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धर्म के सापेक्ष आचरण करने वाले व्यक्ति के जीवन में आती है खुशियां
sanjeevnitoday.com | Tuesday, October 10, 2017 | 01:41:03 AM
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हरिद्वार। श्रीगीता विज्ञान आश्रम के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती महाराज ने कहा है कि सनातन धर्म में पर्वो की प्रधानता है। दीपावली पर्व समाज में सुख-समृद्धि और उत्साह का समावेश करता है। समाज का जो व्यक्ति धर्म के सापेक्ष आचरण करता है, उसके जीवन में खुशियां आ जाती हैं। वह सोमवार को विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीता विज्ञान आश्रम में दैनिक सत्संग में आए भक्तों को धर्म की दीक्षा दे रहे थे।

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धर्मनगरी आने वाले सभी श्रद्धालुओं को धर्म के अनुरूप कर्म करने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि कर्म ही व्यक्ति का धर्म है और धर्म के अनुरूप जो कर्म करता है वही सत्कर्मों के पुण्यफल का भागी बनता है। धर्म के विपरीत आचरण करने वाला व्यक्ति कभी भी समाज में सम्मान का पात्र नहीं बनता है। धर्म और अर्थ को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बताते हुए उन्होंने कहा कि जब समाज में धन बढ़ता है तो धर्म की हानि होने लगती है और जहां धर्म सत्ता का वर्चस्व होता है वहां धन का अभाव होता है, लेकिन कुछ संत वेषधारी धर्म की आड़ लेकर धन संचय कर लेते हैं। वही उनके पतन का कारण बनता है। 


गीता मनीषी आचार्य श्याम ने संतत्व को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ तत्व बताते हुए कहा कि संत की शोभा उसकी सरलता से होती है और जो जितना अधिक सरल होता है वही सबसे बड़ा संत होता है। हृदय और वाणी की सरलता को संत का आभूषण और व्यवहारिक स्वरूप बताते हुए उन्होंने कहा कि संतत्व के मानदंड स्थापित करने वालों में गुरु नानकदेव, संत तुकाराम, स्वामी नामदेव, कबीर दास, रविदास, चैतन्य महाप्रभु और रामकृष्ण परमहंस जैसे महान संत गृहस्थ होते हुए भी परमहंस कहलाए, यह उनके संतत्व की महानता थी। 

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कोई भी व्यक्ति संत का वेष धारण करने से संत नहीं बनता क्योंकि संत का वेष तो रावण ने भी धारण किया था लेकिन संत रविदास ने पूरे विश्व को जो संदेश दिया, स्वामी दयानन्द सरस्वती और स्वामी विवेकानन्द ने जो मानक स्थापित किए उन्हीं को आज विश्व नमन करता है। सत्संग में आचार्य हरिओम, योगाचार्य शिवओम तथा दिनेश चंद्र शास्त्री ने भी विचार व्यक्त किए।

 

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