संजीवनी टुडे

नयी शिक्षा नीति में प्रमाणपत्रों के स्थान पर योग्यता को महत्व दिया जाय- डा. बागीश आचार्य

संजीवनी टुडे 04-07-2019 11:41:46

शिक्षा जगत का एक ऐसा नाम जिसने सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अमेरिका, ब्रिटेन, मारीशस आदि विश्व के अनेक देशों में अपनी वैचारिकी की अमिट छाप छोड़ी है।


(साक्षात्कार) शिक्षा जगत का एक ऐसा नाम जिसने सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अमेरिका, ब्रिटेन, मारीशस आदि विश्व के अनेक देशों में अपनी वैचारिकी की अमिट छाप छोड़ी है। बागीश जी वर्ष 1979 से एटा के आर्ष गुरूकुल के प्राचार्य तो हैं ही, भारतीय वैदिक वांड्मय के प्रखर वक्ता के नाते देश-विदेश में सतत भ्रमण करते रहते हैं। मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, केरल व लद्दाख को छोड़ सम्पूर्ण देश का भ्रमण कर चुके बागीश जी का ज्ञान वैदिक वांड्मय के प्रखर वक्ता होने के साथ-साथ दर्शन, आधुनिक शिक्षापद्धति व अन्यान्य आधुनिक विषयों पर स्पृहणीय है। 

नयी शिक्षानीति के विषय में हिन्दुस्थान समाचार के संवाददाता कृष्णप्रभाकर उपाध्याय ने आर्ष गुरूकुल के प्राचार्य डा. बागीश आचार्य से भेंट की और ​शिक्षा व्यवस्था को लेकर बातचीत की। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश- 

प्रश्न- केन्द्र सरकार नयी शिक्षानीति लाने की तैयारी में है, शिक्षाविदों व आमजन से सुझाव भी मांगा जा रहा है। आपके हिसाब से कैसी होनी चाहिए नयी शिक्षानीति? 
उत्तर- नयी शिक्षानीति अगर लागू कर रहे हैं तो उसमें जो कमियां छूट गयी हैं, उन्हें ठीक किया जाना ज्यादा जरूरी होगा। हम समानता का वह स्तर तो शिक्षा में नहीं ला सकते, क्योंकि परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं। पर इतना तो कर सकते हैं कि हमारे सब शिक्षण संस्थानों का स्तर एक जैसा हो। 

कनाडा में एक निश्चित किलोमीटर के दायरे में जो विद्यालय हैं उन्हें उस क्षेत्र में रहने वाले सब बच्चों को एडमीशन देना पड़ता है, उसे पढ़ाने की जिम्मेवारी उनकी है- ऐसी व्यवस्था है। आप ऐसा क्यों नहीं कर सकते? दूसरे, डिजिटल तरीके से शिक्षणालयों का स्तर बढ़ा सकते हैं। आईआईएम का प्रोफेसर मथुरा के मैनेजमेंट के कालेज में डिजिटल तरीके से अध्यापन क्यों नहीं कर सकता? अगर आप इसकी व्यवस्था कर दें, छूट दे दें तो लगभग सब विद्यालयों का स्तर एक जैसा हो सकता है। 

जो परीक्षा ली जा रही है,वह रटने की ली जा रही है कि बच्चे ने याद कितना कर लिया। समझा कितना, इसकी परीक्षा कौन लेगा? लिखित परीक्षा में कोई दूसरी संस्था परीक्षा ले रही है। यह नहीं हो सकता। इसलिए अध्यापक को ही जिम्मेवार माना जाना चाहिए कि तुम्हारे पढ़ाए सब्जेक्ट में बच्चे की समझ में सब्जेक्ट आया या नहीं। तुम परीक्षा लो और सर्टिफिकेट दो।

एक कंपनी जब अपना कोई प्रोडक्ट तैयार करती है तो गारंटी देती है कि हमारा ये प्रोडक्ट है, ये-ये काम आता है और इतने समय की गारंटी है। इसी प्रकार अध्यापक व शिक्षण संस्था को इसके लिए जिम्मेवार बनाया जाना चाहिए। फिर समाज उसकी असली परीक्षा लेगा, जो उस प्रोडेक्ट (छात्र) को इस्तेमाल करेगा। जो उस पढ़े विद्यार्थी को अपने यहां जाॅब देगा। तब उसकी योग्यता पर जोर आएगा। 

