संजीवनी टुडे

चर्चा और चिन्ता प्रधान देश

ललित शौर्य

संजीवनी टुडे 23-09-2018 16:12:52


यह देश चर्चा और चिंताओं का देश है। यहां बात-बात पर चर्चा और हर बात पर चिंता जाहिर की जाती है। यहाँ लोग चिंता और चर्चा न करें तो उनका खाना हजम नहीँ होता है। घर, बाहर , अड़ोस-पड़ोस सभी जगह, चुहुँ ओर चर्चा और चिंता के तालाब में तैरते हुए लोग देखे जा सकते हैं। ऐसे लोग सुबह से शाम तक बिना पैसा लिए चिन्ता करते रहते हैं। इनको खुद से ज्यादा पड़ोसी की चिंता रहती है। ये अपनी चिंता वाली खूबी के कारण चर्चा में रहते हैं। देश में हर बंदा चिन्ता में डूबा है।आजकल लेटेस्ट चिंता पेट्रोल के दामों के बड़ने की है।

साथ ही रुपये के गिरने की चिंता। संजोग देखिए एक तरफ गिरने की चिन्ता तो दूसरी ओर बड़ने की चिन्ता।हम एक चिन्ता प्रधानदेश बन चुके हैं।चर्चा हमारी संस्कृति बन चुकी है। चिन्ता और चर्चा दोनोँ की जड़े बहुत गहरी हो चुकी हैं। लाखों का बजट खर्च करके सरकारें पर्यावरण पर चिन्ता व्यक्त करने के लिए चर्चा आयोजित करती हैं। चर्चा में आये सभी विद्वान भर पेट चिन्ता करते हैं। चिन्ता करते-करते उन्हें प्लेट में रखे समोसे और कप में रखी चाय के ठंडे होने की भी चिन्ता सताने लगती है।

भारत में चिन्ता का रोग घर से ही शुरू हो जाता है। घर पर पति को पत्नी के नखरे संभालने की चिन्ता। रोटी के जुगाड़ की चिन्ता। बच्चे पालने की चिन्ता। पत्नी को पति के बहकने की चिन्ता। उसके कदमों के थिरकने की चिन्ता। इन दोंनो को पड़ोसी के रहन-सहन की चिंता। उसके नए टी.वी, फ्रिज या बाईक की चिंता। भीषण महंगाई में पड़ोसन की नई साड़ी की चिंता। इन चिन्ताओं पर फिर घर पर चर्चा का माहौल छिड़ जाता है। 

देश के नेताओं में भी चिन्ता रोग गहरा है। उन्हें पहले वोट की चिंता होती है। चुनाव जीतने के बाद मंत्री पद की चिंता। पैसे खसोटने की चिंता। कुर्सी की चिंता। इन सब चिन्ताओं के साथ बस उन्हें। जनता की चिंता नहीँ होती। वो चुनाव जीतने के बाद चिंता के साथ चर्चा भी करते हैं। भूख, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, महिला हींसा, रेप, एसिड अटैक, आतंगवाद, पलायन आदि आदि विषयों पर भयंकर चर्चा होती है। नेता चर्चा करते नहीँ थकते। बयान उगलते नहीँ रुकते। पर इन पर काम करते उन्हें चिन्ता होने लगती है। इसलिए वो केवल चिंताओं पर चर्चा थोपते नजर आते हैं। चिंताओं पर काम करना उन्हें मूर्खता और टाइम वेस्ट जैसा लगता है। 

पूरा देश चिन्ता और चर्चा की चाशनी में डूबा जलेबी बना जा रहा है। टी.वी न्यूज चैनल अपना कर्तव्य निभाते हुए हर एक चिंता पर सर फोडु डिवेट आयोजित करती हैं। हर पार्टी के चिन्ताग्रस्त प्रवक्ता, और विभिन्न सामाजिक संगठनों के चिन्तामणि टाइप लोगों को इकठ्ठा कर चर्चा का महाभारत होता है। इन चर्चाओं से फिर नई तरह की चिंताएँ प्रकट होती हैं। चिंताओं के समाधान के लिए चर्चा का चूल्हा फूंका जाता है लेकिन समाधान की लौ की बजाय चिंता का गुबार छाने लगता है। इस तरह चिन्ता रक्त बीज सी बड़ते जा रही है। चिन्ता और चर्चा देश की तकदीर बन चुकी हैं।

 

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