संजीवनी टुडे

( आलेख) संघर्ष के प्रतीक जॉर्ज जन्मजात विद्रोही थे

संजीवनी टुडे 01-06-2019 16:49:48


आपातकाल के अप्रतिम योद्धा जॉर्ज फर्नांडिस राजनेता, पत्रकार एवं ट्रेड यूनियन नेता होने के साथ-साथ मूर्तिमान संघर्ष तथा जन्मजात विद्रोही थे। जॉर्ज नौ बार लोकसभा तथा एकबार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। जाति, धर्म और भौगोलिक सीमाओं को तोड़ते हुए जॉर्ज बिहार से कई बार लोकसभा चुनाव लड़कर संसद पहुंचे। वह कन्नड़, मराठी, हिंदी, लैटिन, तुलु, मलयाली, उर्दू, तमिल और अंग्रेजी सहित कुल 10 भाषाओं के जानकार थे। 

जॉर्ज के अनुसार उनके पिता उन्हें एडवोकेट बनाना चाहते थे। वह चाहते थे कि जॉर्ज अधिवक्ता बनकर पारिवारिक विवादों का निस्तारण कराएं किंतु पारिवारिक संपत्ति को लेकर चल रहे निरंतर विवादों तथा पिता की हठधर्मिता को देखकर पिता के प्रति विद्रोह में उन्होंने अधिवक्ता बनने से साफ इनकार कर  दिया। अधिवक्ता बनने से इनकार करने पर परिवार की इच्छा थी कि वह पादरी बनकर अपने धर्म एवं समुदाय की सेवा करें। उन्हें धार्मिक अध्ययन के लिए बैंगलोर स्थित सेंट पीटर सेमिनरी भेजा गया था। 1946 से 1948 तक 16 वर्ष की उम्र में उन्हें रोमन कैथोलिक पादरी का प्रशिक्षण दिया गया किंतु सेमिनरी की व्यवस्था को देखकर उनका क्रांतिकारी स्वभाव विद्रोह कर बैठा। 19 वर्ष की आयु में धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने से इनकार कर उन्होंने सेमिनरी का परित्याग कर दिया। 

इस संबंध में उल्लेखनीय है कि सेंट पीटर सेमिनरी में वहां के फादर्स/ अध्यापक ऊंची टेबल पर बैठकर अच्छा भोजन करते थे जबकि प्रशिक्षणार्थियों को ऐसी सुविधा प्राप्त नहीं थी। उन्हें निम्न कोटि का भोजन प्रदान किया जाता था। वहां के फादर्स एवं व्यवस्थापकों के कर्म, आचरण एवं वाणी में साम्य नहीं था। वह कहते कुछ थे और करते कुछ थे। इस दोहरेपन के खिलाफ जॉर्ज का मन धार्मिक शिक्षा के प्रति विद्रोह कर बैठा। वह सेंट पीटर सेमिनरी धार्मिक शिक्षण संस्थान का परित्याग कर उन्नीस वर्ष की उम्र में किसी को बिना कुछ बताए मायालोक मुंबई पहुंच गए। मुंबई की सड़कों पर रात बिताते हुए अपने लिए कामकाज की तलाश करते रहे। कुछ समय पश्चात एक अखबार में उन्हें प्रूफ्र रीडर की नौकरी मिली, जहां उनका संपर्क अनुभवी यूनियन नेता क्लासिक डिमेलो तथा समाजवादी चिंतक डॉ.राम मनोहर लोहिया से हुआ। इन नेताओं का उनके जीवन पर व्यापक असर पड़ा। 

यूनियन नेता क्लासिक डिमेलो के सानिध्य में रहकर वह मजदूर आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए उनका प्रतिनिधित्व करने लगे। एक समय ऐसा आया कि वह अपने संघर्ष के बल पर मुंबई में ट्रेड यूनियन के सर्वमान्य नेता बन गए। मजदूर आंदोलनों का नेतृत्व करते हुए वह उनकी मांगों तथा जायज हक के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे। इसी दौरान वे मुंबई नगर निगम के सदस्य बने तथा 1961 से लेकर 1967 तक महानगर के प्रतिनिधि सभा में शोषित मजदूरों की आवाज उठाते रहे। 

जॉर्ज के संघर्ष के जज्बे को देखते हुए संयुक्त समाजवादी पार्टी ने सन 1967 के चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस के प्रसिद्ध नेता सदाशिव कानोजी पाटिल के विरुद्ध उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया। उस समय पाटिल का यह दावा था कि चुनाव में उन्हें भगवान भी नहीं हरा सकता। वह तथा उनकी पार्टी कांग्रेस उनकी जीत के लिए पूरी तरह निश्चिंत थे। जॉर्ज ने इस अ‌वसर को समझा तथा मजदूर आंदोलन के अपने अनुभवों से मुंबई की दीवारों को अपने पोस्टर से पटवा दिया, जिसमें लिखा था कि भगवान तो नहीं हरा सकता किंतु आप मतदाता किसी को भी हरा सकते हैं। जॉर्ज का यह कथन आम जनता को प्रभावित करने में सफल रहा और एस.के. पाटिल को जॉर्ज के समक्ष मुंह की खानी पड़ी। जॉर्ज लगभग 50% मत प्राप्त करने में सफल रहे। चुनाव जीतने के बाद वह 'जार्ज द जायंट किलर' के नाम से विख्यात हुए। इस चुनाव नतीजे से कांग्रेस के प्रत्याशी पाटिल इतने हतोत्साहित हो गए कि उन्होंने चुनावी राजनीति से ही संन्यास ले लिया।

