संजीवनी टुडे

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना कागजी बनकर ही न रह जाए

संजीवनी टुडे 26-05-2018 20:48:54


बेटी है तो कल है !बेटी है तो संसार है! बेटी है अनमोल! इन दिनों इस तरह के नारे चारों और गुंज रहे हैं दूसरी ओर उनके साथ दुराचार की घटनाओं में अतिशय वृद्धि हो रही है।सरकारी स्तर पर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ  योजना का सम्पूर्ण देश में और प्रदेशों में बड़े ही जोर शोर से प्रचार किया जा रहा है।यह योजना महिला एवं बाल विकास विभाग,स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग तथा मानव संसाधन विकास विभाग की संयुक्त पहल एवं समन्वित प्रयासों के अन्तर्गत बालिकाओं को संरक्षित और सशक्त करने हेतु जनवरी,2015में प्रारम्भ की गई थी। योजना का लक्ष्य पक्षपाती लिंग चुनाव की प्रक्रिया का उन्मूलन करना ,बालिकाओं का अस्तित्व और सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा बालिकाओं की शिक्षा सुनिश्चित करना निर्धारित किया गया था।केन्द्र सरकार को बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना का विचार मध्यप्रदेश से ही मिला है। बालिकाओं के कल्याण के लिए कई बड़ी योजनाओं की शुरूआत करने का श्रेय मध्यप्रदेश सरकार को ही है।यह बात सही है कि आज भी बहुत से लोग लड़के-लड़की में भेद करते हैं, कन्या जन्म पर मातम करते हैं और लड़कियों को परिवार पर बोझ समझते हैं।जनसामान्य की यह सोच बदलना आवश्यक भी है।इसी को ध्यान में रखकर बेटी बचाओ अभियान देशभर में चलाया जा रहा है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने अपने व्यक्तिगत प्रयास एवं नेतृत्व में बेटी बचाओ अभियान की शुरूआत की थी।लड़कियों के लिंगानुपात में लगातार गिरावट को रोकने के लिए संकल्प पारित कर इसे अभियान के रूप में प्रारम्भ किया गया था।इससे जुड़े सामाजिक प्रभाव और लैंगिक भेदभाव को दूर करना इसका मुख्य लक्ष्य था।इस अभियान के अन्तर्गत समाज में लिंग अनुपात के लिए कन्या भ्रूण को बचाने के महत्व के बारे में लोगों को शिक्षित और जागरूक करने के लिए कार्ययोजना हाथ में ली जाकर गतिविधियाँ संचालित की गई।मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री द्वारा पाँच अक्टोबर को बेटी बचाओ अभियान की शुरूआत की जाकर इस दिवस को बेटी बचाओ दिवस मनाये जाने की घोषणा की गई थी किन्तु प्रदेश में बेटियाँ ही सुरक्षित नहीं है।दुष्कर्म की घटनाओं में अभिवृद्धि हो रही है तब योजना की सफलता का विश्वास कैस हो।

हालांकि मध्यप्रदेश के साथ केन्द्र सरकार ने भी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना की बात बड़े ही जोर-शोर से कही है।लिंगानुपात समान करने की दिशा में पूर्ववर्ती सरकारों ने भी बहुतेरे प्रयास किये हैं।इन्हें देखते हुए बेटियों की संख्या में लक्ष्यानुरूप वृद्धि होना थी और लिंगानुपात समान स्तर पर आना था। उम्मीद की गई थी कि इस अभियान से लोगों की मानसिकता मे सुधार आएगा,लोगों में जागरूकता आएगी,लिंगानुपात में कमी आएगी और लिंग भेद समाप्त होगा लेकिन दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैसेंट की हाल ही में जारी रिपोर्ट हमारी आँखे खोलने के लिए पर्याप्त है और सरकारी दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।इसे हम मध्यप्रदेश के संदर्भ में ही यदि देखें तो सरकारी प्रचार की हवा निकलती दिखाई देगी! प्रदेश में लैंगिक भेदभाव के चलते हर साल करीब 19300 बालिकाएँ पाँच वर्ष की अवस्था होते-होते असमय मौत के मुँह में समा जाती है।उत्तर प्रदेश में हर साल 70782,राजस्थान में 20963 तथा बिहार में 45538 बालिकाओं की मौत के आँकड़े हैं।बेटियों के संरक्षण का सबसे ज्यादा दावा करने वाले मध्यप्रदेश में ही अन्य राज्यों की तुलना में मृत्यु दर अधिक है जो बिहार,राजस्थान और उत्तर प्रदेश से भी प्रदेश को निम्नतर स्थिति में लाता है।अन्य प्रदेशों की भी गुणात्मक रूप में स्थिति अच्छी नहीं है।

रिपोर्ट के अनुसार देश में भ्रूण परीक्षण के जरिये ही बालिका के जन्म को नहीं रोका जाता बल्कि जन्म के बाद भी भेदभाव और उपेक्षा के कारण शून्य से पाँच वर्ष तक की आयु की दो लाख उनचालीस हजार बालिकाएँ काल के गाल में समा जाती हैं।यानी असमय और असामान्य मृत्यु! इसी रिपोर्ट के अनुसार बालिकाओं की असमय मृत्यु होने के चार प्रमुख कारण हैं जो क्रमशः चिकित्सा सेवा एवं सुविधाओं का अभाव ,उपेक्षा,भ्रूण परीक्षण और पिछड़ापन है। कई जिलों में चिकित्सा सुविधा मानक स्तर की नहीं है,परिवार द्वारा बच्चियों की ओर समुचित ध्यान न देने से भी कुपोषण की स्थिति निर्मित होती है।सरकारी सख्ती के बावजूद भ्रूण परीक्षण चोरी-छुपे बदस्तुर जारी है।साथ ही सामाजिक कुरीतियाँ,पिछड़ापन और सामाजिक वर्जनाएँ भी बालिकाओं की असामान्य मृत्यु का कारण बन रही है।सबसे ज्यादा चिन्ताजनक स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता तथा कुपोषण बतायी गई है जिसका सीधा-सीधा अर्थ है कि योजना के क्रियान्वयन में खामियाँ हैं और यह तीनों विभागों की विफलता या निष्क्रियता ही कही जाएगी।

देश भर में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना का जितना प्रचार-प्रसार किया गया, जमीनी हकीकत बिलकुल जुदा हैं इतनी समयावधि व्यतीत होने के बाद भी योजना के परिणाम नगण्य होकर उत्साहवर्धक भी नहीं हैं।तभी तो मध्य प्रदेश ,राजस्थान,बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस मामले में बदतर स्थिति में हैं।ये आँकड़े केन्द्र और राज्य सरकारों को सचेत होने,सम्बन्धित विभागों के कार्यकलापों में सुधार एवं कसावट लाने और मैदानी स्तर पर सही दिशा में कार्य करने के संकल्प लेने का संकेत देते हैं। उम्मीद की जाना चाहिए कि इस रिपोर्ट से देश और प्रदेश की सरकारें जाग जायेंगी और सही दिशा में कदम बढ़ाएगी।कन्या जन्म की सुरक्षा और संरक्षण ही नहीं बल्कि दिनोंदिन जो राक्षसी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है उनसे भी सुरक्षा और संरक्षण की गारंटी चाहती हैं कन्याएँ वरना बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना कागजी ही बनकर रह जाएगी।

प्रदीप

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