संजीवनी टुडे

बड़े लक्ष्य और आम आदमी के सरोकार का बजट: प्रो. श्रीराम अग्रवाल

संजीवनी टुडे 14-07-2019 15:08:59

विगत आम चुनावों में जनता द्वारा व्यक्त विश्वास के साथ पुनः सत्ता में आयी मोदी सरकार के पूर्ण आत्मविश्वास की झलक बजट-2019 में दिखी।


विगत आम चुनावों में जनता द्वारा व्यक्त विश्वास के साथ पुनः सत्ता में आयी मोदी सरकार के पूर्ण आत्मविश्वास की झलक बजट-2019 में दिखी। पिछले मात्र 5 साल के कार्यकाल के दौरान 1 लाख करोड़ डॉलर जोड़कर, हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था 2.7 लाख करोड़ डॉलर के स्तर पर विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गयी है। अब अगले 5 वर्षों में 5 लाख करोड़ डॉलर पर पहुंचाकर हमें 2024 तक इंग्लैंड व जर्मनी से आगे चौथे पायदान पर पहुंचना है। 

बजट में इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु भविष्य की आर्थिक रणनीति का संकेत भी दे दिया गया है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में अधिकांश क्षेत्रों में 100 प्रतिशत एफडीआई की छूट, मेक इन इण्डिया द्वारा विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों  का स्वागत, विदेशी आयातों  को कम व निर्यात में वृद्धि कर विदेशी मुद्रा के सापेक्ष भारतीय मुद्रा को सशक्त करना, सार्वजनिक बैंकों का 70,000 करोड़ रुपये का पुनर्पंजीकरण कर उनकी औद्योगिक ऋण क्षमता में वृद्धि, 400 करोड़ रुपये तक के उत्पादन पर उत्पादन शुल्क में 5 प्रतिशत की कमी आदि ऐसे उपाय हैं जिनसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था वांछित छलांग लगा सकती है। 

इस दूरदर्शी सोच के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बधाई। भारत में बढ़ती जनसंख्या, साक्षरता व स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार, बढ़ी जीवन प्रत्याशा तथा विस्तृत संचार सुविधाओं व तीव्र औद्योगीकरण से जीवन दृष्टिकोण में आयी व्यवसायिकता की प्रवृति के चलते न केवल शहरी अपितु ग्रामीण क्षेत्रों के मध्यम आय वर्ग (5 लाख से 25 लाख की वार्षिक आय वर्ग) ने, भारत में सम्मानपूर्ण जीवन स्तर की वस्तुओं व सेवाओं के बाजार को अति विस्तारित किया है। तभी घरेलू उद्योग क्षेत्र को बढ़ावा मिला है तथा विकसित राष्ट्रों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी भारत में निवेश करने को उत्सुक हैं।

पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय अर्थ नीति - एक दिशा (1965) नामक अपनी पुस्तक तथा पंचवर्षीय योजनाओं की समीक्षाओं में तत्कालीन कथित आर्थिक प्रगति को राष्ट्रीय सकल उत्पाद (जीडीपी) के औसतन प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय के रूप में प्रस्तुत करने को एक भ्रमपूर्ण विसंगति बताया था। उनका मानना था कि राष्ट्रीय आर्थिक विकास का वास्तविक मानक होना चाहिए आम आदमी की प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में वृद्धि। आम आदमी अब पहले की अपेक्षा सम्मानपूर्ण जीवन स्तर हेतु अधिक वस्तुएं व सेवायें खरीद सकता है।