सर्टिफिकेट पीछे रह जाना चाहिए, योग्यता को ऊपर जाना चाहिए। सर्टिफिकेट तो सिर्फ इंडीकेटर होना चाहिए कि यहां से इतना पढ़ा है। इसके बाद तो वह योग्यता से अपने को साबित करेगा।

हमने अपनी सारी प्रणाली में, रोजगार की व्यवस्था व शिक्षा व्यवस्था- दोनों में, योग्यता को पीछे कर दिया है। सर्टिफिकेट ऊपर हो गये हैं, अंक ऊपर हो गये हैं। इसका परिणाम यह है कि मारामारी मची है। बच्चे हाईस्कूल, इंटर में कम अंक पा रहे हैं तो सोसाइट कर रहे हैं। योग्यता बढ़ाने पर जोर दीजिए। और इसमें एक-आध साल उसे और लगाना पड़ जाय तो इसमें हीनता नहीं मानी जानी चाहिए कि बच्चे ने इस उम्र तक 12वीं नहीं किया तो बड़ा भारी अनर्थ हो गया। उसे और दो साल का अवसर दीजिए ताकि वह अपनी योग्यता ठीक कर ले। कोई बच्चा जल्दी कर लेता है, कोई देर से कर पाता है। 

हमने कुछ चुनिंदा विषयों को ही शिक्षित होना मान लिया है। कुछ और भी वाइट उसे दे दीजिए। यह विस्तार है जीवन का। उसमें और सारे सब्जेक्ट्स डालने चाहिए। सारी साइक्लोजी बोलती है कि दुनिया में दो तरह के लोग हैं- एक्सटोवर्ट और टैक्सटोवर्ट। बहिर्मुखी और अंतर्मुखी। अंतर्मुखी पढ़ने, लिखने व इस तरह के विषयों में अधिक ध्यान देगा। 

किन्तु जो एक्सटोवर्ट है, बहिर्मुखी है उसको क्रियात्मक शिक्षा दी जानी चाहिए। वह कुछ करने पर जोर देता है। इस तरह की ट्रेनिंग दीजिए कि वह भी समाज के लिए योग्य बन सके। जो फिजिक्स, कैमिस्ट्री, मैथ्स नहीं पढ़ सका। आपने पांच-सात प्रोफेशन निश्चित कर दिये हैं समाज में सम्माननीय। बाकी परिश्रम से जुडे़ कार्यो को आपने हीन बना दिया है। समाज की इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है। और यह शिक्षा-व्यवस्था से ही संभव है। 

प्रश्न- पारंपरिक शिक्षा पद्धति और आधुनिक शिक्षा पद्धति- दोनों में क्या फर्क पाते हैं? 
देखिए, समानता एक बड़ा जीवन-मूल्य है। व्यक्ति ये महसूस न करे कि मुझे जन्म के आधार पर या मेरी परिस्थितियों के कारण जीवन की दौड़ में पीछे रह जाना पड़ा। इसीलिए तो हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति इस बात पर जोर देती है कि चाहे राजा का बेटा हो, शासक का बेटा हो, राज्य के उच्चाधिकारी का बेटा हो, धनवान का बेटा हो, सफाई कर्मचारी या मजदूर का बेटा हो- सबको समान शिक्षा होनी चाहिए। और एक जैसे वातावरण में होनी चाहिए। 

चाहे कृष्ण हों, चाहे सुदामा- महर्षि संदीपनि के आश्रम में जिस तरह एक वातावरण में पढ़ने गये- ऐसा आज भी होना चाहिए। इसके बाद जो आगे उनके जीवन का विकास है, उसकी दौड़ में वे जन्म के आधार पर नहीं, कर्म के, पुरूषार्थ के आधार पर आगे बढ़ें। इसलिए आवश्यक है कि उनके माता-पिता की छवि से उनको अलग कर दिया जाय। 

