संजीवनी टुडे

अल्पसंख्यक को लेकर असमंजस कब तक : सियाराम पांडेय 'शांत'

संजीवनी टुडे 12-07-2019 11:22:19

अल्पसंख्यक कौन है, बहुसंख्यक कौन है, इसका मतलब कम पढ़ा -लिखा व्यक्ति भी बहुत आसानी से बता सकता है। जिसकी आबादी कम, वह अल्पसंख्यक और जिसकी ज्यादा वह बहुसंख्यक।


अल्पसंख्यक कौन है, बहुसंख्यक कौन है, इसका मतलब कम पढ़ा -लिखा व्यक्ति भी बहुत आसानी से बता सकता है। जिसकी आबादी कम, वह अल्पसंख्यक और जिसकी ज्यादा वह बहुसंख्यक। लेकिन अपने देश में इसकी परिभाषा को लेकर आमराय नहीं है। इसीलिए पांच समुदायों मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित करने सबंधी 26 साल पुरानी केंद्र सरकार की अधिसूचना को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। 

इस याचिका में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून 1992 की धारा 2 सी को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। कोर्ट के संज्ञान में यह बात लाई गई है कि इस अधिसूचना से स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और आजीविका के व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है। यह अधिसूचना संविधान की प्रस्तावना जिसे पूर्व पीठिका भी कहा जाता है, में शामिल समता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता की भावना के विपरीत है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित करने संबंधी दिशा-निर्देश देने का भी सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया है।

कुछ लोग इसमें राजनीति तलाश सकते हैं लेकिन यह अपने आप में बड़ा मुद्दा है। कुछ लोग इसे देश के सौहार्द में खलल डालने और मजहबी उन्माद भड़काने की कोशिश भी कह सकते हैं। लेकिन आरोप लगा देने भर से सच्चाई नहीं बदल जाती। हमें यह भी देखना है कि जिन पांच समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया गया है, क्या वे समान रूप से अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाओं को हासिल कर पा रहे हैं? अल्पसंख्यक होने का सर्वाधिक लाभ मुस्लिमों के ही खाते में क्यों जा रहे हैं? 2014 में देश में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद जैन धर्म को भी अल्पसंख्यक घोषित कर दिया है। मतलब देश के छह धर्मों के अनुयायी अल्पसंख्यक हो गए हैं। अदालतों में लंबे समय से यह मुद्दा उठता रहा है। 

विडंबना इस बात की है कि जिस अल्पसंख्यक पर पूरी राजनीति मेहरबान है, भारतीय संविधान में आज तक उस अल्पसंख्यक शब्द की परिभाषा ही तय नहीं हुई है। अल्पसंख्यक कौन है, यह तय किए बिना राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग भी बन गया और अलग अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय भी गठित हो गया। इसे देश के नीति नियंताओं के दिमाग का दिवालियापन कहें या अपना उल्लू सीधा करने की रणनीति, इस पर विमर्श तो होना ही चाहिए। ये बेहद गंभीर मामला है। व्यक्ति के मौलिक अधिकारों से जुड़ा है। ऐसे संवेदनशील मामले में टालमटोल ठीक नहीं है।

अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का मुद्दा 26 मई 1949 को भारत की संविधान सभा में भी उठ चुका है। अल्पसंख्यक आरक्षण पर उस दौरान जमकर बहस हुई थी। दलितों को आरक्षण देने के सवाल पर जहां संविधान सभा में आम राय थी, वहीं अल्पसंख्यक आरक्षण पर मतभेद जैसे हालात थे। अब इसे विवशता कहें या कुछ और कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को स्पष्ट करना पड़ा था कि पंथ,आस्था, मजहब अथवा धर्म आधारित आरक्षण गलत है। 

यह बता देना होगा कि उस समय भी अल्पसंख्यक का मतलब मुसलमान समझा जाने लगा था। संविधान सभा में बिहार के वरिष्ठ नेता तजम्मुल हुसैन ने तब जोर देकर कहा था कि हम अल्पसंख्यक नहीं हैं। अल्पसंख्यक शब्द अंग्रेज प्रदत्त है। अंग्रेज भारत से चले गए। अब इस शब्द को शब्दकोश से बाहर कर देना चाहिए। लेकिन लगता है कि उनकी बात को न तब तवज्जो मिली और न अब मिल रही है। अल्पसंख्यक शब्द को जिंदा रखने का मतलब है अपना वोट जिंदा रखना। अधिकांश दल इसी जुगत में लगे हैं। 

अल्पसंख्यक शब्द की संवैधानिक स्थिति पर विचार करें तो संविधान के 30 उपखंडों वाले एक पूरे अनुच्छेद में 366 परिभाषाएं दी गई हैं लेकिन इसमें कहीं भी 'अल्पसंख्यक' की परिभाषा नहीं है। अलबत्ता अनुच्छेद 29 का शीर्षक है - अल्पसंख्यक वगैरह के हितों का संरक्षण। यहां केवल यह कहा गया है कि भारत के किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा। इसे अल्पसंख्यक की परिभाषा नहीं कह सकते।