उपभोक्ता उपभोग योग्य वास्तविक आय, सीधे से प्रभावित होती है परिवार के कमाऊ सदस्य की आय, परिवार में सदस्य संख्या तथा बाजार में मूल्य स्तर से। इस पर समाज कल्याणकारी योजनाओं का भी अप्रत्यक्ष सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि अर्थव्यवस्था के अमीर/अति अमीर वर्ग की लगभग 10 प्रतिशत (राष्ट्रीय सकल आय का 51 प्रतिशत से अधिक हस्तगत करने वाली) जनसंख्या को छोड़ दिया जाए, तो शेष 90 प्रतिशत जनसंख्या (जिसमें से लगभग 60 प्रतिशत बाल, वृद्ध, अक्षम व बेरोजगार युवा गैर कमाऊ वर्ग है) में से मात्र लगभग 30 प्रतिशत कमाऊ मध्यमवर्गीय जनसंख्या ही उपभोक्ता बाजार की प्रभावी मांग को प्रभावित करती है। 

यही वर्ग ऑटो, शिक्षा, रेडीमेड वस्त्र, पर्यटन, इलेक्ट्रॉनिक उपभोग वस्तु, डिजिटल मार्केंटिंग, भवन निर्माण उद्योग, रेस्टोरेंट व्यवसाय तथा माल संस्कृति को प्रभावित करता है। बाजार प्रणाली के माध्यम से, उपरोक्त उद्योगों से जुडे़ करोड़ों स्वरोजगारी मध्यमवर्ग को भी वास्तविक उपभोग योग्य आय प्राप्त होती है। यदि राष्ट्रीय विकास के उच्च लक्ष्यों के चलते इस 30 प्रतिशत वर्ग की वास्तविक उपभोग योग्य आय नहीं बढ़ी, तो घरेलू प्रभावी मांग में कमी, उद्योग क्षेत्रों को शिथिलता एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को क्रमशः मंदी की ओर ले जा सकती है। 

इन बड़े लक्ष्यों से आम आदमी के सरोकार को समझने हेतु अगले 5 वर्षों में होने वाली जनसंख्या वृद्धि, उत्पादकों के लाभकारी मूल्य स्तर में वृद्धि की अनिवार्यता अर्थात आम आदमी की क्रय शक्ति को कम करने वाले बढ़ते हुए मूल्य स्तर, आयात की अपेक्षा अधिक निर्यात के लक्ष्य को पूरा कर डॉलर के सापेक्ष रुपये की मजबूती, जो डॉलर में प्रस्तुत बड़े लक्ष्यों की उपलब्धि को भारतीय रुपये में परिवर्तित करने पर क्रमशः कम भी हो सकती है, को ध्यान में रखना होगा।

उपभोक्ता बाजार की मांग को प्रभावित करने वाले मध्यम आय वर्ग में भी, सबसे बड़ा तबका है वेतनभोगी वर्ग। लेकिन बजट में इस वर्ग के लिए प्रत्यक्ष करों में कोई नई राहत नहीं दी गई है। आर्थिक न्याय एवं तार्किक दृष्टि से विचार करें तो प्रति 10 साल में जो वेतन पुनरीक्षण किया जाता रहा है, वह वास्तव में विगत 10 वर्षों में बढ़ी हुई महंगाई के सापेक्ष बढ़ाये गये महंगाई भत्ते का समायोजन मात्र ही होता है। 

वेतन पुनरीक्षण के नाम पर, इस क्षतिपूरक महंगाई भत्ता को वेतन में परिवर्तित कर दिया जाता है और उस पर बढ़ती हुई कर देयता, इस आय वर्ग की वास्तविक आय को कम कर देती है। बढ़ती हुई महंगाई दर के सापेक्ष, करमुक्त आय के स्तर में वृद्धि के पुनरीक्षण की संभावना पर भी सरकार को गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता थी। बजट में अनुमानित आय के लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारी विनिवेश (1,05,000 करोड़), घरेलू व वैश्विक बाजार से भारी ऋण ( 7 लाख करोड़) जुटाने, गत वर्ष की तुलना में आयकर, उत्पादन शुल्क, सीमा शुल्क, कम्पनी कर व जीएसटी शुल्क आदि से औसतन लगभग 20 से 30 प्रतिशत अधिक राजस्व प्राप्त करने का अनुमान लगाया गया है। 

