संजीवनी टुडे

पांच उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति कितनी जायज

संजीवनी टुडे 09-06-2019 16:38:28

उपमुख्यमंत्री पद एक बार फिर सुर्खियों में है। सत्तारूढ़ दलों के लिए उपमुख्यमंत्री बनाना दाएं-बाएं हाथ का खेल हो गया है। उपमुख्यमंत्री पद का न तो संविधान में प्रावधान है और न उस पर आसीन व्यक्ति को मुख्यमंत्री जैसे अधिकार हैं


उपमुख्यमंत्री पद एक बार फिर सुर्खियों में है। सत्तारूढ़ दलों के लिए उपमुख्यमंत्री बनाना दाएं-बाएं हाथ का खेल हो गया है। उपमुख्यमंत्री पद का न तो संविधान में प्रावधान है और न उस पर आसीन व्यक्ति को मुख्यमंत्री जैसे अधिकार हैं। इसके बावजूद देश के विभिन्न राज्यों में उपमुख्यमंत्री बनाने का चलन बखूबी जारी है। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने तो हद ही कर दी है। उन्होंने पांच उपमुख्यमंत्री नियुक्त कर दिए। ऐसा उन्होंने हर वर्ग को साधने के लिए किया है। आंध्रप्रदेश की जगनमोहन कैबिनेट के पांचों उपमुख्यमंत्री अलग-अलग समुदाय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और कपु समुदाय से हैं। मुख्यमंत्री का दावा है कि सभी वर्गों को बराबर प्रतिनिधित्व देने की कोशिश के तहत ऐसा किया गया है। 25 सदस्यीय मंत्रिमंडल में पांच उपमुख्यमंत्री मायने रखते हैं।

 भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी मुख्यमंत्री ने पांच उपमुख्यमंत्री नियुक्त किए हों। इससे पहले आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे चंद्रबाबू नायडू ने कपु समुदाय और पिछड़ा वर्ग से एक-एक उपमुख्यमंत्री नियुक्त किए थे। 
 सवाल उठता है कि क्या किसी राज्य में इतने उपमुख्यमंत्री नियुक्त किए जाने चाहिए? उनकी उपयोगिता क्या है? मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्रियों और विधायकों के वेतन-भत्ते जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से दिए जाते हैं। क्या ऐसा करना न्यायसंगत, तर्क संगत और नीतिसंगत है? जनता के पैसे को अनावश्यक रूप से खर्च कर अपना समीकरण साधने की इजाजत आखिर किसने दी, यह बड़ा सवाल है। 

देश के राजनेताओं को इस सवाल का जवाब तलाशना चाहिए और जनता के बीच उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्तियों का मंतव्य स्पष्ट करना चाहिए। बात अगर हर वर्ग को साधने की है तो वह किसी के लिए भी संभव नहीं है। वह इसलिए कि व्यक्ति की इच्छाएं अनंत होती हैं। एक पूरी होती नहीं कि दूसरी सामने खड़ी हो जाती है। व्यक्ति चाहकर भी सबको खुश नहीं कर सकता। इसलिए विद्वानों ने 'एकै साधै सब सधै,सब साधै सब जाई' वाली बात कही है। मुख्यमंत्रियों और खासकर राजनीतिक दल के प्रमुखों को यह बात समझनी चाहिए। 

 उत्तरप्रदेश में जब 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बने थे तब भी उनके साथ दो उपमुख्यमंत्रियों डॉ. दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य ने शपथ ली थी। उस वक्त कहा गया था कि इतने बड़े प्रदेश के सुशासन के लिए अकेले मुख्यमंत्री पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें दो भुजाओं की आवश्यकता है। 

उस समय दिनेश शर्मा और केशव मौर्य किसी सदन के सदस्य नहीं थे। तब उत्तरप्रदेश विधान परिषद में समाजवादी पार्टी के सदस्य शतरूद्र प्रकाश ने उपमुख्यमंत्रियों के किसी सदन के सदस्य न होने के बाद भी वेतन, भत्ते लेने और सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि संविधान में उपमुख्यमंत्री का पद ही नहीं है तो प्रदेश में दो उपमुख्यमंत्रियों को किस नियम के तहत मनोनीत किया गया है? किस कानून के तहत उन्हें वेतन-भत्ते दिए जा रहे हैं। 

  गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्रियों के जरिए भाजपा ने ठाकुर, ब्राह्मण और पिछड़ा वर्ग के वोटबैंक को साधने की कोशिश की थी। सवाल उठता है कि जब उत्तरप्रदेश में वोट बैंक साधने के लिए दो उपमुख्यमंत्री नियुक्त हो सकते हैं तो आंध्रप्रदेश में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। आजादी के बाद से अब तक राज्यों में सत्ताधारी पार्टियां अपनी राजनीतिक सुविधा का संतुलन देखती रही हैं। उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति को उसी क्रम में देखा-समझा जा सकता है।

