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शब्द की शक्ति का प्रभाव
sanjeevnitoday.com | Friday, September 15, 2017 | 08:03:49 AM
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डेस्क। जैसा हम पढ़ते है, देखते है, सुनते है, लिखते है और बोलते है वैसे ही हमारे मन मष्तिष्क में विचार आते है। इन सब में शब्द होते है जिसका प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया में प्रयोग होता है। ज्ञानियों ने शब्द को हथियार की संज्ञा दी है। कुछ उदाहरणों से हम इसके बारे में जान सकते है- 

'समाचार पत्रों में बहुत ताकत होती है क्योंकि वे शब्द की शक्ति का प्रयोग करते है। यदि वे इसका सही उपयोग करे तो प्रगति दिलाने में सहायक होंगे, नहीं तो वे नुकसान ही पहुंचाएंगे। समाचार पत्र जानकारी का बहुत ही अहम् स्त्रोत होते है और सच्चाई बयां करने की उन पर बड़ी जिम्मेदारी होती है।' 

बहाई लेखों में इस पर बताया गया है-
"तेजी से प्रकट होने वाले समाचार पत्रों के पन्ने वास्तव में संसार का दर्पण है। यह विविध लोगों एवं जनों के कार्यों व अनुसारणों को प्रतिबिंबित करते है जो सुनने, देखने और बोलने की शक्ति द्वारा प्रदत है। यह एक अद्भुत और प्रबल संवृन्ति है। फिर भी इसके लेखकों के लिए यह आवश्यक है कि वे दुष्ट मनोवेगों, मनोभावों और इच्छाओं से विशुध्द हो जाये और न्याय एवं समदृष्टि के परिधान को धारण करे। उन्हें परिस्थितियों के विषय में जितना भी संभव हो खोज करनी चाहिए और तथ्यों के अभिनिश्चयन के बाद ही उन्हें लेखनी में उतरना चाहिए।"

'संसार का दर्पण' इसमें बहुत ही उम्दा तुलना है समाचार पत्रों के पन्ने की। 'दर्पण वस्तुओं को ठीक उसी तरह प्रतिबिंबित करता है जैसी वे होती है। "क्या यही कारण है कि हम जो कुछ भी पढ़ते है उनमे से अधिकतर नकारात्मक होता है? क्योंकि संसार  इतनी दयनीय अवस्था में है।" परन्तु संसार में अभी कुछ सकारात्मक भी हो रहा है। हम जिस भाव को अधिक संवेदनवाद के द्वारा प्रस्तुत करेंगे वही भाव हमारे चारों  तरफ उभर कर आएगा। 

दूसरा उदाहरण हम विज्ञापन का लेते है, जिसने हमारे मस्तिष्क पर नियंत्रण कर लिया है। विज्ञापन की शुरुआत इस आधार पर हुई थी कि यह निर्धारण किया जा सके कि क्या खरीदना है और क्या नहीं? प्राचीन काल में यह सब हम केवल आपस में पूछकर या बातचीत से ही पता लगा पाते थे। अब दुर्भाग्य से कई विज्ञापन हमे केवल जानकारी ही नहीं देते। यह सही है कि वे हमे यह बताते है कि कौनसे उत्पादन उपलब्ध है, लेकिन साथ ही यह हमे वह मानने पर मजबूर करते है कि हमे उन चीजों की आवश्यकता है। एक शब्द है जिसे आप सब को जानना चाहिए 'छलयोजना'। इसका अर्थ है बिना कुछ समझे लोगों को एक खास तरीके में सोचने या कार्य करने के लिए विवश करना। 

बहुत सारे विज्ञापन जिन्हे हम देखते और सुनते है हमारी सोच को यह मानने के लिए चालाकी से प्रभावित करते है कि हमे उन चीजों की आवश्यकता है जिनकी हमे जरुरत नहीं होती। वे हमसे यह भी मनवा लेते है कि हानिकारक चीजे तक भी हमारे लिए अच्छी होती है। हम सभी रोजाना देखते है , सिगरेट, बीड़ी और शराब के विज्ञापन जिन्हे देख कर लगता है कि मर्द बनना इन उत्पादों पर ही निर्भर है। इत्र , साबुन, क्रीम यह सभी अभी से किशोरों और बच्चों में कामुकता के प्रति आकर्षण बढ़ा रहा है। आखिर एक दन्तमंजन का उपयोग क्या है? बस सब शब्दो का हेरफेर है, अब हम इसका दुसरा पहलु जान सकते है। जैसे- स्वास्थ्य सम्बन्धीत प्रचार जिनसे बहुत बिमारियों को होने से पहले ही रोेका जा सकता है, सफाई के लिए प्रचार, किसानो के बीज रोपण विधियों के लिए अभियान व प्रचार, मां व शिशु के पोषण के लिए जानकारी देना। दोनो मे शब्दो का इस्तेमाल है। 

’’प्रत्येक शब्द एक चेतना से प्रद्वत्त होता है। अतः वक्ता को अपने शब्दो का उपयुक्त समय और उपयुक्त स्थान पर ध्यान पूर्वक प्रस्तुत करना चाहिए। क्योकि प्रत्येक शब्द जो प्रभाव छोड़ता है वह पुर्णतयाः स्पष्ट और इन्द्रिय है। महान अस्तित्व कहते है: एक शब्द कि तुलना अग्नि से कि जा सकती है , दुसरे कि प्रकाश से, और जो प्रभाव दोनों डालते है वह सम्पुर्ण संसार मे सुस्पष्ट है।‘‘ 

कई बार हमारे गाड़ी के आगे अचानक से कोई आ गया अथवा भीड़ मे हमे धक्का लग गया या फिर बहुत सारे ऐसे क्षण जहाँ पर बिना सोचे समझे तीन चार गालियां निकल जाती है, तो क्या उस समय हम प्रत्येक शब्द बोलने से पहले सोचते नही? अपने परिवार मैं बात करते समय क्या हम परामर्श कि स्थिति मे नही रहतें? आप सभी दिनचर्या की गतिविधियों पर चिन्तन मनन कर सकते है। कबीर दास जी ने कहा है-
"बोली एक अनमोल है, जो कोई बोले जानि।  
हिये तराजु तोलि के, तब मुख बाहर आनि।"
"ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।"

 



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