संजीवनी टुडे

कांग्रेस को 'महात्मा' से वंचित करते 'गांधी'

संजीवनी टुडे 18-07-2019 14:24:29

कांग्रेस को महात्मा से वंचित करते गांधी


चालू वर्ष महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती का वर्ष है। इस उपलक्ष्य में केन्द्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी, दोनों की ओर से कई कार्यक्रम आयोजित किये गए हैं। इनकी शुरुआत 2 अक्टूबर से होने वाली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के सभी सांसदों को निर्देशित किया है कि वे महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर अपने-अपने क्षेत्र में 150 किलोमीटर पैदल यात्रा करें और गांधीजी के विचारों को फैलायें। 

भाजपा-सांसदों की पैदल यात्रा 2 अक्टूबर गांधी जयंती से शुरू होकर 31 अक्टूबर पटेल जयंती तक चलेगी। इस प्रस्तावित यात्रा के खास भाजपाई निहितार्थ और कांग्रेसी फलितार्थ हैं। अर्थात उस यात्रा से उद्देश्य तो सधेगा भाजपा का, लेकिन उसका फल कांग्रेस को चखना पड़ेगा। वह फल मीठा होगा या कड़वा, यह विचारणीय है। 

गौरतलब है कि भाजपा जहां देश के जनमानस में बैठे महात्मा के चिंतन-दर्शन को अपने हिसाब से फैलाने का उद्यम करती दिख रही है। उधर, कांग्रेस दस जनपथ के उस गांधी को मनाने में लगी हुई है, जो खुद को महात्मा की विरासत के अधिकारी होने का दावा करते रहे हैं। जी हां, उस गांधी को मनाने में लगी हुई है पूरी कांग्रेसी जमात, जो कांग्रेस की नैय्या डूबते जाने से खीझकर या यों कहिए कि रुष्ट होकर उसके अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिए हैं। हालांकि जब कांग्रेस सत्ता के शीर्ष पर हुआ करती थी, तब भी दस जनपथ का यह गांधी-परिवार महात्माजी को वर्ष में दो बार ही याद किया करता था। एक बार उनकी जयन्ती पर और दूसरी बार उनकी पुण्य तिथि पर। कांग्रेस की नैय्या डूबने का कारण भी यही रहा।

महात्मा गांधी की विरासत को अभिव्यक्त करने वाली कांग्रेस का उन्हीं की कृपा से सर्वेसर्वा बन उसी के सहारे सत्तासीन हुए जवाहरलाल नेहरु ने ही असल में महात्मा को तिलांजलि देते हुए बड़ी चतुराईपूर्वक 'गांधी' को सत्ता की ताबीज में गढ़-मढ़कर अपनी बेटी के गले से लटका दिया था। फिर तो 'इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरु' ने उसके प्रभाव से 'इन्दिरा गांधी बनकर कांग्रेस की सियासत और महात्मा की विरासत पर ऐसे अधिकार जमा लिया जैसे उस 'साबरमती के संत' ने उस बाबत उन्हें उतराधिकारी होने की वसीयत लिख रखी हो। 

बावजूद इसके, देश यही समझता रहा या देश को यही समझाया जाता रहा और इन्दिरा के बाद राजीव तथा राजीव के बाद सोनिया व राहुल सभी उस ताबीज को धारण किये रहे। उसी की बदौलत कांग्रेस का सर्वेसर्वा बन पूरे 60-62 वर्षों तक ये तमाम गांधी सत्ता-सुख भोगते रहे। साथ ही, महात्मा के विचारों की छाया से भी बचते रहे और गाहे-बगाहे उनकी ऐसी-तैसी भी करते रहे। जाहिर है, सत्ता के सौदागर बने इन गांधियों की बिरादरी के हाथों कांग्रेस उस महात्मा से वंचित होती रही, जो राजसत्ता के भारतीय सनातन मूल्यों की वकालत करते रहे थे। जो धर्मविहीन राजनीति को अनर्थकारी बताते रहे थे। 