यदि आम आदमी की वास्तविक आय में वृद्धि हेतु उन्हें सार्थक रोजगार उपलब्ध नहीं हो सके तथा बढ़ती हुई राष्ट्रीय जीडीपी का लाभ धनीवर्ग बनाम आम आदमी की घटती वास्तविक आय आदि जैसी विरोधाभासी स्थितियों में संतुलन की सार्थक कार्यपालन नीति नहीं अपनायी गयी, तो राजस्व की कमी का परिणाम अन्ततः कल्याणकारी योजनाओं पर व्यय कटौती ही होता है। समावेशी वित्त (इन्क्ल्युसिव फाइनेंस) नीति के अन्तर्गत आम आदमी की आय का एक बड़ा हिस्सा बैंक, डाक तार विभाग बचत, बीमा, शेयर मार्केट/ म्यूच्युल फंड, आयकर, बढ़ता हुआ पी.एफ. अंशदान, आदि के माध्यम से उद्योगों तथा सरकारी योजनाओं की ओर प्रेरित किया जा रहा है। 

तब फिर तीव्र भारी औद्योगीकरण के फलस्वरूप उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं को क्रय करने की कितनी वास्तविक क्षमता इस विशालतम मध्यम आय उपभोक्ता वर्ग के पास शेष रहेगी, यह भी विचारणीय है। अतः आवश्यक है कि इन बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुषांगिक, हम आम आदमी की वास्तविक उपभोग योग्य आय को भी ध्यान में रखकर, प्रभावी आर्थिक व वित्तीय नीतियों का निर्धारण करें। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि विगत 5 वर्षों में सरकार की भारत आयुष्मान योजना, उज्ज्वला योजना, घर-घर में विद्युत एवं जलापूर्ति योजना, कन्या विवाह योजना, स्वसहायता समूह योजना, कौशल विकास योजना आदि जैसी कुछ महत्वाकांक्षी योजनाओं से आम आदमी व गरीब तबके के लोगों की वास्तविक आय में अप्रत्यक्ष वृद्धि हुई है। बजट में इन योजनाओं को आगे भी चलाते रहने तथा नये लक्ष्य पूर्ति करने की बात भी कही गई है। हालांकि बजट में नये रोजगार अवसर सृजित करने की, स्थिति भी स्पष्ट करनी चाहिए थी। 

एफडीआई निवेशक बहुराष्ट्रीय कम्पनियां तथा घरेलू उद्योग समूह अपनी न्यूनतम लागत हेतु रोजगार बहुल की अपेक्षा, पूंजी गहन उन्नत तकनीक को अपनाते हैं। ऐसे में इनसे देश में बहुत अधिक नये रोजगार सृजन अवसरों की आशा रखना व्यर्थ है। सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाले रेलवे जैसे सबसे बडे़ सार्वजनिक उपक्रम में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर, वह भी तकनीक गहन होता चला जाएगा। 

सार्वजनिक बैंकों में भी कम्प्यूटरीकृत कोर बैंकिंग प्रणाली के आ जाने के बाद, वहां लगातार सेवानिवृत्त होते जा रहे कर्मचारियों से रिक्त स्थानों पर कई वर्षों से नियुक्तियां नहीं की जा रही है। हमारा महात्वाकांक्षी होना हमारी अपनी क्षमताओं पर विश्वास का द्योतक है।भारतीय अर्थव्यवस्था की क्षमताओं  के प्रति वैश्विक दृष्टिकोण में भी आशापूर्ण परिवर्तन सुखद संकेत है। पर हमें सतर्क रहना होगा कि जिन बड़ी वैश्विक अर्थ व्यवस्थाओं की होड़ में, हम एक लम्बी रेस तय करने को, तेज गति के जीडीपी घोड़े पर सवार हो रहे हैं, उसी ड्रैगन पर सवारी के चलते अब चीन की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी गिरावट किसी से छिपी नहीं है। अपनी अर्थव्यवस्था की वैश्विक सर्वोच्चता बनाये रखने की होड़ में, अमेरिका तथा चीन का व्यापार युद्ध, अब भारत की चौखट पर भी पहुंचता जा रहा है।

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