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भागलपुर में 2 करोड़ 68 लाख की लागत से निर्मित विद्युत शवदाह गृह जनता को समर्पित

संजीवनी टुडे 16-07-2020 19:58:27

भागलपुर में 2 करोड़ 68 लाख की लागत से निर्मित विद्युत शवदाह गृह जनता को समर्पित


भागलपुर। भागलपुर जिले के बरारी श्मशान घाट स्थित विद्युत शवदाह गृह के कटाव की भेंट चढ़ जाने के लम्बे अर्से बाद निर्मित विद्युत शवदाह गृह का उद्घाटन गुरुवार को मेयर सीमा साहा और डिप्टी मेयर राजेश वर्मा ने संयुक्त रूप से किया। इस मौके पर डिप्टी मेयर राजेश वर्मा ने कहा कि इस कोरोना संकट के दौर में शवदाह गृह काफी लाभकारी साबित होगा। उन्होंने कहा कि शवदाह गृह के शुरू होने के बाद सभी वर्ग खासकर मध्यम एवं निम्न वर्ग जिन्हें अंतिम संस्कार के लिए स्थानीय लोगों के मनमाने रवैये और आर्थिक शोषण का शिकार होना पड़ता था, अब उन्हें इससे निजात मिलेगी और उनका आर्थिक बोझ भी कम होगा। बता दें कि बरारी श्मशान घाट के किनारे 2 करोड़ 68 लाख की लागत से विद्युत शवदाह गृह का निर्माण नगर निगम के द्वारा कराया गया है। इस आधुनिक विद्युत शवदाह गृह में आधुनिक मशीनें लगायी गयी हैं। 

शवदाह गृह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शवदाह गृह से निकले अवशेष को गंगा में नहीं गिराया जायेगा, बल्कि उसे मशीन से ही नष्ट कर दिया जायेगा। शवदाह गृह बनने से गरमी, बारिश और ठंड में शव जलाने वाले लोगों को होने वाली परेशानी से राहत मिलेगी। शवदाह गृह के नहीं होने से चिता को जलाने में लकड़ी का बेतहाशा इस्तेमाल और इसके धुएं व राख से प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ गया था। सबसे बड़ी बात यह है कि सुल्तानगंज से कहलगांव तक फैले विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभ्यारण्य में विलुप्तप्राय जलीय जीव डॉल्फिन का निवास स्थल है। केन्द्र सरकार ने इसे विलुप्तप्राय राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित कर रखा है। शवदाह गृह के नहीं होने से चिता जलाने के बाद बचे अवशेषों को लोगों के द्वारा गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता था, जिससे गंगा का प्रदूषण स्तर काफी बढ़ गया था जो डॉल्फिन के लिए भी घातक साबित हो रहा था। 

बरारी श्मशान घाट पर प्रति दिन बिहार-झारखंड जिलों के एक दर्जन शव का रोज अंतिम संस्कार किया जाता है। घाट किनारे लकड़ी विक्रेता की मानें तो एक शव को जलाने में तीन से चार क्विंटल तक लकड़ी खपत होती हैं जिसकी कीमत 3000 हजार रुपये तक होती है। औसतन एक दर्जन शवों को जलाने में रोज छह टन तक लकड़ी की खपत होती है। इससे गंगा में राख सहित अन्य अवशिष्ट पदार्थ के समाहित होने से जल कितना प्रदूषित होता होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। शव जलाने का खर्च भी आधे से कम हो जाएगा। पैसे और समय की भी बचत होगी। पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा। विद्युत शवदाह गृह स्क्रबर तकनीक से लैस होता है जो शव जलने के दौरान निकलने वाली खतरनाक गैस और बॉडी के जले अवशेषों को सोख लेता है। शव की राख  पानी के टैंक में जमा होगी  जिसे खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। आधुनिक फर्निश संयंत्र लगा है। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक शव  जलाने के बाद गंगा में राख, जलती लकड़ी सहित अन्य चीजों को प्रवाहित कर दिया जाता है जिससे पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। 

इससे जलीय जीवों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इतना ही नहीं एक स्वस्थ पेड़ हर दिन लगभग 230 लीटर ऑक्सीजन छोड़ता है, जिससे सात लोगों को प्राण वायु मिलता है। यदि हम इसके आसपास कचरा जलाते हैं तो इसकी ऑक्सीजन उत्सर्जित करने की क्षमता आधी हो जाती है। इस तरह हम तीन लोगों से उनकी जिंदगी छीन लेते हैं। आज पेड़ों की कटाई पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। इसलिए पौधे लगाने के साथ-साथ हमें पेड़ों को बचाने की भी जरूरत है।

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