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क्या कहते है सियासी आंकड़े, जब टूटेगा महागठबंधन....
sanjeevnitoday.com | Sunday, July 16, 2017 | 08:14:21 AM
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नई दिल्ली। बिहार में महागठबंधन के बीच की डोर कच्ची होती जा रही है। इसका असर केवल बिहार की राजनीति ही नहीं, देश की राजनीति पर भी पड़ेगा। क्योंकि बिहार में जिस तरह से महागठबंधन ने विधानसभा चुनाव में कामयाबी हासिल की, इससे दूसरे राज्यों के क्षेत्रीय दलों में जोश भरा। 

 

बता दे की जब उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा की करारी हार हुई तब एक सवाल सामने खड़ा था कि अगर बिहार के तर्ज पर यूपी में सपा और बसपा साथ होते तो चुनाव परिणाम की तस्वीर कुछ और होती। 


अब सबसे बड़ी बात ये है की अगर नीतीश कुमार और लालू यादव अलग होते हैं तो फिर दोनों के लिए आगे के रास्ते आसान होंगे? या फिर यह फैसला दोनों के अस्तित्व को खतरे में डाल देगा? हां ये हो सकता है की इस लड़ाई में गठबंधन का टूटना नीतीश के लिए ज्यादा नुकसानदेह साबित हो। 


महागठबंधन से अगर नितीश कुमार अलग होते हैं तो उनके सामने विकल्प के तौर पर बीजेपी है। नीतीश बीजेपी के समर्थन से सत्ता में बने रहेंगे। लेकिन क्या वो 'मोदी युग' में बीजेपी के साथ होकर अपने फैसलों को बिहार में लागू कर पाएंगे। क्योंकि हाल के दिनों में जिन राज्यों में बीजेपी क्षेत्रीय दलों के साथ सत्ता में भागीदार रही, वहां क्षेत्रीय पार्टियां कमजोर हुई हैं। ऐसे में नीतीश के सामने बीजेपी के साथ गठबंधन चलाने के अलावा अपनी राजनीतिक जमीन को भी बरकरार रखने की चुनौती होगी।


दूसरी ओर नीतीश कुमार के निर्देश में महागठबंधन की सरकार ने बिहार में दो साल का सफर बिना किसी विवाद के तय किया है, जिससे नीतीश कुमार का बिहार के बाहर भी कद बढ़ा है। वहीं, अगर नितीश अलग होने का फैसला लेते है तो गैर-बीजेपी शासित राज्यों में नीतीश-लालू गठबंधन की तरह क्षेत्रीय पार्टियां एक मंच पर आने की सोच रही थीं, वो दूसरे राज्यों में महागठबंधन की नींव पड़ने से पहले खत्म ही ख़त्म हो जाएगी। खासकर उत्तर प्रदेश में इसका ज्यादा असर पड़ेगा।

 

 

वहीं, अगर बात करे लालू यादव की तो आखिरी वक्त तक महागठबंधन को बचाने की कोशिश करेंगे। हालांकि वो फिलहाल तेजस्वी के इस्तीफे पर समझौते से इनकार कर रहे हैं। लेकिन उन्हें पता है कि अगर नीतीश गठबंधन से अलग होते हैं तो आरजेडी के राजनीतिक अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो सकता है।

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