संजीवनी टुडे

राष्ट्रपिता बनने से वंचित रह गये बाघा जतिन

-विश्वजीत राहा

संजीवनी टुडे 06-12-2019 14:26:00

आजादी की लड़ाई का इतिहास लिखे जाने के वक्त नाइंसाफी का शिकार होने वालों में एक ऐसा क्रांतिकारी भी था, जिसका प्लान अगर कामयाब हुआ होता तो देश भी 32 साल पहले ही यानि 1915 में आजाद हो गया होता।


आजादी की लड़ाई का इतिहास लिखे जाने के वक्त नाइंसाफी का शिकार होने वालों में एक ऐसा क्रांतिकारी भी था, जिसका प्लान अगर कामयाब हुआ होता तो देश भी 32 साल पहले ही यानि 1915 में आजाद हो गया होता। उस क्रांतिकारी का नाम था जतिन्द्रनाथ मुखर्जी जिन्हें लोग प्यार से बाघा जतिन के नाम से पुकारते थे। जतिन्द्रनाथ मुखर्जी का जन्म 07 दिसम्बर 1879 में जैसोर जिला अब बांग्लादेश में हुआ था। महज 5 वर्ष की आयु में पिता का साया सिर से हट जाने के बाद उनकी माँ शरतशशि ने ही उनको पाला पोसा था।
        
जतिन्द्रनाथ मुखर्जी के कई किस्से उन दिनों बहुत मशहूर हुए थे। एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्रनाथ ने अकेले ही आठ आठ अंग्रेजों को पीट दिया था। 11 साल की उम्र में ही उन्होंने शहर की गलियों में लोगों को घायल करने वाले बिगड़ैल घोड़े को काबू किया, तो लोगों ने काफी तारीफ की। ध्रुव, प्रहलाद, हनुमान और राजा हरिश्चंद्र जैसे रोल नाटकों में अभिनय का लोहा मनवाने वाले जतिन ने 27 वर्ष की उम्र में अपनी खुखरी से राॅयल बंगाल टाइगर को मार गिराने का साहसिक कार्य भी किया था।
        
समय बीतने के साथ ही जतिन की चर्चा बलिष्ठ समाजसेवी के रूप में होने लगी। सुभाष चन्द्र बोस के पहले जतिन ने ही महसूस किया कि भारत की आजादी के लिए एक अपनी नेशनल आर्मी होनी चाहिए। शायद यह भारत की नेशनल आर्मी बनाने का पहला विचार था। जो बाद में मोहन सिंह, रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस के चलते अस्तित्व में आई। साल 1900 में ही उन्होंने उस वक्त क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा संगठन अनुशीलन समिति की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी। बाद में अरविंदो घोष यानी महर्षि अरविंदो से मिलने के बाद इस काम में तेजी लाई गई। बंगाल के हर जिले में इसकी शाखा खोली गई, फिर बिहार और उड़ीसा का रुख किया गया। 1905 में कलकत्ता में ब्रिटेन के राजकुमार का दौरा हुआ। अंग्रेजों की बदतमीजियों से खार खाए बैठे जतिन ने राजकुमार के सामने ही उनको सबक सिखाने की ठानी। ब्रिटेन के राजकुमार का स्वागत जुलूस निकल रहा था। एक गाड़ी की छत पर कुछ अंग्रेज बैठे हुए थे, और उनके जूते खिड़कियों पर लटक रहे थे, गाड़ी में बैठी महिलाओं के बिलुकल मुंह पर। अंग्रेजों के इस व्यवहार से जतिन  इतने कुपित हो उठे कि एक-एक करके सारे अंग्रेजों को पीट दिया। तब तक पीटा जब तक कि सारे नीचे नहीं गिर गए। इस घटना से अंग्रेजों के भारतीयों के व्यवहार के बारे में उनके शासकों के साथ-साथ दुनियां को भी पता चला कि भारतीयों के मन से अंग्रेजी राज का खौफ निकल चुका है और बाघा जतिन के नाम के प्रति क्रांतिकारियों के मन में सम्मान और भी बढ़ गया।
        
इधर इस घटना के बाद जतिन ने वारीन्द्र घोष के साथ देवघर में एक बॉम्ब फैक्ट्री शुरू की, लेकिन साथ-साथ जतिन विवेकानंद के प्रभाव में गरीबों के लिए, भारतीय सैनिकों के लिए महामारी या कुम्भ जैसे बड़े आयोजनों के वक्त मेडिकल कैम्प्स चलाने जैसे कई सोशल कामों में भी लगे रहे। हालांकि उस दौर के अंग्रेज लेखकों के मुताबिक इस सोशल कामों के जरिए वो नये क्रांतिकारियों की भर्ती करने और अलग-अलग इलाकों में अपने क्रांतिकारी संगठनों की मीटिंग करने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे।

