संजीवनी टुडे

पांच राज्यों में भाजपा-कांग्रेस के लिए राह आसान नहीं !

अब्दुल रशीद

संजीवनी टुडे 13-10-2018 17:52:55


मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,राजस्थान,मिजोरम और तेलंगाना में विधान सभा के चुनाव होने हैं, जिसके तारीख़ की घोषणा चुनाव आयोग ने कर दी है। इन पांच राज्यों में सबसे ज्यादा जिन राज्यों पर आने वाले दिनों में बहस होनी है वह है मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान। तीनो राज्यों में भाजपा सत्ता में है और कांग्रेस मुख्य विपक्ष। यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है,की यह ठीक लोकसभा चुनाव से पहले हो रहा है हालांकि विधान सभा और लोकसभा चुनाव के मुद्दे अलग होते हैं,लेकिन अब चुनाव मुद्दों के बजाय छवि पर ज्यादा लड़ी जाती है ऐसे में भाजपा अपने विजेता की छवि को बरक़रार रखने के लिए और कांग्रेस बनाने के लिए पुरज़ोर कोशिश करेगी। 

राह आसान नहीं 

विधानसभा चुनावों में न रास्ता कांग्रेस के लिए आसान है और ना ही भाजपा के लिए,कांग्रेस का नया अवतार कितना कारगर होगा यह चुनाव बाद ही पता चलेगा,लेकिन कांग्रेस को जनता वोट क्यों दे यह बात साफ तौर जनता तक नहीं पहुंचा है। वहीँ भाजपा ने अपने वायदों को पूरा करने अब तक कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं किया है, साथ ही रसोई गैस से लेकर पेट्रोल डीजल का दाम के बढ़ोतरी से जनता परेशान है।सरकार के खिलाफ़ किसानों और मध्यम वर्गीय वर्ग में बढ़ता असंतोष और जनता के समस्याओं का निदान कांग्रेस कर पाएगी या नहीं यह उलझन, चुनाव के समीकरण को धवस्त कर सकता है। 

जनता के मुद्दों को हाशिए पर रख कर चुनाव जीतने की जुगत

लोकतंत्र में जब आम जनता के मुद्दों को दर किनार कर चुनाव लड़ा जाएगा तब विकास के मायने क्या रह जाएंगे? क्या ग़रीब जनता के वोटों के सहारे जीतने के बाद ख़ास वर्ग को फ़ायदा और जनता से जुड़े सवाल पूछने पर विपक्ष को जिम्मेदार ठहराने की राजनीती कहीं न कहीं कॉर्पोरेट समर्थित राजनीती की ओर बढ़ता कदम ही लगता है। जानकारों की माने तो एंटी इनकंबेंसी फेक्टर तो रहेगा लेकिन सभी राजनीतिक पार्टियां जनता के मुद्दे को हाशिए पर रखकर जुमलेबाज़ी,राजनितिक समीकरण और गठबंधन के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश करेंगे ऐसा लगता है।

मध्य प्रदेश के जन-मन में क्या है?

मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार के लिए राह बहुत कठिन है। पन्द्रह साल का एंटी इनकंबेंसी फेक्टर,व्यापम में मौत, किसानों में फसल के उचित दाम और कर्ज, युवाओं में रोजगार को लेकर जहां एक ओर नाराजगी चरम पर है वहीं,अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी के साथ सवर्णों में आरक्षण को लेकर भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ आक्रोश है। जनता का ध्यान इन मुद्दों से हटाकर अपने समर्थन में वोट लेना शिवराज सिंह चौहान के लिए लोहे के चने चबाने जैसा लगता है। 

मध्यप्रदेश कांग्रेस में नेता ज्यादा कार्यकर्त्ता कम हैं,और चुनाव में नेता की छवि और कर्यकर्ता का जोश बेहद अहम होता है ऐसे में आपस के मतभेद को भुला कर एकजुट हो सरकार के खिलाफ़ जनता के असंतोष और एंटी-इन्कोम्बेंसी को भुनाना आसान नहीं होगाउदाहरण के तौर पर सिंगरौली जिले को ले लीजिए चुनव की आहट होते ही पोस्टर बैनर और सोशल मिडिया पर कांग्रेस नेताओं की बाढ़ सी आगई,इस बाढ़ में जमीनी नेता मानों जैसे बह गएं और गिनती के कार्यकर्त्ताओं को अपने अपने पक्ष में दिखाने का टिटहरी प्रयास होने लगा। 