मान लीजिए किसी आदमी ने चोरी की ओर उसे 10 साल की सजा हुई, मर्डर किया और 20 साल की सजा हुई। और उसका बेटा उसी माता-पिता के पास रहकर स्कूल में पढ़ रहा है। वह इस धब्बे से कभी मुक्ति नहीं पा सकेगा कि उसका बाप चोर था या मर्डरर था। इसके विपरीत एक अच्छी छवि के पिता- कि वह धनवान है, पैसेवाला है, समाज में उसका रसूख है- उसका बच्चा अपने पिता की इस छवि के साथ अपना जीवन आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा। 

इसलिए पिता की छवि से मुक्त करके 8 से 12 वर्ष की आयु में उसे माता-पिता से हटाकर आवासीय व्यवस्था में गुरूओं के शिक्षण में रखा जाय। और गुरू वे होंगे जिनके बेटे-बेटियों के भी बेटे-बेटियां हो गये हों। वे रिटायर्ड हों। वे अपने पूरे जीवन के प्रेम को बच्चों में उड़ेलते हुए, प्रेमपूर्वक अनुशासन रखते हुए उनकी शिक्षा-दीक्षा करें। इससे शिक्षा सस्ती भी होगी और समान भी होगी। इसके बाद जो जिस योग्य हो जाय, उसे जीवन में आगे बढ़ने के वैसे अवसर दिये जायं। 

प्रश्न- वर्तमान में समाज में क्या बदलाव महसूस कर रहे हैं? 
उत्तर- नैतिक दृष्टि से और आध्यात्मिक दृष्टि से तो समाज लगातार नीचे गिर रहा है। और हमारा व हमारे नेताओं का सारा ध्यान भौतिक विकास के ऊपर है। अब विदेशी विचारक भी कहने लगे हैं कि आपको ‘सुख’ और ‘विकास’ की परिभाषा बदलनी होगी। 

अगर आप बड़ी-बड़ी सड़कें, बड़े-बड़े माॅल, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां- इसको ही विकास मानते हैं और मनुष्य का मानसिक विकास या उसका नैतिक विकास पीछे रह जाता है। तो वह साधनों के बीच भी दुखी रहेगा। इसलिए आज जो साधन सम्पन्न हैं, वह भी दुखी हैं। उसकी दौड़ और अधिक दूसरों से आगे निकल जाने में है। 

हमने मनुष्य को जो एक ‘रैट रेस’ में फंसा दिया है, चूहा दौड़ में फंसा दिया है- उसका परिणाम आखिर में ‘चूहा’ बनना ही है। ‘रैट रेस’ में जीत जाने के बाद भी आप चूहा ही रहेंगे। इस बात पर ध्यान देना चाहिए। 

प्रश्न- समाज में आज भौतिकवादी दृष्टिकोण बहुत ज्यादा बढ़ रहा है। छोटी-छोटी बच्चियों से दुष्कर्म जैसे मामले सामने आ रहे हैं। इसमें आप शिक्षानीति को कितना दोषी मानते हैं? 
उत्तर- शिक्षानीति अपने आप में इस मामले में दोषी नहीं है। क्योंकि मन पर जो विचार जा रहे हैं, वे स्कूल से नहीं जा रहे। स्कूल में तो बच्चा आता है और जो वहां के सब्जेक्ट्स पढ़ लेता है। लेकिन जो उसके मन को प्रभावित कर रही हैं- उन चीजों पर ध्यान दिये जाने की जरूरत है। 

अब तो पूरा इंटरनेट बच्चे के सामने खुला हुआ है। हर बच्चे के हाथ में माता-पिता ने स्मार्टफोन दे दिया है। और इस बात पर कोई रोक-टोक नहीं है कि वह वहां पर क्या देख रहा है। इंटरनेट एक समुद्र है। इसमें मोती भी हैं, और शार्क व आक्टोपस जैसे खतरनाक प्राणी भी। बच्चों को यह सिखाया जाना जरूरी है कि आप शार्क और आक्टोपस के चंगुल में न फंस जायं। वहां जो पोर्न और अश्लील- इस तरह की बातें दिखाई जा रही हैं, उनसे बच्चों का मन प्रभावित हो रहा है। और आप इससे बचा नहीं सकते हैं- चाहे आप कितना भी कोशिश कर लीजिए। 