तीन साल के लिए उनको दार्जीलिंग भेजा गया, जहां उन्होंने अनुशीलन समिति की एक शाखा बांधव समिति शुरू की। जतिन मुखर्जी ने अलग-अलग नामों से कई संस्थाएं शुरू कीं जिनमें कोई कॉटेज इंडस्ट्री, वयस्कों के लिए नाइट स्कूल, कृषि के क्षेत्र में प्रयोग, होम्योपैथी डिस्पेंसरीज के लिए काम कर रही थी। यहां तक कि सर डेनियल की मदद से जतिन ने कई स्टूडेंट्स को देश से बाहर पढ़ने के लिए भेजा। उन्हीं में से कुछ को नॉर्थ अमेरिका भेजा गया, जहां उनको मिलिट्री ट्रेनिंग मिली, हिंदू और सिख अप्रवासियों ने उन्हें मदद की, जो बाद में गदर पार्टी की स्थापना का आधार बना। उन्हीं में से हेम दास और पांडुरंग एम बापट ने रूसी क्रांतिकारी आराजकतावादी निकोलस सेफ्रांसकी से बम बनाने की ट्रेनिंग भी ली। अलीपुर बॉम्ब केस में ज्यादातर बड़े क्रांतिकारी नेता फंस गए, ऐसे में आजादी की ज्वाला को बनाये व प्रसारित करते रहने की सारी जिम्मेदारी जतिन के सिर पर आ गई। ऐसे में उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखने के लिए एक सीक्रेट संस्थाएं खड़ी की, जुगांतर पार्टी की भी कमान संभाली। अरविंद घोष की इस संस्था से उस वक्त बंगाल के सभी बड़े क्रांतिकारी जुड़े थे, बाद में सबको या तो काला पानी की सजा मिली या किसी पॉलटिकल पार्टी से जुड़कर बच गए।
        
बंगाल के क्रांतिकारियों के अंग्रेजो के लिए दुस्साहसिक कारनामों के कारण ही 1912 में अंग्रेजों ने अपनी राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली कर लिया। इनमें सबसे बड़ा नाम बाघा जतिन का ही था। अपने सभी सामाजिक कामों और क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने की खातिर जतिन ने भारत में एक नया तरीका ईजाद किया, जिसके बारे में अंग्रेजी इतिहासकारों ने लिखा है ‘बैंक रॉबरी ऑन ऑटोमोबाइल्स टैक्सी कैब्स’। जतिन की लीडरशिप में कई हथियारों की खेप लूट ली गईं। लेकिन जतिन का नाम सामने नहीं आता था। सीक्रेट सोसायटी की इन्हीं दिनों भारतीयों पर अन्याय करने वाले सरकारी अधिकारियों चाहे अंग्रेज हों या भारतीयों को मारने का ऑपरेशन भी शुरू कर दिया, लेकिन एक सरकारी वकील और अंग्रेज डीएसपी को खत्म किया गया, तो एक क्रांतिकारी ने जतिन का नाम उजागर कर दिया।

इतिहास में इसे ‘जर्मन प्लॉट’ या हिंदू-जर्मन कांस्पिरेसी के नाम से जाना जाता है। अगर वो कामयाब हो जाता तो देश को ना बोस की जरूरत पड़ती और ना गांधी की। इधर जतिन की कई सीक्रेट समितियों में अंग्रेज कोई कनेक्शन साबित नहीं कर पाए और जतिन को छोड़ना पड़ा। बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिंगापुर जैसे कई ठिकानों में 1857 जैसे सिपाही विद्रोह की योजना बनाई गई। फरवरी 1915 की अलग-अलग तारीखें तय की गईं, पंजाब में 21 फरवरी को 23 वीं कैवलरी के सैनिकों ने अपने ऑफीसर्स को मार डाला। लेकिन उसी रेंजीमेंट में एक विद्रोही सैनिक के भाई कृपाल सिंह ने गद्दारी कर दी और विद्रोह की सारी योजना सरकार तक पहुंचा दी। सारी मेहनत एक गद्दार के चलते मिट्टी में मिल गई। 9 सितंबर 1915 को अपने ही लोगों की गद्दारी के कारण बाघा जतिन भारत को आजाद कराने का सपना लेकर शहीद हो गये। अगर बाघा जतिन की रणनीति असफल न हुई होती तो देश उन्हें ही राष्ट्रपिता के नाम जानता।

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