इस चुनाव को जीतकर जॉर्ज पहली बार संसद पहुंचे तथा पूरे राष्ट्र में उनके नाम की चर्चा हुई। सन 1973 में उन्हें ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का अध्यक्ष चुना गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 3 वेतन आयोगों का गठन हो चुका था किन्तु रेल कर्मचारियों के वेतन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं की गयी थी। जॉर्ज ने ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का अध्यक्ष बनते ही कर्मचारियों के वेतन एवं अन्य मांगों के समर्थन में व्यापक हड़ताल आयोजित करने का निर्णय लिया। 8 मई 1974 को मुंबई में हड़ताल शुरू हुई, जिसमें बाद में जॉर्ज के प्रभाव से टैक्सी ड्राइवर, इलेक्ट्रिसिटी यूनियन और ट्रांसपोर्ट यूनियन भी शामिल हो गई। लगभग पूरा देश थम सा गया। आरंभ में इंदिरा सरकार ने इस हड़ताल की ओर ध्यान नहीं दिया किंतु बाद में उसकी व्यापकता को देखते हुए उसे निर्ममता से कुचलकर हजारों कामगारों को जेल में डाल दिया गया। इससे हड़ताल तो ख़त्म हो गई लेकिन इंदिरा गांधी का एक स्थाई विरोधी जॉर्ज फर्नांडिस का जन्म हुआ। जिन्होंने रेलवे आंदोलन के विरुद्ध सरकार के दमन को आजीवन याद रखते हुए कांग्रेस सरकार का आजीवन विरोध किया। 

1975 में आपातकाल की घोषणा के पश्चात प्रमुख विपक्षी दलों के समस्त नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया किंतु जॉर्ज भेष बदलकर गिरफ्तारी से बचते हुए निरंतर आपातकाल के विरुद्ध आंदोलनरत रहे। जॉर्ज तो गिरफ्तारी से बचते रहे किंतु आपातकाल लगते ही उनके भाई तथा मंगलौर ट्रेड यूनियन के नेता माइकल को गिरफ्तार कर लिया गया। जॉर्ज की गिरफ्तारी न होने से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी शासन व्यवस्था से अत्यंत असंतुष्ट थीं। उनके निर्देश से कर्नाटक सरकार ने उनके छोटे भाई लारेंस को गिरफ्तार कर लिया और बुरी तरह प्रताड़ित किया। किसी समय जॉर्ज की मित्र रही अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, जहां लंबी बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गई। कांग्रेस एवं इंदिरा सरकार के प्रति घृणा से भरे जॉर्ज आपातकाल के विरुद्ध जगह-जगह विस्फोट कर जनता को जागृत करते हुए आंदोलन चलाना चाहते थे। इसके लिए अपने मित्रों को संगठित कर डायनामाइट इकट्ठा कर योजना को मूर्त रूप देना चाहते थे। किंतु इसके पूर्व ही वह कोलकाता में 10 जून 1976 को गिरफ्तार कर लिए गए। जेल में जॉर्ज को अधिकतम प्रताड़ित किया गया और थर्ड डिग्री तक टॉर्चर किया गया। हथकड़ी में उनकी एक तस्वीर बहुत लोकप्रिय हुई। 

आपातकाल की समाप्ति तथा लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ जेलों में बंद नेताओं को रिहा किया गया किंतु जॉर्ज को रिहा नहीं किया गया। लोकसभा के निर्वाचन में जॉर्ज बिहार के मुजफ्फरपुर से प्रत्याशी बने तथा जेल में ही रहकर चुनाव लड़े। चुनाव में हथकड़ियों में जकड़े जॉर्ज की तस्वीर वाले पोस्टरों से मुजफ्फरपुर की दीवारों को पाट दिया। इससे प्रभावित होकर मुजफ्फरपुर की जनता ने जॉर्ज के लिए एकपक्षीय मतदान कर अप्रत्याशित रूप से तीन लाख से भी अधिक मतों से उन्हें विजयी बनाया। इस जीत के साथ वह देसाई सरकार में पहले संचार मंत्री और बाद में उद्योग मंत्री बने। उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी कोकाकोला तथा आईबीएम को विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम फेरा के नियमों का पालन करने से इनकार करने पर देश छोड़ने का आदेश देकर देश से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया। उक्त अधिनियम के तहत विदेशी कंपनियों को अपनी भारतीय सहयोगी कंपनियों में बहुलश: हिस्सेदारी को बेचना होता। जॉर्ज चाहते थे कि विदेशी कंपनियां अपनी कंपनियों में सहयोगी कंपनियों को हिस्सेदारी तो दे ही, साथ ही अपना फॉर्मूला भी कंपनियों को उपलब्ध कराए जिनके लिए विदेशी कंपनियां तैयार नहीं थी। उनका कहना था कि यह व्यापार से जुड़ी गोपनीय सूचना है, जिसे हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। फलस्वरूप सरकार ने कोकाकोला तथा आईबीएम को व्यापार करने के लिए लाइसेंस देने से मना कर दिया, जिससे उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। यह अलग तथ्य है कि बाद में आर्थिक उदारीकरण के नाम पर पीवी नरसिम्हा राव सरकार द्वारा कोकाकोला सहित अनेक विदेशी कंपनियों को भारत आने की अनुमति प्रदान कर दी गई।