ये जो अनैतिकता बढ़ रही है और जो छोटे-छोटे बच्चों के साथ दुष्कर्म और इस तरह के अनाचार की घटनाएं सामने आ रही हैं- उनका कारण मन की विकृति ही तो है। और मन को अच्छा बनाने के लिए पूरे समाज को मिलकर प्रयास करना पड़ता है। 

माता-पिता को भी, लिटरेचर को भी, साहित्य-कविता-कहानी-उपन्यास- फिल्म-टीबी सीरियल और इंटरनेट पर जो सामग्री परोसी जा रही है- उस सबकों इस बात का ध्यान रखकर चलना होगा कि हमारी नयी पीढ़ी का मन, उसकी भावनाएं दूषित न हो जाएं। 

प्रश्न- वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा नयी शिक्षानीति पर ध्यान दिया जा रहा है। आपके हिसाब से इस देश के लिए कैसी शिक्षानीति होनी चाहिए?
उत्तर- पहली बात तो यह है कि शिक्षा समान होनी चाहिए। क्योंकि जीवन की दौड़ जहां से शुरू होती है, वहां पर एक जैसे अध्यापक, एक जैसा वातावरण, एक जैसा सिलेवस (पाठ्यक्रम), एक जैसा खानपान होना जरूरी है। फिर उसके बाद अपनी योग्यता से जो जिना आगे निकल जाय। अगर आप शिक्षा में असमानता रखेंगे- कोई तो बहुत अच्छी शिक्षा पा रहा है, और कहीं पर बैठने के लिए टाट तक नहीं हैं, और अध्यापक अयोग्य हैं- तो इस तरह आप पूरे समाज को कैसे साथ ले जा सकते हैं? 

इसलिए सबसे जरूरी यह है कि आप इस वक्त शिक्षा के स्तर पर समानता पर ध्यान दें। व्यवहार में समानता नहीं हो सकती। जो जितना योग्य है, जितनी मेहनत कर रहा है- उसे उतना पुरस्कार समाज से मिलेगा। लेकिन कम-से-कम शिक्षा के स्तर पर- जहां से जीवन की शुरूआत हो रही है, जीवन-निर्माण शुरू हो रहा है- वहां पर तो आप समान स्तर पर गरीब व अमीर के बच्चों को एक स्तर पर रख दें। 

प्रश्न- आधुनिक शिक्षा पद्धति व प्राचीन शिक्षा पद्धति में किसे श्रेष्ठ मानते हैं? 
संस्कृत के एक नीतिवान ने कहा है कि वे लोग मूर्ख हैं जो यह कहते हैं कि जो पुराना है, वही सबसे अच्छा है। और जो आधुनिक है- नया है, वह सब खराब है। पर वही नीतिकार यह भी कहते हैं कि वे लोग महामूर्ख हैं जो यह कहते हैं कि पुराना सब बेकार है और जो नया है, वही सबसे अच्छा है। 

हमारा जोर तो समन्वय पर है। प्राचीनता और आधुनिकता में से जो भी अच्छा है, शुभ है, मंगलमय है, मनुष्यता के लिए हितकारी है- उसे सुन लीजिए। दोनों के समन्वय में क्या हर्ज है?

प्रश्न- परम्परागत ज्ञान-विज्ञान को पढ़ाया जाना और उस ज्ञान को जीवित रखना क्या आवश्यक है?
उत्तर- हमारा जो परम्परागत ज्ञान-विज्ञान है, उसमें बहुत कुछ ऐसा है जो मनुष्य के लिए हमेशा उपयोगी रहेगा। उस ज्ञान को पढ़ाया जाना, उस ज्ञान को जीवित रखना आवश्यक है। उसको पढ़ाया जाना चाहिए। और जो आधुनिक विधाएं हैं, उन्हें भी पढ़ाया जाना चाहिए।

प्रश्न- गुरूकुल शिक्षा पद्धति में परम्परागत ज्ञान और आधुनिक शिक्षा पद्धति को लेकर सवाल खड़े होते हैं, आपका क्या विचार है?
उत्तर- जहां तक गुरूकुल की शिक्षा-पद्धति का प्रश्न है- वहां परम्परागत ज्ञान और आधुनिक ज्ञान का प्रश्न खड़ा नहीं होता। गुरूकुल शिक्षा पद्धति का मतलब है आवासीय व्यवस्था। 

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