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किसान सियासत: तो क्या कैप्टन सरकार की इस रणनीति की वजह से खट्टर सरकार की बढ़ी मुश्किलें, जानिए पूरा मामला?

संजीवनी टुडे 26-11-2020 18:00:30

केंद्र सरकार के कृषि सुधार कानूनों को लेकर किसान आंदोलन ने अब जोर पकड़ लिया है।


नई दिल्ली। केंद्र सरकार के कृषि सुधार कानूनों को लेकर किसान आंदोलन ने अब जोर पकड़ लिया है। वही इस आंदोलन को लेकर पंजाब में कांग्रेस सरकार की अपनाई रणनीति अब हरियाणा औक दिल्ली पर भारी पड़ रही है। किसान आंदोलन के चलते हरियाणा में हालात बिगड़ते जा रहे हैं। 

हालांकि, इन सबके बीच पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार पूरे बवाल से खुद को बचाने में कामयाब रही और यह सब तय रणनीति के तहत हुआ। इस कारण हरियाणा की खट्टर सरकार को दिल्ली जा रहे किसानों के आंदोलन से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं।

दरअसल, जब केंद्र सरकार कृषि सुधार कानून लेकर आई थी तो बतौर विपक्षी दल कांग्रेस की पंजाब में चल रही सरकार ने इसका राजनीतिक विरोध शुरू कर दिया। उस वक्त जब पंजाब में किसानों को कृषि सुधार कानूनों के बारे में जानकारी दी जानी थी तो कैप्टन सरकार खुलकर इसके विरोध में आ गई। 

कैप्टन सरकार ने विधानसभा में भी इन कानूनों को रद्द करने का प्रस्ताव पास कर दिया, यह जानते हुए भी कि केंद्रीय कानून के समक्ष इसका कोई महत्व नहीं था। इसके बाद पंजाब में किसानों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए, लेकिन सरकार व राज्य के मुख्य विपक्षी दल शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी की तरफ से भी इसे समर्थन मिला तो संघर्ष चलता रहा।

किसान संगठनों की तरफ से जगह-जगह प्रदर्शन किए गए। पंजाब में चल रहे टोल प्लाजा पर भी किसानों ने डेरा जमा लिया और लुधियाना स्थित लाडोवाल टोल प्लाजा पर अभी तक टैक्स नहीं वसूलने दिया जा रहा है। इसके बाद किसानों ने रेल पटरी पर बैठकर प्रदर्शन शुरू कर दिया तो पंजाब की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ने लगा। तब बात मालगाड़ियों के न चलने से कोयले की आपूर्ति बाधित होने पर राज्य में चल रहे थर्मल प्लांट बंद होने तक की होने लगी और राज्य में इंडस्ट्री को भी इसका नुकसान होने लगा।

इसे देखकर किसानों के संघर्ष को लगभग पूरी मंजूरी दे चुकी पंजाब सरकार फिर हरकत में आई और मालगाड़ियां चलाने के लिए किसान संगठनों से बैठक की, जिसमें यह फैसला हुआ कि किसान संगठन मालगाड़ी आने देंगे, लेकिन पैसेंजर ट्रेनों को अभी नहीं आने दिया जाएगा।

पंजाब में माहौल न बिगड़े इसलिए दिल्ली की ओर रुख मोड़ दिया
लगातार चल रहे किसान आंदोलन की वजह से पंजाब में कहीं ज्यादा माहौल ना बिगड़े, इस वजह से किसान आंदोलन का रुख दिल्ली की तरफ मोड़ दिया गया। जाहिर तौर पर रास्ते में हरियाणा भी है और वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। इस वजह से पंजाब की कांग्रेस पार्टी व सरकार के लिए यह बेहतर रहा कि उन्हें ऐसे कदम नहीं पड़ेंगे, जिससे पंजाब में संघर्ष कर रहे किसान संगठनों को नाराज किया जाए और दूसरा दिल्ली जाने से रोके जाने पर किसानों की भाजपा के लिए नाराजगी भी बढ़ेगी।

इसे मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार की रणनीति ही समझा जा रहा है कि संघर्ष कर रहे तमाम किसानों को दिल्ली की तरफ कूच करवा दिया गया। ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है कि किसानों की घोषणा के बावजूद पंजाब में कहीं भी कैप्टन सरकार की तरफ से कोई सख्ती नहीं की गई।

दिल्ली कूच करने के लिए किसान गांव-गांव से इकट्ठा होते रहे और लंबे समय से जालंधर-पानीपत हाईवे स्थित लाडोवाल टोल प्लाजा और पंजाब-हरियाणा बॉर्डर पर स्थित शंभू बॉर्डर पर किसानों ने पक्के धरने लगा रखे हैं, लेकिन पंजाब की तरफ से इन्हें हटाने या किसी तरह की मान-मनौव्वल की कोई कोशिश तक नहीं की गई। ऐसा माना जा रहा है कि एक तरफ पंजाब की कांग्रेस सरकार ने किसानों के साथ किसी तरह की रोक-टोक ना कर उनके संघर्ष में पूरा साथ दिया तो दूसरी तरफ जब किसान आंदोलन की वजह से पंजाब की आर्थिक हालत पर असर पड़ने लगा तो इसे दूसरे राज्यों की तरफ मोड़ दिया गया।

कांग्रेस के रुख के बड़े राजनीतिक मायने
किसान आंदोलन को लेकर पंजाब की कांग्रेस सरकार के नरम रुख के बड़े राजनीतिक मायने समझे जा सकते हैं। अभी तक पंजाब के रूरल इलाकों में अकाली दल का ही वर्चस्व रहा है, जिसमें किसान ही उनका बड़ा वोट बैंक माना जाता है। हालांकि, श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की वजह से पिछले विधानसभा चुनाव में पंजाब के रूरल इलाके में अकाली दल के लिए बहुत नाराजगी रही। इसी का फायदा यहां से चुनाव लड़ी आम आदमी पार्टी को हुआ और आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अपनी बड़ी मौजूदगी दर्ज कराई।

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को शहरी इलाकों से ही ज्यादा वोट मिले थे, अब किसान आंदोलन के बहाने कांग्रेस पार्टी इस रूरल वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन्हीं कृषि सुधार कानूनों की वजह से अकाली दल की केंद्र सरकार में एकमात्र मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया था और फिर भाजपा से गठबंधन भी तोड़ लिया था।

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