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धर्म-जाति के नाम पर न करें भेदभाव
sanjeevnitoday.com | Thursday, October 12, 2017 | 12:35:59 AM
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जींद। बच्चों में संस्कार भरने के लिए शुरू हुई कि संस्कारशाला मुहिम के तहत बुधवार के अंक में तीसरी से पांचवीं तक के बच्चों के लिए कहानी प्रकाशित हुई। दूसरों की मदद पर आधारित इस कहानी का सार यही है कि हमें हमेशा जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए। मुसीबत के समय हमें भी दूसरों की मदद की जरूरत पड़ सकती है।


बुधवार को सुप्रीम सीनियर सेकेंडरी स्कूल में शिक्षिका स्वाति ने छठी से आठवीं के बच्चों को यह कहानी पढ़कर सुनाई। सभी बच्चों ने बड़े ध्यान से कहानी को सुना। शिक्षिका ने कहानी सुनाने के बाद उसका सार बताते हुए कहा कि भगवान ने हमें इंसान के रूप में बनाया है। ¨हदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ये धर्म इंसान ने बनाए हैं, न कि भगवान ने। इंसान की पहचान उसके धर्म-जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्मो से होती है। बच्चों को कहानी सुनाते हुए शिक्षिका ने बताया कि राहुल को अपनी क्लास में पढ़ने वाला शफीक पसंद नहीं था, क्योंकि उसका दाखिला खास कोटे से हुआ था। 

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कोटे से दाखिल हुए छात्रों के साथ अन्य छात्र बात भी नहीं करते थे। रवि व महेश भी उसी कोटे से दाखिल हुए थे। दरअसल उनके स्कूल को शहर का सबसे महंगा स्कूल माना जाता था। राहुल पढ़ाई में अच्छा था और भाषण प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेता था। शफीक उसे हर क्षेत्र में टक्कर देने लगा। यह बात राहुल को अच्छी नहीं लगती थी। एक दिन राहुल के घर चोर घुस गए। वहीं फल की रेहड़ी लगाए हुए शफीक के पिता ने चोरों को देख लिया और दूसरे रेहड़ी वालों की मदद से उन्हें पकड़ कर पुलिस को बुला कर उन्हे सौंप दिया। 


इस दौरान शफीक के पिता के कंधे पर एक चोर ने चाकू से वार कर दिया, घायल होने के बावजूद शफीक के पिता वहीं डटे रहे। राहुल की मां शफीक व दूसरे रेहड़ी वालों को हाथ जोड़ कर धन्यवाद करते हुए कह रही थी कि जिन लोगों से उम्मीद थी, उनमें से कोई भी घर से नहीं निकला और जिन लोगों को वह जानती भी नहीं है, उन्होंने उसकी मदद की। राहुल यह सब देख रहा था और अपनी मां की बातें सुन कर उसका घमंड चकनाचूर हो गया। अब राहुल को अपनी सोच पर शर्म आ रही थी।

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