संजीवनी टुडे

बहाई धर्म के अग्रदूत 'दिव्यात्मा बाब' का 170वां शहादत दिवस मनाया गया

संजीवनी टुडे 09-07-2020 16:21:56

स्थानीय आध्यात्मिक सभा, जयपुर द्वारा गुरुवार को बहाई धर्म के अग्रदूत दिव्यात्मा बाब का शहादत दिवस जूम एप के माध्यम से मनाया गया।


जयपुर। स्थानीय आध्यात्मिक सभा, जयपुर द्वारा गुरुवार को बहाई धर्म के अग्रदूत 'दिव्यात्मा बाब' का शहादत दिवस जूम एप के माध्यम से मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत हिंदी व अंग्रेजी भाषा में प्रार्थनाओं से होकर दिन की विशेष प्रार्थना राजेश मीणा द्वारा की गई। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता शिवचरण देव ने बताया कि 'दिव्यात्मा बाब' बहाई धर्म के ’अग्रदूत’ हैं। जिनका शाब्दिक अर्थ होता है 'द्वार' अर्थात् वह दरवाजा जहां से एक नये अवतार के साथ मानवजाती को एकता व शान्ति के सूत्र में पिरोने वाले धर्म का आगमन होगा। 

divatm bab

19वीं सदी के मध्य में उन्होंने यह घोषणा की कि वे एक ऐसे संदेश के वाहक हैं जो मानवजाति के आध्यात्मिक जीवन को बदल कर रख देगा। उनका मिशन था ईश्वर के एक द्वितीय संदेशवाहक के लिए मार्ग प्रशस्त करना जो उनसे भी कहीं अधिक महान होगा जो एक ऐसे युग में ले जायेगा,जो शान्ति और न्याय का होगा। 

divatm bab

स्थानीय आध्यात्मिक सभा के सचिव सहर हगीगत अनवरी ने बताया कि 'दिव्यात्मा बाब' वह युवा थे जिन्होंने प्रभु धर्म के खातिर मानव जाति के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया आज युवाओं को आवश्यकता है कि वे सत्य व ईश्वरीय द्वारा प्रदत मार्ग पर चलकर मानव जाति की सेवा में जुट जाएं और प्रभु धर्म के आदेशों का पालन करते हुए एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए प्रयासरत हो जाए। इस अवसर पर नियाज आलम अनंत द्वारा श्रद्धांजलि स्वरुप एक कविता सुनाई गई व बनवारी टाटावत, भागचंद बैरवा, कमल बैरवा व सुनील टाटावत द्वारा एक गीत प्रस्तुत कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

कौन थे दिव्यात्मा बाब
शिवचरण ने बताया कि 'दिव्यात्मा बाब' का जन्म 20 अक्टूबर को ईरान देश के शिराज नामक शहर मे हुआ था। 'दिव्यात्मा बाब ' बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के थे जहां इनको बचपन में ही इनके शिक्षक ने पढ़ने से मना कर दिया, क्योंकि बाब को ईश्वर का ज्ञान प्राप्त था। इसके बाद 23 मई 1844 को इन्होंने मुल्ला हुसैन के समक्ष अपने ईश्वरीय अवतार होने की घोषणा की, समय के साथ इनकी ख्याती फैलती गई और हजारों के संख्या में इनके अनुयायी बनने लगे जिनको कालान्तर में 'बाबी' कहा गया। 

divatm bab

इनकी फैलती ख्याती से डरकर वहां के सरकारी अधिकारियों व मुल्लाओ ने इनको जेल में बंद कर दिया व इनको अनेक यातनाएं दी गई। ऐसी यातनाएं जिनको सुनकर रूंह भी कांप उठे और अंत में शिराज के चौराहे पर एक सरकारी आदेश के अनुसार इस 31 वर्षीय युवा को 9 जुलाई 1850 को शहीद कर दिया गया। उन्हीं की याद में पूरी दुनिया मे 9 जुलाई को शहादत दिवस मनाया जाता है।

ऐसी ही ताजा खबरों व अपडेट के लिए डाउनलोड करे संजीवनी टुडे एप

More From bahaifaith

Trending Now
Recommended