जो रामराज्य की स्थापना को कांग्रेस का ध्येय बताते रहे थे और इस बाबत 'हिन्द-स्वराज' की अवधारणा रच-गढ़कर उसे धरातल पर उतारने का सपना सारे देश को दिखाये थे। उन्हीं के आशीर्वाद से पटेल की जगह खुद कांग्रेस का अध्यक्ष बने जवाहरलाल ने उनके जीते-जी 'हिन्द-स्वराज' को सिरे से नकार दिया और प्रधानमंत्री बन जाने के बाद तो उसे रद्दी की टोकरी में ही डाल दिया। महात्माजी का 'हिन्द-स्वराज' वास्तव में 'रामराज्य' का ही सोपान था। 

भारत की माटी से निःसृत भारतीय मन-मिजाज का ऐसा स्वराज, जिससे भारतीय संस्कृति के सनातन जीवन-मूल्यों का संरक्षण व संवर्द्धन होता रहे। स्वराज-प्राप्ति का उनका संघर्ष भारतीय व पश्चिमी सभ्यताओं का परस्पर विरोधी संघर्ष था, किन्तु पटेल के हाथों बुरी तरह से हारकर भी महात्माजी के हाथों कांग्रेस का अध्यक्ष बने नेहरु प्रधानमंत्री बनते ही पश्चिमी पक्ष के साथ खड़े हो गए। वे कांग्रेस को महात्माजी के विचारों से दूर ही नहीं, बल्कि वंचित भी करते रहे। 

पश्चिमी वैचारिक अधिष्ठान को प्रतिष्ठित कर उन्होंने सत्ता का ऐसा प्रतिष्ठान खड़ा किया, जिसमें महात्माजी के विचारों को जूतियों से रौंदा जाता रहा। सेवा, सादगी व शुचिता की बजाय शोषण, तिकड़म व भ्रष्टाचरण को ही अहमियत दी जाती रही। नेहरु के जमाने तक तो महात्मा के महात्म्य से वंचित हो जाने के बावजूद कांग्रेस उनकी छाया से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकी, परन्तु नेहरु के बाद की कांग्रेस को तो 'गांधी' नामक ताबीज धारण किये उनके वंशवृक्ष ने इस कदर अपनी चपेट में ले लिया कि महात्मा महज किंवदन्ती बन कर रह गए। कांग्रेस की वैचारिकता नेहरु की वंशवादिता बन कर रह गई। 

न केवल महात्माजी, बल्कि उनके साथ के तमाम स्वतंत्रता सेनानी इतिहास की अंधेरी गर्त में धकेल दिए गए, जिसमें से सरदार पटेल को निकाल कर नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के वैचारिक अधिष्ठान पर खड़ा कर दिया, तब कांग्रेस को मिर्ची लगने लगी थी। 'कांग्रेस-मुक्त भारत' का अभियान चला रहे मोदीजी अब 'महात्मा-मुक्त कांग्रेस' का अघोषित अभियान चलाने की ओर प्रवृत होते दिख रहे हैं, किन्तु कांग्रेस अपने दुर्दिन के इस दौर में भी 'गांधी-युक्त' होने की मशक्कत करने में ही लगी है। ध्यातव्य है कि नरेन्द्र मोदी को प्रतीकों का सियासी प्रयोग करने में महारत हासिल है। 

वे सरदार पटेल को जिस तर्ज पर 'गुजराती अस्मिता' से अलग-थलग कर नेहरु-वंश के पटेल-विरोधी होने की बात स्थापित कर चुके हैं, उसी तर्ज पर वे सबरमती के महात्मा को भी 'दस-जनपथ के गांधियों' से अलग-थलग कर दें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कांग्रेस की आज यही सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह अपनी वैचारिकी और अपने विचारकों से खुद ही वंचित होती जा रही है। जबकि, राजनीतिक विचारकों की विरासत के मामले में वह आज भी कम समृद्ध नहीं है। 

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