संजीवनी टुडे

प्रवासियों का दर्द : हमारे दर्द को महसूस करना सबके वश की बात नहीं

संजीवनी टुडे 13-07-2020 15:22:24

बेगूसराय में देश के विभिन्न शहरों से प्रवासी के आने का सिलसिला लगातार जारी है। रोज ट्रेन के अलावा बस, ट्रक समेत अन्य वाहनों से प्रवासी अपने घर की ओर लौट रहे हैं।



बेगूसराय। बेगूसराय में देश के विभिन्न शहरों से प्रवासी के आने का सिलसिला लगातार जारी है। रोज ट्रेन के अलावा बस, ट्रक समेत अन्य वाहनों से प्रवासी अपने घर की ओर लौट रहे हैं। सोमवार को भी गुवाहाटी-लोकमान्य तिलक टर्मिनल स्पेशल एक्सप्रेस से तीन सौ से अधिक प्रवासी बेगूसराय एवं बरौनी जंक्शन पर उतरे। परदेस में काम-धंधा बंद होने से तीन महीना तक जलालत झेलने के बाद आर्थिक-मानसिक रुप से टूट कर घर लौटने वाले प्रवासियों को काम की चिंता सताने लगी है। केन्द्र और बिहार सरकार द्वारा विभिन्न योजना शुरू कर प्रवासी कामगारों को काम उपलब्ध कराने की कवायद किया जा रहा है। लेकिन इन सारी कवायदों के बीच प्रवासियों के नाम पर राजनीति भी शुरू हो गई है। बड़ी संख्या में प्रवासियों के घर लौटने पर गरीबों- कामगारों के आर्थिक दशा में सुधार के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार अभियान किया गया है। 

इसकी जानकारी मिलते ही श्रमिकों में एक नई आशा जगी है, श्रमिकों के मन में गांव मेंं काम कर रोजी रोजगार मिलने का उत्साह है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव के कारण तमाम राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता इन श्रमिकों को अपने-अपने पक्ष में करने में लग गए हैं, जिससे लोगों में आक्रोश भी देखा जा रहा है। असम एवं दिल्ली से लौटकर सोमवार को सदर अस्पताल में कोरोना जांच के लिए सैंपल देने आए प्रवासियों ने बताया कि लॉकडाउन के कारण काम-धंधा बंद हो गया था तो किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं ने हमारा दर्द नहीं समझा। लेकिन अब सबको हमारी चिंता सताने लगी है। अपना काम धंधा गवां कर घर आ रहे हम लाखों-लाख प्रवासी जिसकी चाहे सरकार बना सकते हैं। सभी राजनीतिक दल प्रवासी के नाम पर अपनी राजनीतिक गोटी चमकाने में लगे हुए हैं। 

हम प्रवासियों को हर स्तर पर परेशानी उठानी पड़ी, हमारे दर्द को महसूस करना सबके वश की बात नहीं है। नेताओं को शर्म आनी चाहिए कि स्थानीय स्तर पर रोजगार की कोई स्थाई व्यवस्था नहीं किया गया है। कोरोना जांच के लिए आए सुरेश राम, घनटोल राम, रंजीत कुमार आदि ने बताया कि मजबूरी में बिहार के लाखों-लाख श्रमिक अपने राज्य में रोजी-रोटी का जुगाड़ नहीं हो पाने के कारण परदेस में अपना श्रम सस्ते में बेच रहे थे, ताकि परिवार का भरण-पोषण हो सके। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा एक दिन आएगा, जब परदेस में आर्थिक रूप से मजबूत होने गए हम लोग वहां से कंगाल होकर घर लौट आएंगे। लॉकडाउन के कारण काम धंधा बंद हो गया, सरकार ने खाने का उपाय नहीं किया तो कुछ बचत कर रखी गई सारी पूंजी राशन में ही खर्च हो गया। घर से पैसा मंगवा कर गांव वापस आए हैं। ऐसी हालत में अब क्या करें, क्या नहीं करें वाली स्थिति है। 

फिलहाल कोरोना का जांच करवा रहे हैं, 20-25 दिन घर पर रह कर काम मिलने का इंतजार करेंगे। सुनने में आया है कि प्रधानमंत्री ने गरीबों के कल्याण के लिए विशेष अभियान गरीब कल्याण रोजगार योजना शुरू किया है। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) समेत कई अन्य योजना का काम तेज किया गया है। इन लोगों ने बताया कि उन्हें जानकारी मिली है कि गरीब कल्याण रोजगार अभियान हम लोगों के लिए एक नई जिंदगी लेकर आया है। हम लोग को भी इसमें काम मिल गया तो ठीक, नहीं मिला तो मजबूरी में फिर परदेस जाना ही पड़ेगा। लेकिन असम, मुंबई, दिल्ली और कोलकाता नहीं जाएंगे, चाहे देश के अन्य कोने में क्यों नहीं जाना पड़ जाएगा। चाहे जो भी हो, सरकार ने भी निर्णय लेने में देरी किया है तथा अब अगर त्वरित गति से रोजी-रोजगार की समस्या का हल नहीं हुआ तो गुस्सा फूटेगा।   

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