दूसरी तरफ़ भी नज़ारा बेहद दिलचस्प है,एक मौजूदा विधायक जी कहते हैं उनकी कोई सुनता ही नहीं,लेकिन उनका कोई काम नहीं रुकता। उन्होंने ऐसा क्यों कहा यह वही जाने लेकिन बेरोजगार युवाओं को अस्थायी नौकरी दिलाने के मामले यह बात सच लगती है क्योंकि अस्थायी रूप से काम करने वाली कंपनी भी सत्तारूढ़ जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुनता। एक विधायक साहब कि चिठ्ठी चर्चा का विषय बना हुआ है। यानी जनता के मुद्दे को दरकिनार कर सत्ताधारी नेता अपना हित साध रहें। सरकारी नौकरी में कोटे और एससी-एसटी क़ानून में संशोधन को लेकर सवर्णों में नाराज़गी है,लेकिन वोट भाजपा के पक्ष में नहीं जाएगा ऐसा नहीं लगता। बसपा का जनाधार मध्यप्रदेश में ज्यादा नहीं है,बसपा कांग्रेस से गठबंधन होने की बात के कारण चर्चा में आई और बाद में कांग्रेस के लिए फ़जीहत भी बनी। इस विधान सभा चुनाव में 'सपाक्स'और आदिवासी संगठन 'जयस' महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कुल मिलकर मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए राहत है लेकिन इस राहत में आपसी मनमुटाव से पलीता भी लग सकता है।

छत्तीसगढ़ - मुख्यमंत्री से प्यार लेकिन मंत्रियों से तकरार 

भाजपा के लिए मध्यप्रदेश राजस्थान से ज्यादा छत्तीसगढ़ में राह आसान और अधिक मज़बूत है । पंद्रह साल के एंटी इनकंबेंसी फैक्टर रमन के विकास रंग पर असर तो डाल सकता है लेकिन रंग छूटेगा ऐसा नहीं लगता।जानकारों का कहना है, "छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है लेकिन वहां के किसान आज कटोरे लेकर घूम रहे हैं। वहां किसानों की मौतें हो रही हैं।"छत्तीसगढ़ के किसानों की नाराज़गी धान पर बोनस नहीं मिलने से है। किसानों और कर्मचारियों की नाराजगी के बावजूद छतीसगढ़ की आम जनता को रमन सिंह से नाराजगी नहीं लेकिन उनके मंत्रियों से शिकायत जरुर है, यह नाराजगी रमन सरकार के लिए एक बड़ी चुनावी चुनौती जरुर है?छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के लिए आपसी बिखराव और अजीत जोगी से बसपा का गठबंधन कांग्रेस के लिए ऐसा सरदर्द है,जिसका निदान और उपचार शीर्ष नेता चाहते तो हो सकता था लेकिन ऐसा करने में कांग्रेस चूक गई यही चूक पहाड़ जैसी चुनौती बनकर सामने खड़ी है जिसे पार करना आसान नहीं दिखता।

 

राजस्थान - कायम रहेगी सत्ता परिवर्तन की परम्परा!

राजस्थान का चर्चित नारा "मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं।" यह एक नारा चुनावी पिटारे के सारे राज खोल देता है। भाजपा के नेता भी दबी जुबान में यह बात स्वीकार करते हैं की जनता में वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ बहुत असंतोष है।  कांग्रेस राजस्थान में ज्यादा मजबूत दिखाई देती है राजस्थान में हमेशा सत्ता पलटती रहती है ऐसे में वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ असंतोष और एंटी इनकंबेंसी का पूरा फ़ायदा कांग्रेस को मिल सकता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस आने वाले चुनावों में इन तीन राज्यों में जहां सत्तापक्ष के लिए सत्ता बरक़रार रखना बड़ी चुनौती होगा, तो वहीं विपक्ष के सामने सत्ता से नाराज़ जनता को संतुष्ट कर उनका वोट रूपी आशीर्वाद के सहारे विजयश्री प्राप्त करना।

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