संजीवनी टुडे

वास्तव में यहां थी एक माफीनामे की दरकार

डाॅ.विलास जोशी

संजीवनी टुडे 23-02-2020 14:59:07

इन दिनों वे बहुत गंभीर रूप से बीमार है। अब जबकि वे बिस्तर पर है तो उन्हे अपने किए ’कर्म’ याद आ रहे है। अब उन्हे पछतावा हो रहा है कि जब वे किसी पार्टी के चमकते चांँद थे, तब उन्हे अपनी प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण करना चाहिए था।


इन दिनों वे बहुत गंभीर रूप से बीमार है। अब जबकि वे बिस्तर पर है तो उन्हे अपने किए ’कर्म’ याद आ रहे है। अब उन्हे पछतावा हो रहा है कि जब वे किसी पार्टी के चमकते चांँद थे, तब उन्हे  अपनी प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण करना चाहिए था। उस समय वे सत्ता के उम्माद मे न जाने किस किस से क्या क्या कह गए। अब चिंता और चिंतन के दौर में उनकी आंँखों से आंसू निकल रहे है। एक समय था जब उनकी  उनके पार्टी के ’हाईकमान’ और बच्चनसाहब से बहुत गहरी दोस्ती थी। चूंकि अमिताभ सक्रिय राजनीति से अपने आप का बाहर निकाल चूके थे, इसलिए वेअपनी प्रतिक्रियाएं बहुत ही संयमित शब्दों में देते थे और आज भी उनका यही क्रम जारी है। फिर बच्चनजी वैसे भी एक बहुत ही सुलझे हुए व्यक्तित्व है, जिन्होने  ’फिल्म जगत’ ओैर ’राजनीति के मैदान’ में बहुत ही धीरज के साथ अपने कदम रखे।

अब  यह सवाल उठना तो लाजिमी ही है कि उन पर ऐसा कौनसा पहाड़ टूट पड़ा था जो  उनको जया बच्चन के महिला अपराधों पर दिए भाषण पर यह प्रतिक्रिया करनी पड़ी  कि-’’आप अपने पति से क्यों नहीं कहती कि वह’’चुम्मा.. चुम्मा दे दे’’,न करे।आप अपने पति ये क्यों नहीं कहती कि ’’बारिश में भीगती नायिका के साथ’’आज रपट जाईयों,हमे न भुलइयो,’’ न करे। इसके अलावा उन्होने बच्चन परिवार के बहुं और बेटे पर भी कुछ इसी प्रकार की टिप्पणियां की, जबकि उन दिनों जयाजी समाजवादी पार्टी की तरफ से राज्यसभा में सांसद थी। फिर अपनी ही पार्टी के सांसद के विरूद्ध ऐसी व्यक्तिगत टिप्पणी करने के पिछे उनका कुछ तो आशय रहा ही होगा  न?

संभव है उन दिनों उनके बच्चन परिवार से कुछ रिश्त कड़वे हो गए हो? कहते है कि दो बड़ी हस्तियों का आपस में बेहद नजदिक का रिस्ता  होने की स्थिति में उनमें कुछ  अधिक ही  उम्मीदों का दौर चलता हेै, यदि ऐसे में कुछ उम्मीद पूरी न हो, तब ऐसी कड़वी घटनाएं ’’कड़वे शब्दों की प्रतिक्रियाए लिए ही सबके सामने आती है। सच तो यह है कि उस समय आदमी  गुस्से में उबलते हुए तल्ख टिप्पणी कर देता है, लेकिन समय गुजरने के साथ उसे उसके ही बोले गए शब्द ’एक नूकिले बाण’ की तरह चुभते हेै और फिर वह ’’पछतावे की आग’’ में झुलजने लगता है, तब उसके अपने आंख के आंसू तक उसे बुझाने में नाकामयाब रहते है। फिर आदमी माफीनामें के बारे में सोचने लगता है।
   
वैसे तो उनका माफीनामा बहुत देर से आया है, लेकिन जिंदगी अपना दामन छोड़ दे इसके पहले उन्होने माफी मांगकर एक नेक काम ही किया है।  अच्छा होता वे लगे हाथ जयाप्रदाजी ओैर ऐसे उन सब लोगों से भी माफी मांग लेते जिनके बारे में यदाकदा कोई कटू टिप्पणी उन्होने की हो? सच तो यह बात कुछ वैसी ही होगी जैसे हमारी फिल्मों मेें अक्सर होता है कि फिल्म के अंतिम दृष्य में ’फिल्म का खलनायक’, नायक, नायिका और उनके परिजनों से अपने किए कृत्यों के लिए उनसे क्षमा मांगता है। हालाकि गांधीगिरी इस बारे में यह कहती है कि-’’ जो अपराधीआदमी, ’अधिकारीक आदमी’ (जिसके प्रति उसने अपराध किया है) के समक्ष स्वेच्छा से अपनी गलतियों के लिए माफी मांगता है, तो मान लेना चाहिए कि वह अपने मन से शुद्धतम प्रायश्चित कर रहा है’’। हम आशा करे कि उनके इस शुद्धतम प्रायश्चित पर उन्हे क्षमा दान मिलेगा!

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