संजीवनी टुडे

प्रार्थना और चिन्तन अलग अलग युग में और आज का स्वरूप, बहाई धर्म के अनुरूप: भाग-2

संजीवनी टुडे 20-11-2019 08:01:00

बहुत से लोग केवल अनुग्रहों की प्राप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। अक्सर वे सजा के भय से भी प्रार्थना करते हैं। बहाउल्लाह यह शिक्षा देते हैं कि हमें उस प्रेमी की भांति प्रार्थना करना चाहिए जो अपने प्रियतम के साथ वार्तालाप करने के लिए लालायित होता है।


बहुत से लोग केवल अनुग्रहों की प्राप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। अक्सर वे सजा के भय से भी प्रार्थना करते हैं। बहाउल्लाह यह शिक्षा देते हैं कि हमें उस प्रेमी की भांति प्रार्थना करना चाहिए जो अपने प्रियतम के साथ वार्तालाप करने के लिए लालायित होता है। मनुष्य की आत्मा ईश्वर की ओर इस तरह आकर्षित हो सकती है कि उसकी प्रार्थना एक कर्तव्य मात्र से बढ़कर आनन्द का कारण बन जाती है। 

बहाउल्लाह द्वारा दी गई शिक्षा के अनुरूप प्रार्थना करने हेतु हमारे लिए यह समझना आवश्यक है कि ईश्वर हमसे प्रेम करता है और हमारे प्रेम का प्रत्युत्तर देना चाहता है । यदि हम देवता की कल्पना एक अभियाची और शक्तिशाली महामानव के रूप में करें जिसे हमारे सुख की चिन्ता नहीं होती, और जो भौतिक भेंट लेने की हमसे अपेक्षा करता है ताकि वह हमारी इच्छाओं की पूर्ति करे और दुर्भाग्य से हमें सुरक्षित रखे, तो उसे प्रेम कर पाना कठिन होगा। इस प्रकार हमारी प्रार्थना व्यापारिक समझौते का रूप लेती है। कुछ लोग तो ईश्वर के साथ सौदा भी करते हैं। वे कहते हैं कि यदि मेरे पुत्र को ठीक कर दो, या मुझे और अच्छी नौकरी दे दो, या कालेज पास होने में मेरी सहायता कर दो, तो मैं अपने सिर के बाल मुंडवा दूंगा, मन्दिर में दस रूपये दान दूंगा, या एक सप्ताह तक प्रतिदिन पूजा करूंगा। 

सृष्टि के लिए ईश्वर का प्यार सूर्य के प्रकाश के समान है जो प्रत्येक वस्तु पर चमकता हुआ जीवन तथा प्रगति का कारण बनता है। यदि हम स्वयं को ऐसे कमरे में बन्द कर ले जिसमें कोई खिड़की न हो, तो वह प्रकाश हम तक नहीं पहुंच सकता है।

भौतिक लाभ और शारीरिक सुख के पीछे हमारी निरन्तर इच्छाएं हमारे चारों ओर ऐसी दीवार खड़ी कर देती हैं जो प्रभु-प्रेम को हम तक पहुंचने नहीं देती और जिससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति बाधित हो जाती है।
प्रार्थना के समय हमें अपना मन सांसारिक इच्छाओं से विमुख करने का विशेष प्रयास करना चाहिए और उसी की याचना करनी चाहिए जिसे प्रभु ने अपने प्रेम और विवेक से हमारे लिये उचित ठहराया है। इस आश्वासन द्वारा भी कि ईश्वर हमसे प्रेम करता है, उसके प्रति विश्वास उत्पन्न होता है।
कठिनाइयों में ईश्वर की ओर मुड़ना हमारे लिए स्वाभाविक है, पर यह सहज भाव और हृदय से होना चाहिए, जैसे पीड़ा के समय बच्चा अपनी मां के निकट होने की तीव्र इच्छा करता है। जब हम ईश्वर से प्यार करना और उसमें आस्था रखना सीख जायेंगे तब यही चाहेंगे कि सुख और दुख में हर समय उससे तादात्म्य स्थापित रखे। उसके प्रति हम- अपना हृदय इस प्रकार खोल देगे जैसे अपने निकटतम व प्रियतम मित्र के सामने खोलते हैं। प्रार्थना करते समय, हम अपनी आशाओं और आशंकाओं, अपनी न्यूनताओं और कमजोरियों को स्वीकार करेंगे, तथा ईश्वर से याचना करेंगे कि हम आध्यात्मिक गुणों का विकास कर सकें और अपने जीवन द्वारा उसकी सेवा करने योग्य बनें।
बहाउल्लाह ने अपने अनुयायियों को प्रतिदिन प्रार्थना करने की आज्ञा दी है। प्रार्थना किस प्रकार से की जाये, यह बताने लिए उन्होंने हर अवसर के लिए प्रार्थनाओं की रचना की है। इनके अतिरिक्त, तीन ऐसी प्रार्थनाएं हैं जिनमें से कोई एक प्रार्थना बहाउल्लाह का हर अनुयायी, अर्थात बहाई अपने दैनिक उपयोग के लिए चुनता है। बहाउल्लाह ने प्रार्थना को पन्द्रह वर्ष से अधिक हर स्त्री और पुरुष के लिए अनिवार्य बनाया है। बच्चों को भी कम आयु से ही प्रार्थना करना सिखाया जाना चाहिए, यहां तक कि पालने में नव जात शिशुओं को भी प्रार्थनाओं का गान करके सुनाया जाना चाहिए क्योंकि इससे उनकी आत्मा और चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

प्रार्थना और चिन्तन अलग अलग युग में और आज का स्वरूप, बहाई धर्म के अनुरूप भाग-1

 

क्रमश:-

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