 संविधान में कहीं भी उपमुख्यमंत्री पद का उल्लेख नहीं है। उपमुख्यमंत्री तो साधारण मंत्री के रूप में ही शपथ लेते हैं। ऐसे में उन्हें उपमुख्यमंत्री का वेतन-भत्ता और मुख्यमंत्री जैसी सुविधाएं कैसे दी जाती हैं, इसका जवाब सत्ताधारी दलों के पास नहीं है। राजनीतिक दल विभिन्न जाति, वर्ग के नेताओं को महत्वपूर्ण विभाग देकर भी तो जातीय संतुलन बना सकते हैं। अपने वोटबैंक को साध सकते हैं। इसके लिए जरूरी तो नहीं कि संविधान की किताब ही पलट दी जाए। 
 

अगर उपमुख्यमंत्री पद वाकई अहम रहा होता तो संविधान निर्माताओं ने इस पर विचार जरूर किया होता। राजनीतिक दलों को लगता है कि संविधान निर्माताओं से इस बाबत भूल हो गई है तो उन्हें संविधान संशोधन करना चाहिए और उसमें उपमुख्यमंत्री पद सृजित करना चाहिए। उपमुख्यमंत्री पद पर नियुक्तियों का सिलसिला तो बाद में शुरू हुआ। पहले उप प्रधानमंत्री पद का ईजाद हुआ था। सरदार बल्लभ भाई पटेल उप प्रधानमंत्री पद के पहले धारक थे जो नेहरूजी की अनुपस्थिति में सरकार की देखरेख और कैबिनेट की बैठकों में सरकार का प्रतिनिधित्व किया करते थे। असल विवाद तो तब हुआ जब 1989 में वीपी सिंह सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में देवीलाल उप प्रधानमंत्री बनने पर अड़ गए।

तत्कालीन राष्ट्रपति आर.वेंकटरमण ने अपनी किताब में लिखा है कि वीपी सिंह के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद जब देवीलाल के शपथ लेने की बारी आई तो मैं उन्हें मंत्री पद की शपथ दिला रहा था, लेकिन उन्होंने उप प्रधानमंत्री ही कहा। मैंने उन्हें दोबारा मंत्री कहकर सुधारा,लेकिन उन्होंने फिर 'उप प्रधानमंत्री' ही उच्चारण किया। देवीलाल शपथ लेकर उप प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी गई। उच्चतम न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी के तर्क को सही माना। अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट में कहा कि उप प्रधानमंत्री काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स के सदस्य हैं और उन्होंने केवल मंत्री की बजाय प्रधानमंत्री शब्द का इस्तेमाल किया है। अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी ने कोर्ट में कहा था कि उप प्रधानमंत्री का संविधान में कोई प्रमाण नहीं है और देवीलाल एक मंत्री की तरह ही रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि यह पद उप प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री की शक्तियां नहीं देता। देश में कई उप-प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम, यशवंत राव चह्वाण, चौधरी देवीलाल और लालकृष्ण आडवाणी लेकिन देवीलाल को छोड़कर इनमें से किसी ने भी उप प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने की जिद नहीं की।  

 यह कहना गलत नहीं होगा कि इसी की तर्ज पर राज्यों में उप-मुख्यमंत्री नियुक्त करने का चलन विकसित हुआ। आज की तिथि में कोई भी राजनीतिक दल इसका विरोध करने की स्थिति में नहीं है। क्या भाजपा, क्या कांग्रेस, सभी तो अपने उपमुख्यमंत्री नियुक्त कर रही हैं। कर्नाटक में कांग्रेस ने अपने के दलित चेहरे जी. परमेश्वर को उपमुख्यमंत्री बनवा रखा है। राजस्थान में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं तो सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री हैं। बिहार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं तो सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री हैं। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सीएम हैं तो मनीष सिसौदिया उपमुख्यमंत्री हैं। मौजूदा हालात यह है कि मुख्यमंत्री बाद में तय होता है, उपमुख्यमंत्री का चयन पहले हो जाता है। यह स्थिति बहुत मुफीद नहीं है। अगर सभी दल जातीय और धार्मिक संतुलन के आधार पर उपमुख्यमंत्री चुनने लगे तो इससे देश में गलत संदेश जाएगा। आंध्रप्रदेश में पांच उपमुख्यमंत्री होंगे तो तेलंगाना में भी इसी तरह की मांग उठेगी। झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल और छत्तीसगढ़ में भी उठेगी। यह स्थिति बेहद अराजक होगी। आज मुख्यमंत्री जो काम स्वेच्छा से कर रहे हैं, कल को यही नजीर उनकी विवशता बन जाएगी। छोटे-छोटे राज्यों में सरकार पर उपमुख्यमंत्री अधिक संख्या में नियुक्त करने का दबाव बनेगा जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी ठीक नहीं है। इससे पार्टियों का अनुशासन भी टूटेगा और आपसी खींचतान भी तेज होगी।

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