संजीवनी टुडे

सस्ती दवा सही, लेकिन सिस्टम में सुधार होना चाहिए

संजीवनी टुडे 27-06-2019 03:01:00

सस्ती दवा सही, लेकिन सिस्टम में सुधार होना चाहिए


विगत दिनों मोदी सरकार ने दावा किया कि देश में जरूरी दवाओं को सस्ता किया है। उनके अनुसार गरीब तबके के मरीजों को महंगी दवाओं से राहत देते हुए दवाओं की कीमत में प्रभावी नियंत्रण के लिए यह कदम उठाए हैं। रसायन एवं उर्वरक राज्यमंत्री मनसुखलाल मंडाविया ने बीते दिनों राज्यसभा में कहा कि करीब 1032 दवाओं की कीमत को नियंत्रण के दायरे में लाया गया है। सामान्य तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली 1032 आवश्यक दवाओं के दाम में 90 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। कीमत नियंत्रण के कारण ही अब जन औषधि केन्द्रों पर मिल रही 526 किस्म की विभिन्न दवाएं बाजार कीमत से 90 प्रतिशत कम कीमत पर उपलब्ध हो रही हैं। लेकिन क्या दवा सस्ती करने से देश स्वस्थ हो जाएगा? इसके लिए सिस्टम में सुधार होना चाहिए।

 हमारा मानना है कि देश में जिन वजहों से बीमारियां फैल रही हैं या उनका जन्म हो रहा है उस पर नियंत्रण करना आवश्यक है। हम देश में हो रही डेवलेपमेंट पर सवालिया निशान नहीं उठा रहे लेकिन आज भी लोग ऐसे क्षेत्रों में रह रहे हैं जहां से आप बिना मुंह पर रुमाल रखकर नहीं निकल सकते। जरा सोचिये, वहां कितनी गंदगी होगी और जहां इतनी गंदगी होगी वहां बीमारी होना तय है। बिहार की स्थिति जगजाहिर है। मंत्रीजी के बयान में गरीब शब्द बार-बार आ रहा था। यदि गंभीरता दिखानी ही है तो उस सिस्टम पर दिखानी चाहिए जिससे उनको होने वाली समस्याओं पर काबू पाया जा सके।

 इसके सिवाय जो लोग पीड़ित हैं क्या वाकई यह दवाएं उनके पास ईमानदारी से पहुंचती हैं? मंत्री ने प्रत्येक जन औषधि केन्द्र से 700 से अधिक दवाएं वितरित कराने की बात कही जिसमें उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया कि दवाओं की मात्रा कम हो सकती है। मंत्री की यह प्रतिक्रिया खुद ही सिस्टम पर सवाल खड़े कर रही है।दवाओं के अभाव में मरने वालों के अलावा भूख से मरने वालों पर भी चिंता व्यक्त करने की जरूरत है। आज भी डिजिटल इंडिया में भूख से मरने वालों की संख्या कम नहीं है। केंद्र सरकार के अलावा कई राज्य सरकारों ने सस्ती थाली देने की बात कही थी। कई माह तक यह व्यवस्था चली भी। लेकिन अधिकतर जगह बंद हो गई। बताना जरूरी लगता है कि यह सस्ता खाना उतना उन लोगों तक नहीं पहुंचा, जितना पहुंचना चाहिए था।

 आज जब जनता ने दोबारा मोदी सरकार को जीत दिलाई है तो अब सरकार का फर्ज बनता है कि जो इतिहास में उनके लिए कोई न कर सका, अब वो आप कर दें। ये भरोसा जितना कमाल है, आपको उससे कम ही कमाल करना है, क्योंकि देश संचालन के सभी अधिकार आपके पास हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ करना बाकी है। किसी रोगी को आईसीयू में ले जाने के लिए परिजनों को इतनी मशक्क्त करनी पड़ती है मानों कोई किला फतह करना पड़े। इसका कारण यह है कि पिछले तीन दशकों में जितनी आबादी बढ़ी है उतने अस्पताल व आईसीयू में बढ़ोतरी नहीं हुई। उदाहरण के तौर पर दिल्ली की बात करें तो यहां लगभग तीस हजार आदमी पर एक आईसीयू आता है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। वह भी किसी दलाल के या किसी की सिफारिश के बिना मिलना मुश्किल है।

कमोवेश, सभी राज्यों की यही स्थिति मिलेगी। हमारे पास दो विकल्प हैं या तो जनसंख्या नियंत्रण कानून लाया जाए या बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से सुविधा बढ़ाई जाए। सरकार के पास तमाम ऐसे बजट हैं जिससे कई लोगों का भला हो सकता है। लेकिन संबंधित विभाग जनता तक उसको पहुंचाने में पूर्णत: विफल नजर आता है। दूसरी ओर जनता का जागरूक न होना भी इसका एक कारण है। हम रोजाना अखबारों में खबर देखते हैं कि सरकारी अस्पतालों में अधिकतर दवाइयां या तो पहले ही बेच दी जाती हैं या फिर वो किसी दलाल के द्वारा मिलती हैं। 

ऐसा कम ही होता है कि डॉक्टर द्वारा लिखी गई सभी दवाइयां अस्पताल से प्राप्त हो। सरकार को पारदर्शिता को लेकर कदम उठाने की जरूरत है। चंद लोग, लाखों लोगों की जिंदगी के सौदागर नहीं हो सकते। स्पष्ट है कि कोई भी सरकार कुछ क्षेत्रों में अपनी ओर से कमी नहीं छोड़ती। लेकिन उसका जमीनी स्तर पर कितना फायदा जनता को मिलता है, यह सबसे अहम है। सरकारी गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि 'रिश्वत लेते पकड़े जाओ,रिश्वत देकर छूट जाओ'। देश की मशीनरी का यही हाल है। 

मतलब कुछ नेता या अधिकारियों को यह बात भलीभांति पता है जिसके चलते वो गलत काम आराम से कर लेते हैं। बताना जरूरी है कि सरकारी स्कीम में घपला की पूरी चेन काम करती है। इसका समाधान यही है कि जो जनता के हक को मारकर घर भरता है उसको ऐसा दंडित किया जाए कि कोई दूसरा न सोचे। सरकार जनता के पैसे से ही जनता का भला करती है। जनता की मेहनत का पैसा जो वह टैक्स के रुप में सरकार को देती है, उसके भले या उसकी तरक्की में लगे तो ही एक उज्जवल देश का निर्माण हो सकता है। 

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