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बड़ी बात: सरकार का रवैया हैरानी भरा

संजीवनी टुडे 29-11-2016 14:05:54

The government s attitude surprise

पहले विश्वविख्यात अर्थशास्त्री व चिंतक अमत्र्य सेन ने नालंदा विश्वविद्यालय से नौ साल पुराना अपना जुड़ाव खत्म किया फि र विश्वविद्यालय के चांसलर जॉर्ज यो ने पद से इस्तीफा दे दिया। इससे विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा है। साथ ही इस आरोप को बल मिला है कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को नष्ट किया जा रहा है। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना इस महत उद््देश्य से की गई थी कि इसकी प्राचीन विरासत और गौरव को बहाल करने के साथ-साथ पूर्वी एशिया से सांस्कृतिक तथा बौद्धिक मेलजोल बढ़ाने में मदद मिलेगी। जापान, सिंगापुर जैसे कई देशों ने शुरू से इसकी स्थापना में रुचि ली और वित्तीय मदद भी दी। अमत्र्य सेन नालंदा के विचार को मूर्त रूप देने में आरंभ से ही मार्गदर्शक की भूमिका निभाते रहे। वे इसके पहले चांसलर बने। फ रवरी 2015 में उन्होंने चांसलर पद छोड़ दिया। पर वे संचालन बोर्ड और नालंदा मार्गदर्शक ग्रुप के सदस्य भी थे। इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने में उनके जुड़ाव से खासी मदद मिली। लेकिन अब इस विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय साख खतरे में है। सिंगापुर के विदेशमंत्री रह चुके जॉर्ज यो को इस साल जुलाई में चांसलर नियुक्त किया गया था। उनके पद छोडऩे की वजह वही है जो सेन अलग होने की।


सरकार ने जिस तरह एक हफ्ते पहले वहां के संचालन बोर्ड का अचानक पुनर्गठन कर दिया वह स्वाभाविक ही न सेन के गले उतरा न यो के। उन्होंने इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर हमला माना। कायदे से संचालन बोर्ड का पुनर्गठन करने से पहले चांसलर यानी जॉर्ज यो से सलाह-मशविरा किया जाना चाहिए था। पर सरकार ने परामर्श करना तो दूर, उन्हें सूचित करने की भी जरूरत नहीं समझी। यही नहीं, विश्वविद्यालय के नेतृत्व में बदलाव करने यानी नए वाइस चांसलर की नियुक्ति की बाबत भी यो की राय नहीं ली गई। इस सब से यही जाहिर होता है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय सरकारी अनुदान आश्रित एक विश्वविख्यात अकादमिक संस्थान और सरकार के अधीन काम करने वाले एक विभाग में फ र्क नहीं करता या करना नहीं चाहता। ऐसे में अकादमिक स्वायत्तता कैसे बची रह सकती है। संस्थागत स्वायत्तता को कुचलने का यह पहला उदाहरण नहीं है। इससे पहले, कला संस्कृति की अनेक संस्थाओं से लेकर कई अकादमिक संस्थाओं के साथ यह हो चुका है। नालंदा विश्वविद्यालय के संचालन बोर्ड से मंत्रालय क्यों नाराज था, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।


बोर्ड के कई अकादमिक फैसलों से मंत्रालय खुश नहीं था और उसने अपनी नाखुशी सचिव के जरिए जाहिर भी की थी। पर बोर्ड ने लगभग आमराय से सरकार की आपत्तियों को खारिज कर दिया था। सरकार ने इसका बदला लिया, लगभग पूरे बोर्ड को बर्खास्त करके। यो को बार-बार आश्वस्त किया गया था कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। इसी आश्वासन पर वे चांसलर का पदभार संभालने को राजी हुए थे। पर अब जिस तरह विजिटर यानी राष्ट्रपति के जरिए सरकार ने संचालन बोर्ड को मनमाने तरीके से भंग किया है उस पर यो ने आश्चर्य जताया है। बोर्ड के अन्य पूर्व सदस्य भी हैरान हैं। पर दूसरी संस्थाओं के साथ हुए सलूक को याद करें तो शायद यह हैरानी का विषय नहीं है। सरकार के रवैये से यही लगता है कि उसका विश्वास नालंदा के विचार में नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय को नियंत्रित करने में है।

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