भारतीय राजनीति में जॉर्ज फर्नांडीज ऐसे राजनेता थे जो वह सोचते थे, वही बोलते थे और वही करते भी थे। उन्होंने आजीवन अपने कार्य स्वयं किए और कभी किसी सहयोगी या कर्मचारी का सहयोग नहीं लिया। अपने कपड़े आजीवन स्वयं धोते रहे। चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी मान्यता स्पष्ट रूप से प्रकट की। चीन भारत का नंबर 1 तथा पाकिस्तान नंबर 2 का दुश्मन है। तिब्बत की स्वतंत्रता के संदर्भ में अपने स्पष्ट विचार प्रस्तुत किए तथा दलाई लामा की खुले रूप में पक्षधरता की। जिसके चलते वाजपेयी सरकार को चीन से संबंध सामान्य बनाए रखने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी।

अपने सिद्धांतों के प्रतिकूल जाकर कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर रखने के लिए लगभग समस्त राजनीतिक दलों के लिए अछूत भारतीय जनता पार्टी को आगे बढ़कर सहयोग दिया और राजनीति में व्याप्त अस्पृश्यता को दूर करते हुए वाजपयी सरकार बनने में अप्रत्याशित योगदान दिया। भाजपा को 2 सीटों से सत्ता तक लाने में जार्ज का योगदान अभूतपूर्व है। जॉर्ज न होते तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन न होता और वाजपेयी जी की सरकार भी नहीं बनती। भाजपा को राममंदिर, धारा 370 और कॉमन सिविल कोड के साथ स्वीकार करने के लिए राजनीतिक दल तैयार नहीं थे। भाजपा के लिए भी यह उसके मुख्य राजनीतिक आधार थे, जिन्हें छोड़ने के लिए वह तैयार न थी। जॉर्ज ही थे जिन्होंने गठबंधन सरकार के लिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की पृष्ठभूमि तैयार की, जिससे अन्य राजनीतिक दलों के बीच भाजपा ने स्वीकार्यता प्राप्त की। भाजपा नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक बनकर जॉर्ज ने राजनीतिक दलों के मध्य कुशलतापूर्वक सामंजस्य बनाए रखने का कार्य किया। वाजपेयी सरकार में उन्होंने पहले रेलमंत्री और बाद में रक्षामंत्री के रूप में सफलतापूर्वक कार्य किया। इसके पूर्व वह वीपी सिंह की सरकार में भी रेलमंत्री के रूप में कार्य कर चुके थे। रेलमंत्री के रूप में उन्होंने कोंकण रेल परियोजना तथा रक्षामंत्री के रूप में पोखरण परमाणु विस्फोट को मूर्त रूप देने में अपना योगदान दिया। बाद में कारगिल युद्ध के समय उनपर ताबूत घोटाले का आरोप लगा, जिसके चलते उन्हें रक्षामंत्री के पद से त्यागपत्र देना पड़ा।

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जॉर्ज ने राजनीतिक दलों के बीच भाजपा की अस्पृश्यता तो दूर कर दी किंतु स्वयं समाजवादियों के लिए अस्पृश्य हो गये। समाजवादी विचारधारा के उनके सहयोगी उनसे दूर जा चुके थे तथा उनके चेले उन्हें भविष्य के लिए उपयोगी न पाकर उनसे मुंह मोड़ बैठे थे। परिणामस्वरूप उन्हें अपना अंतिम चुनाव समाजवादियों द्वारा अपनी मूल पार्टी से टिकट न दिए जाने के कारण मुजफ्फरपुर से निर्दलीय लड़ना पड़ा तथा उन्हें बुरी तरह पराजित होना पड़ा। अपने आखिरी वर्षों में पूरी तरह से एकाकी होकर रह गए जॉर्ज आज हमारे बीच नहीं हैं किंतु उनके विचार, कार्य और उनका संघर्ष हम सबके बीच है। जिसके आधार पर वह भारत के अमरपुत्र बनकर जनमानस के दिलो-दिमाग में लंबे समय तक छाए रहेंगे। उचित होगा कि उनकी लंबी सेवाओं को देखते हुए राजग सरकार उनके लिए भारत रत्न दिए जाने के प्रश्न पर विचार करे। जॉर्ज को भारत रत्न दिए जाने पर देश की जनता, भाजपा एवं राजग की ओर से उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

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