संजीवनी टुडे

'दिव्यात्मा बाब' का 175 वाँ उद्घोषणा दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया गया

संजीवनी टुडे 25-05-2019 20:59:25


जयपुर। स्थानीय आध्यात्मिक सभा जयपुर की ओर से 'दिव्यात्मा बाब' का 175 वां उद्घोषणा दिवस गुरूवार सांय बापू नगर स्थित बहाई हाउस में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया 'दिव्यात्मा बाब' जो कि बहाई धर्म के अग्रदूत माने जाते हैं व 'बाब' का शाब्दिक अर्थ 'द्वार' से होता है ! अर्थात एक नए उस धर्म का आगमन एक नए चिर प्रतिक्षित अवतार के आगमन से होगा जिसकी घोषणा स्वयं 'बाब' ने की और वह व्यक्ति थे युगावतार 'बहाउल्लाह ' ! 

 इस अवसर पर जयपुर शहर के बहाई धर्मावलंबी के अलावा स्थानीय मित्रों ने भी कार्यक्रम मे बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया स्थानीय आध्यात्मिक सभा,जयपुर  की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये गये, कार्यक्रम की शुरुआत विभिन्न भाषाओं में प्रार्थनाओं से हुई व कार्यक्रम की मुख्य वक्ता अलीशा कुमावत ने बताया की आज से ठीक 175 साल पहले सन् 1844 के वसंत काल की एक शाम को, दो युवाओं के बीच एक सम्वाद हुआ जिसने मानवजाति के लिये एक नये युग की घोषणा की। एक फारसी व्यापारी ने शिराज नगर में आये एक यात्री के समक्ष यह घोषणा की कि ‘वह’ एक ‘दिव्य प्रकटीकरण’ के ‘संवाहक’ हैं, जो मानवजाति के आध्यात्मिक जीवन को बदल देने के लिये नियत हैं। उस व्यापारी का नाम ' सैय्यद अली मुहम्मद ' था और इतिहास में ‘जिन्हें’ ‘बाब’ के रूप में जाना जाता है |

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'दिव्यात्मा बाब ' ने शिराज नामक शहर मे उसी नौजवान युवा (मुल्ला हुसैन)  के समक्ष अपने अवतार होने की घोषणा की | वही नियाज आलम अनंत ने 'दिव्यात्मा बाब' की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह हमारे लिए बहुत ही हर्ष का विषय है जहां हम आज युगावतार 'दिव्यात्मा बाब' का उद्घोषणा दिवस मना रहे हैं 'दिव्यात्मा बाब' वह नौजवान युवा थे जिनको मात्र 31 वर्ष की उम्र में ही शहीद कर दिया गया था अर्थात अपनी उद्घोषणा के पश्चात मात्र 6 वर्ष तक वह जीवित रहे और इस 6 वर्ष के कार्यकाल में लाखों की संख्या में उनके अनुयायी बने | 

 कार्यक्रम की इसी कड़ी में नीमा व स्नेहा द्वारा एक गीत प्रस्तुत किया गया व हनुमान के द्वारा एक नाटक का मंचन किया गया जिसका उदेश्य था 'हमारे द्वारा किए गए कार्यों का बच्चों पर प्रभाव' अंत मे स्थानीय आध्यात्मिक सभा के अध्यक्ष डा० नेजात हगीगत ने आगन्तुक मेहमानों का आभार प्रकट किया व  कार्यक्रम का समापन रात्रिभोज के साथ सम्पन्न हुआ |

'दिव्यात्मा बाब' की उद्घोषणा का इतिहास:-

दुनिया के इतिहास में 19वीं शताब्दी का मध्यकाल सर्वाधिक अशांति और अस्तव्यस्तता का काल था। युरोप और उत्तरी अमेरिका के अधिकांश भागों में बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ छिड़ चुकी थीं, पुराने पड़ चुके सामाजिक ढाँचे और सम्बन्धों को कृषि, उद्योग और आर्थिक क्षेत्रों में आये अचानक और अभूतपूर्व परिवर्तनों के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। उसी समय, पूरी दुनिया में अलग-अलग धर्मों को मानने वालों ने यह महसूस करना शुरू कर दिया था कि मानवजाति अपने विकास के एक नये चरण की दहलीज पर है और अनेक लोगों ने निकट भविष्य में ही प्रतिज्ञापित अवतार के आगमन के लिए अपने को तैयार करना शुरू कर दिया था और प्रार्थनाओं में तल्लीन हो चुके थे ताकि जब वह आये तो वे उन्हें पहचान सकें।

मुल्ला हुसैन नाम के एक युवा विद्वान एक ऐसे व्यक्ति थे जो जीवन को बदल कर रख देने वाली खोज में लगे थे। वह जैसे एक चुम्बकीय आकर्षण से शिराज की ओर खिंचते चले आये - शिराज उस समय गुलाब के इत्र और बुलबुल के सुमधुर स्वर के लिये मशहूर था। 22 मई 1844 की संध्या को, जब वह नगर के द्वार तक पहुँचे तब उनका अभिवादन एक कांतिमान युवा द्वारा किया गया जो हरे रंग की पगड़ी बांधे था। इस अजनबी ने मुल्ला हुसैन का अभिवादन कुछ इस प्रकार किया जैसे वे आजीवन मित्र रहे हों।

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“वह युवा जो मुझसे शिराज के द्वार के बाहर मिला, मुझे अपनी प्रेमपूर्ण दयालुता और स्नेह से अभिभूत कर गया।” मुल्ला हुसैन याद करते हैं, “उन्होंने बड़े प्रेम से अपने निवास स्थान पर मुझे आमंत्रित किया और वहाँ यात्रा की थकान मिटा कर मैं तरोताज़ा हुआ।

शिराज में बाब का निवास, जो अब नष्ट हो चुका है, जहाँ उन्होंने अपने मिशन की घोषणा 23 मई 1844 को की।

दोनों व्यक्ति पूरी रात बातचीत में डूबे रहे। मुल्ला हुसैन यह पा कर आश्चर्यचकित थे कि जो विशेषतायें वह प्रतिज्ञापित अवतार में तलाशने निकले थे, वे सब उस युवक में पाई गईं थीं। दूसरे दिन तड़के सुबह विदा लेने के पहले उनका अतिथि-सत्कार करने वाले ने इन शब्दों में उन्हें सम्बोधित किया, “तुम वह पहले व्यक्ति हो जिसने ‘मुझमें’ विश्वास किया है, मैं सत्य कहता हूँ, मैं ‘बाब’ हूँ - ‘ईश्वर का द्वार’ ! अठारह व्यक्ति मुझे अवश्य ही प्रारम्भ में सहज एवं स्वेच्छा से स्वीकारेंगे और मेरे प्रकटीकरण के सत्य को पहचानेंगे।”

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बाब की घोषणा के कुछ सप्ताहों के अंदर ही सहज अपने प्रयासों से सत्रह और लोगों ने ‘उनके’ स्थान और पद को स्वीकार किया, अपनी पुरानी जीवन-शैली के सुख-चैन को त्याग दिया और - सभी आसक्तियों और मोह-माया का त्याग कर - ‘उनकी’ शिक्षाओं के प्रसार के लिये निकल पड़े। बाब के ये पहले अठारह अनुयायी सामूहिक रूप से ’जीविताक्षर’ के रूप में जाने गये।

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