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माँ-बाप की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म
sanjeevnitoday.com | Tuesday, July 18, 2017 | 03:59:39 AM
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अजमेर। कथा मर्मज्ञ रामदेवरा के संत स्वामी श्री मूल योगीराज ने कहा माँ-बाप की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है। यह सेवा करना हमारा धर्म है और जितना हमारे धर्म का पालन करेंगे, उतना सुख हमें उत्पन्न होगा। बुज़ुर्गों की सेवा तो होती है, साथ-साथ सुख भी उत्पन्न होता है। माँ-बाप को सुख दें, तो हमें सुख उत्पन्न होता है। माँ-बाप को सुखी करें, वे लोग सदैव, कभी भी दुखी होते ही नहीं है। माँ-बाप की जो पुत्र सेवा करेंगे, उन्हें कभी भी किसी प्रकार की कमी नहीं रहेगी, उनकी सारी ज़रूरतें पूरी होगी।


आजाद पार्क में चल रही रूणिचा वाले बाबा रामदेव की कथा के नवम दिवस सोमवार को कथा के दौरान संत स्वामी श्री मूल योगीराज ने कहा कि धर्म का साधारण, सीधा और सबसे उपयुक्त अर्थ है मानवता। धर्म वह है जो मानव को पशु से अलग कर मनुष्य को श्रेष्ठता प्रदान करता है। यदि मानव, मानव के रूप में अपने आप को अभिव्यक्त करना चाहता है तो ‘मानवता’ उस का अभिन्न अंग बन जाता है। धर्म मानव के जीवन की किसी एक ही पहलू से सम्बंधित नहीं वरन् पूरे ,मानव जीवन से, जीवन के एक-एक क्षण से सम्बन्ध रखता है। 


धर्म केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता उसका सम्बन्ध मानव समाज से, राष्ट्र से और पूरे विश्वभर के प्राणी मात्र से है। जिस मानव ने मानवता को, धर्म को अपनाए रखा, उसे सफलता प्राप्त हुई। धर्म मानव को कल्याण मार्ग का पथिक बनाता है। धर्म, मानव का एक अभिन्न अंग है, जिसके बिना मानव, मानव कहलाने के अधिकारी नहीं रह जाता।


संत स्वामी श्री मूल योगीराज ने कहा कि सेवा का साधारण अर्थ है कि दूसरों को ईश्वर का अंश मानते हुए उनकी भलाई के लिए कार्य करना। समस्त प्रकार की सेवा का फल मीठा होता है, पर सात्विक निष्काम सेवा से ही जीव को मोक्ष प्राप्त होता है। मान्यता स्वीकार कर लेनी चाहिए कि आदमी के अपने हाथ में कुछ नहीं है। जो कुछ है, यह विधि के हाथ में ही है। वही विश्वकर्ता, भर्ता और हरता सभी कुछ है। उसी की इच्छा-अनिच्छा और लीला का परिणाम है। यह दृश्य जगत। 


इस का कण-कण उसी से संचालित हुआ करता है। इसी और संकेत करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा था अपना भला बुरा मेरे अर्पित कर दो। तुम केवल कर्तव्य कर्म मेरा ही आदेश मानकर करते जाओ। सो कवि का भी यहां यही आशय है कि हानि-लाभ, यश-अपयश आदि सभी को भगवान के हाथ में मानकर अपने कर्तव्यों का पालन करते जाओ।


संत स्वामी श्री मूल योगीराज ने कहा कि जाति व्यवस्था समाज में एक अभिशाप है । इसने समाज को कई हिस्सों में बॉट दिया है ।जाति व्यवस्था ,इंसानो को बॉटकर उनका हमेशा शोषण किया जा सके इसके लिए कुछ लोगों ने अपना दिमाग लगाकर इसको बनाया, धर्म के नाम पर डराकर लागू कराया। देश में जातिगत भेदभाव सामाजिक रुप से खत्म किए जाने चाहिए और इसका विरोध किया जाना चाहिए। इस व्यवस्था को बदलने में नौजवानो, युवाओ को विशेष पहल करने की ज़रुरत है। 


हिंदू धर्म के अलावा अन्य धर्मो में पहले जाति व्यवस्था नहीं थी मगर जब ये धर्म हमारे देश में आये तो इन्हें ये व्यवस्था अच्छी लगी तो इसको मुसलमानों, ईसाईयो ने भी इस व्यवस्था को अपनाया। सभी धर्मो में जातिगत भेदभाव, धार्मिक स्थलो पर प्रवेश, धार्मिक ग्रंथो को पढ़ने जैसे भेदभाव पूरी तरह समात्त किये जाने चाहिए। ऐसे धर्म का कोई मतलब नहीं जो मनुष्य की मानवता का अनादर करता हो और जाति के नाम पर भेदभाव करता हो।


कथा के मध्य मे साध्वी शशि गौतम जी ने अपनी सुमधुर आवाज़ मे नंदलाला यशोमति के प्यारे, दर्शन देना प्राण पियारे, अंजनी के दुलारे आजा, परमवीर मेरे अब आजा, सहित अनेक भजन प्रस्तुत किये। पूर्ण लय-ताल और वाद्य यंत्रों की ध्वनि के साथ प्रस्तुत भजनों पर कथा मंडप में विराजित श्रोतागण भाव-विभोर होकर नाच उठे।
कथा आयोजक संस्था बाबा श्री रामदेव कथा समिति ने बताया कि सोमवार की कथा में पुनः समाधी खोदने पर कुछ नहीं मिलना, घोडा अदृश्य होना, समाधी की पूजा प्रारम्भ होना, बीज उपासना की विधि बताना और उन्होने चमत्कार दिखाना आदि प्रसंगों की प्रस्तुति दी गयी। मंगलवार की कथा में श्री हरजी भाटी से मिलना, अलख उपासना के प्रचार हेतु आदेश देना, हरजी द्वारा जोधपुर के राजा विजयसिंह के सामने कपडे के घोड़े को दाल खिलाना और पानी पिलाना, चमत्कार आदि का वर्णन किया जायेगा।


पार्षद एवं बाबा के परम भक्त महेंद्र मारु के अनुसार सोमवार की कथा में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव महेंद्र सिंह रलावता, कालीचरणदास खण्डेलवाल, नारीशाला बोर्ड की चेयरमेन भारती श्रीवास्तव, राजस्थान खेल परिषद के उपाध्यक्ष उमेश गर्ग, कुंदन वैष्णव, देवीलाल शर्मा, किशोर सैन, अविनाश मारोठिया, सुमित खण्डेलवाल, जीतेन्द्र धारू, अमरचंद भाटी, आदि विशेष रूप से पूजा और आरती मे उपस्थित थे।

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