संविधान निर्माताओं ने भले ही अल्पसंख्यक आयोग के गठन की जरूरत नहीं महसूस की हो लेकिन भारतीय राजनीति को इसकी बेहद जरूरत थी। यह जरूरत क्यों थी, यह बहस-मुबाहिसे का विषय हो सकता है। लेकिन यह राजनीतिक आतुरता का ही परिणाम था कि 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का कानून पारित कराया गया। इस कानून में बेहद दिलचस्प परिभाषा दी गई; वह यह कि अल्पसंख्यक वह समुदाय है जिसे केंद्र सरकार अधिसूचित करे। अर्थात अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार सरकार ने खुद अपने हाथ में ले लिया। किसी जाति समूह को अनुसूचित जाति या जनजाति घोषित करने की प्रक्रिया (अनु. 341 व 342) बड़ी जटिल है। 

यह काम संसद ही कर सकती है लेकिन अल्पसंख्यक घोषित करने का काम सरकारी दफ्तर से ही हो सकता है। संविधान के आर्टिकल 29-30 और आर्टिकल 350ए-350बी में अल्पसंख्यक शब्द आया तो है लेकिन उसे उन्हें परिभाषित नहीं किया गया है। 1993 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया और 'नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटीज एक्ट, 1992' अस्तित्व में आया लेकिन जिसके लिए यह सब किया गया, उन्हें ही परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं समझी गई। 

यह एक्ट मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसियों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देता है। 2006 में तो अल्पसंख्यकों के लिए एक अलग मंत्रालय बना दिया गया। मतलब नीति नियंताओं ने एक आयोग के बाद पूरा का पूरा मंत्रालय ही उन लोगों के नाम कर दिया, जिनकी परिभाषा ही तय नहीं है। वर्ष 1984 में कुछ समय के लिए अल्पसंख्यक आयोग को गृह मंत्रालय से अलग कर दिया गया था तथा कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत नये रूप में गठित किया गया था। 

कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 23 अक्टूबर 1993 को अधिसूचना जारी कर अल्पसंख्यक समुदायों के तौर पर पांच धार्मिक समुदाय यथा मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध तथा पारसी समुदायों को अधिसूचित किया गया था। 27 जनवरी 2014 को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून 1992 की धारा 2 के अनुच्छेद (ग) के अंतर्गत प्राप्त अधि‍कारों का उपयोग करते हुए, जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अधि‍सूचि‍त कर दि‍या।

अब जरा संख्यात्मक लिहाज से विश्लेषण कर लेते हैं। नगालैंड और मिजोरम में 88 फीसदी लोग ईसाई हैं, लेकिन वे अल्पसंख्यक हैं। मेघालय में 75 फीसदी ईसाई अल्पसंख्यक हैं। मणिपुर में 41 फीसदी और अरुणाचल प्रदेश में 30 फीसदी ईसाई जनसंख्या है लेकिन उन्हें अल्पसंख्यकों के लिए बनने वाली सभी सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है। सवाल यह नहीं कि बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों के हक का लाभ ले रहे हैं बल्कि असल मुद्दा तो यह है कि उपरोक्त राज्यों में असली अल्पसंख्यक इन योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। यह अन्याय है।

लक्षद्वीप के 2 फीसदी हिन्दुओं को बहुसंख्यक कैसे कहा जा सकता है? लक्षद्वीप में 96 फीसदी, जम्मू एवं कश्मीर में 68 फीसदी, असम में 34 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 27 फीसदी मुस्लिम हैं, लेकिन वे अल्पसंख्यक हैं। उत्तर प्रदेश में इराक से भी ज्यादा मुस्लिम रहते हैं। इराक में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक हैं। अल्पसंख्यक समुदाय को चिन्हित नहीं करने की वजह से जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यकों को दिया जाने वाला हर लाभ मुसलमानों को मिल रहा है जबकि वहां जो समुदाय वास्तविक रूप से अल्पसंख्यक है, वह उन सुविधाओं से वंचित है। 

रही बात भारत में अल्पसंख्यक शब्द की अवधारणा की, तो यह बहुत पुरानी है। सन 1899 में तत्कालीन ब्रिटिश जनगणना आयुक्त ने व्यवस्था दी थी कि भारत में सिख, जैन, बौद्ध, मुस्लिम को छोड़कर शेष हिन्दू बहुसंख्यक हैं। भारत के नेता तो ब्रिटिश नियामकों से दो कदम आगे बढ़ गए। जब राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया तो सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एस लाहोटी ने अपने एक निर्णय में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को भंग करने का सुझाव तक दिया था लेकिन उस पर आज तक अमल नहीं हुआ। 

संघ प्रमुख मोहन भागवत भी जनसंख्या के असंतुलन और भेदभाव पर चिंता जता चुके हैं। अश्विनी उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय में पहले भी इस विषय पर याचिका दायर की थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए इस पर चार सप्ताह में रिपोर्ट मांगी थी। उस रिपोर्ट का क्या हुआ, यह तो सरकार जाने, लेकिन अल्पसंख्यक के नाम पर सुविधाओं का बंदरबांट आज भी जारी है। 

यक्ष प्रश्न तो यह है कि आज हर कोई राष्ट्र की बात करता है, राष्ट्रीय एकता का राग अलापता है, पर अल्पसंख्यकवाद का पोषण जरूर करता है। क्या इस दोहरी नीति से ही भारत एक राष्ट्रवाद की दिशा में आगे बढ़ सकेगा? क्या इस विसंगति के रहते देश में सबका साथ-सबका विकास की अवधारणा मूर्त रूप ले सकेगी? कदाचित नहीं। इसलिए जनहित का तकाजा है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में निर्णायक व्यवस्था दे।

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