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ताहिरा की शौर्य-कथा, अध्याय 7 (भाग-2), 'मृत्यु के अंतिम क्षण तक वफादार'

संजीवनी टुडे 22-10-2019 01:04:00

जिस नाम से अपने लोगों के हृदय में सदा रहेगी वह है-पवित्र ताहिरा।


डेस्क। ताहिरा बाब के धर्म के प्रति अपनी स्वीकृति के प्रथम क्षण से , अपनी मृत्यु के अंतिम क्षण तक वफादार थी। क्षण मात्र के लिये भी वह दृढ विश्वास से पीछे नहीं हटीं जो उन्होंने शीराज में प्रारंभिक काल में उनको भेजे गये अपने संदेश में व्यक्त किया था और फिर ये शब्द कहे थे, "क्या मैं तुम्हारा स्वामी नहीं हूँ? और तब हम उत्तर देंगे तुम्ही हो।

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निष्क्रिय भक्ति का युग समाप्त हो गया "शब्दों को नहीं कर्मों को अपना आभूषण बनने दो” ताहिरा ने उन शब्दों को जिया और उनके ही लिये अपना जीवन भी बलिदान कर दिया जो उन्होंने तेहरान में अपने निवास के समय एक शाम बाब के अन्य महान शिष्य को बहुत पहले ही कहा था। 

हुआ यह कि वह सब कुछ अन्य अनुयायियों के साथ स्वयं वाहिद द्वारा बाब के धर्म पर के विषय पर प्रखर और वाग्मितापूर्ण वक्तव्य को सुन रहीं थीं। वह बाब के आगमन से संबंधित चिह्न और भविष्यवाणियों के विषय में बता रहे थे। 

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ताहिरा कुछ समय तक धैर्यपूर्वक सुनती रहीं, फिर अचानक ही जोर से बोलते हुये कहा, यदि आप सच्चे विद्वान हैं तो अपने शब्दों से नहीं बल्कि अपने कर्मों से अपनी आस्था को प्रमाणित होने दीजिये। 

अकर्मण्यतापूर्वक अतीत की परम्पराओं को दोहराना बंद कीजिये क्योंकि सेवा और दृढ़ निश्चय से भरे कर्मों का समय आ गया है। अब समय है 'ईश्वर के शब्द' का प्रसार करने और उसकी राह में स्वयं के जीवन का बलिदान करने का।' "शब्दों को नहीं कर्मो को अपना आभूषण बनने दो।" 

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ताहिरा ने फारस के बड़े शहर के एक बगीचे में दी गई अपनी शहादत से इन शब्दों को सिद्ध भी किया। वैसा ही अपरिहार्य प्रतिशोध जिसने शीराज में, इस्फहान में, तबरीज और तबरसी में प्रभुधर्म के शत्रुओं कोधराशायी किया था।

ताहिरा को यंत्रणा देने वालों के प्रति एक बार फिर से महसूस किया गया। शाह को पता था कि वह निर्दोष थी और वह शायद उनको बचा लेता। आगे आने वाले दिनों में सर्वाधिक दण्ड मिलने वाला था। 

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ताहिरा के चाचा एक हत्यारे के हाथों मारे गये मेयर मुहम्मद खान जिसने उनको करीब तीन वर्षों तक नज़रबंद करके रखा था और जिसने उनको मारने में प्रधानमंत्री की सहायता की थी उसको वैसी ही मौत मिली जैसी मौत की तैयारी उसने ताहिरा के लिये की थी। 

शाह ने उसको जान से मारने का आदेश दिया था। उसने जल्लाद को कुछ रस्सी बनाने के लिये कहा और आदेश दिया कि इन रस्सियों को उसके गले के चारों ओर बाँध कर तब तक घुमाया जाये जब तक उसका दम नहीं घुट जाता। 

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शाह ने एक चेतावनी के रूप में मेयर के मृत शरीर को फाँसी के फंदे में लटका हुआ छोड़ देने का आदेश दिया। ताहिरा अपने सौदर्य और शक्ति के शिखर पर थीं, जब 1852 के अगस्त में उनको शहीद किया गया था। 

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वह मात्र छत्तीस वर्ष की थीं। सैय्यद काज़िम ने उनको कुर्रतुल ऐन कहकर पुकारा। अन्य ने उसको जरीन-ताज , ईश्वर के स्वर्ण के मुकुट वाली कहा, लेकिन वह जिस नाम से अपने लोगों के हृदय में सदा रहेगी वह है–पवित्र ताहिरा।

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