संजीवनी टुडे

पत्नी के साथ संबंध बनाना दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं: सुप्रीम कोर्ट

संजीवनी टुडे 11-08-2017 15:57:31

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पत्नी के साथ संबंध बनाना दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता है। इसे दंडात्मक अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने बुधवार को कहा कि संसद भी इस मसले पर चर्चा के बाद सहमति दे चुकी है। अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 375 में दुष्कर्म को परिभाषित किया गया है। उसमें भी कहा गया है कि पत्नी से संबंध बनाना अपराध नहीं है बशर्ते वह 15 साल से कम उम्र की न हो। 15 से 18 साल की विवाहिता से जबरन संबंध बनाने पर किस तरह से रोक लगाई जा सकती है। यह भी पूछा कि क्या अदालत ऐसे मामलों में दखल दे सकती है।

पीठ ने कहा कि 15 साल से कम उम्र की लड़की का विवाह कानूनन गलत है। अदालत ने कहा कि ऐसे भी मामले हैं। जिनमें 18 साल से कम उम्र की लड़की अपनी सहमति से संबंध बनाती है। लेकिन जब मामला पुलिस के पास जाता है।  तो सजा केवल लड़के को मिलती है। इस तरह से मामलों में लड़के को भुगतना पड़ता है। उसके लिए सात साल की सजा बहुत ज्यादा है। समस्या तब खड़ी होती है। जब 18 साल से कम उम्र की लड़की घर से भाग जाती है और सहमति से संबंध बनाती है लेकिन उसके पुरुष साथी के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज हो जाता है। पिछले तीन साल में बाल विवाह एक्ट के तहत कितने लोगों को सजा हुई, इस पर पीठ ने केंद्र सरकार से तीन सप्ताह में जवाब मांगा है।

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अदालत ने केंद्र से यह भी पूछा कि बाल विवाद निषेध अधिकारी की नियुक्ति का पैमाना क्या होता है। सुनवाई चार सप्ताह बाद की जाएगी। अदालत ने यह फैसला उस याचिका की सुनवाई के दौरान दिया जिसमें एक व्यक्ति ने पूछा था। कि क्या वह अपनी पत्नी (15 से 18 साल के बीच आयु) के साथ संबंध बना सकता है। पीठ ने कहा कि 15 साल से कम उम्र की लड़की के साथ संबंध बनाना अपराध है, चाहे वह पत्नी क्यों न हो। कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा था क्या 15 साल से अधिक और 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ संबंध बनाए जाने को यौन उत्पीड़न करार दिया जाए। 

जबकि आईपीसी इसे दुष्कर्म नहीं मानता है। प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर के नेतृत्व वाली पीठ ने नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी के एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन के जरिए उजागर की गई विसंगति पर विचार किया। अदालत ने केंद्र से इस पर विचार करने व 4 महीने में अपना जवाब दाखिल करने को कहा था। पीठ ने महिला व बाल विकास मंत्रालय से एनजीओ की आपत्ति पर विचार करने, इसकी छानबीन करने और इस मुद्दे पर एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। केंद्र अपना जवाब दाखिल कर चुका है।

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