ स्पीसीज' किताब लिखी। 1859 में इसके प्रकाशित होते ही जैव-विकास के इस सिद्धांत को मान्यता मिली कि मनुष्य का विकास या अवतरण बंदर से हुआ है। हालांकि अब इस सिद्धांत के विरुद्ध कई नई अवधारणाएं सामने आ गई हैं। बावजूद यह सिद्धांत अपनी जगह कायम है।

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बींसवीं सदी का अंत होते-होते पर्यटन की धारणा में आमूलचूल बदलाव आ गया। भूमंडलीयकरण और आर्थिक उदारवाद का प्रभाव पर्यटन पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। फलतः ज्यादातर यात्राएं मौज-मस्ती के लिए होने लगीं। धार्मिक यात्राएं जो एक समय पापों के प्रायश्चित से जुड़ी थीं, वे भी आनंद के लिए सैर-सपाटे में बदल गईं। साफ है, पर्यटन एक बड़े अदृश्य उद्योग में बदल गया है। कई देशों और नगरों की आजीविका व अर्थव्यवस्था इसी उद्योग से फलीभूत होने लगी है। विदेशी मुद्रा अर्जन का भी पर्यटन बड़ा आधार आज के समय में बन गया है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र ने 18 अप्रैल को 'विश्व धरोहर दिवस' मनाने का प्रचलन शुरू करके पुरातात्विक व ऐतिहासिक स्मारकों और प्रकृति से जुड़े उद्यानों व अभयारण्यों को विश्व धरोहर की श्रेणी में लाने का सिलसिला शुरू किया हुआ है, जिससे विश्व पर्यटन में वृद्धि हो। इसलिए जरूरी है कि देश की जो पुरा एवं प्राकृतिक संपदा है, वह बड़ी संख्या में इस सूची में शामिल हो, क्योंकि इस सूची में दर्ज स्थलों को विशेष मानते हुए बड़ी संख्या में लोग दुनिया से पर्यटन के लिए निकलते हैं।

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भारत में प्राचीन स्मारकों और धरोहरों की रक्षा का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (आईएसआई) करता है। दरअसल, स्मारक इंसानों की बनाई गई वे रचनाएं हैं, जो बीते समय की याद दिलाती हैं। ये मंदिर, महल और किले भी हो सकते हैं तथा राष्ट्रीय उद्यान व अभयारण्य भी हो सकते हैं। इनमें वेद जैसे ग्रंथ भी शामिल हैं। जो समाज प्राचीन धरोहरों का संरक्षण नहीं कर पाता है, वह न सिर्फ इन धरोहरों के नष्ट होने का गवाह बनता है, बल्कि परंपरा से मिलने वाले ज्ञान को भी खो देता है। जर्मनी ने अपनी धरोहरों को संभालने के लिए 2013 में करीब 50 करोड़ यूरो खर्च किए थे। वहां 13 लाख स्मारक हैं। हालांकि भारत समेत समूचे विश्व में स्मारकों के निर्माण और संरक्षण की लंबी परंपरा रही है। 19वीं सदी से स्मारक संरक्षण शब्द का जिक्र जर्मनी सहित कई देशों के सरकारी अभिलेखों में मिलता है। भारत में अयोध्या, सोमनाथ, मथुरा और वाराणसी के मंदिरों को विदेशी हमलावरों द्वारा तोड़ा जाना और फिर भारतीयों द्वारा उनके जीर्णोद्धार के दस्तावेज और लोक साहित्य में वर्णन खूब मिलते हैं। दरअसल, दूसरे विश्वयुद्ध में कई नगरों को बहुत हानि हुई थी। अमेरिका ने 1945 में नाकासाकी और हिरोशिमा पर परमाणु हमले करके इन दोनों नगरों को मिट्टी में मिला दिया था। 

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