संजीवनी टुडे

News

बड़ी बात: न्याय के तकाजे में भाषा का पहलू

संजीवनी टुडे 01-12-2016 14:30:16

Demands for justice in the language factor

संभव है कि अपनी कार्यवाही में हिंदी के प्रयोग की इजाजत न देने का एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण का फैसला दर्ज नियमों के मुताबिक हो। लेकिन यह एक हैरान करने वाला फ रमान है। गौरतलब है कि हिंदी में दायर की गई एक याचिका को भ्रम का नतीजा बताते हुए अधिकरण ने साफ किया कि 2011 एनजीटी के चलन व प्रक्रिया नियमों के प्रावधान 33 के मुताबिक एनजीटी के काम केवल अंग्रेजी में होंगे। यानी अगर कोई अपने कागजात अंग्रेजी में तैयार नहीं करा पाता है तो उसकी याचिका को सुनवाई के योग्य नहीं माना जाएगा। जाहिर है, ऐसे नियम की मार उन लोगों को झेलनी होगी जो किन्हीं वजहों से अंग्रेजी में अपनी बात सामने नहीं रख पाते या फिर अपने दस्तावेज कानून की जटिल गुत्थियों वाली अंग्रेजी भाषा में तैयार नहीं कर पाते।

ऊपरी अदालतों में हिंदी में बहस या इसके प्रयोग को लेकर लंबे समय से बात उठती रही है। जिस देश की एक बड़ी आबादी हिंदी जानती-समझती है और उसमें भी ज्यादातर लोग जो सिर्फ  इसी भाषा में बोल और समझ सकते हैं, उनके लिए अदालतों में चलने वाली कार्यवाही और उनके आदेश एक तरह से दूसरे की मदद पर ही निर्भर होते हैं। लेकिन आजादी के करीब सात दशक के दौरान भी इस ओर ध्यान देने और हिंदी जानने-समझने वाली जनता की इस समस्या के हल के लिए शायद ही कोई पहल हुई हो। बल्कि इसी साल अप्रैल में जब देश की सभी अदालतों में संबंधित प्रांत की भाषा के प्रयोग को लेकर याचिका दाखिल की गई थी तो सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज करते हुए कहा था कि इसके लिए संविधान में ही बदलाव की मांग क्यों नहीं की जाती। यानी हो सकता है कि अपने कामकाज में सिर्फ  अंग्रेजी का प्रयोग करना एनजीटी के लिए भी बाध्यता हो, लेकिन अगर कोई व्यक्ति हिंदी में या किसी दूसरी भारतीय भाषा में अपनी बात रखना चाहे तो उसे सिर्फ  इसलिए न्याय से कैसे वंचित किया जा सकता है कि उसने अंग्रेजी में दस्तावेज तैयार नहीं कराए। अगर एक बेतुका नियम आड़े आ रहा है, तो उस नियम को हटा दिया जाना चाहिए।

अगर मौजूदा नियम के पीछे हिंदी में तैयार दस्तावेजों को समझने में आने वाली दिक्कत को कारण बताया जा रहा है तो क्या यही दलील केवल हिंदी समझने वाला भी अंग्रेजी की बाध्यता को लेकर नहीं दे सकता। क्या यह अदालत पहुंचने वाले को अनिवार्य रूप से अंग्रेजी के जानकारों पर या अंग्रेजी जानने-लिखने वाले वकील पर ही निर्भर बना देने की व्यवस्था नहीं है। सब जानते हैं कि हमारे देश में केवल अंग्रेजी भाषी लोगों की संख्या कितनी है। लेकिन ज्यादातर शीर्ष संस्थानों में कामकाज के लिए अंग्रेजी का प्रयोग वैसे तमाम लोगों को, जो अंग्रेजी नहीं समझते। दूसरों पर निर्भर होने को मजबूर कर देता है। जहां तक न्यायपालिका का सवाल है तो निचली अदालतों में भाषा के लिहाज से थोड़ी राहत होती है, लेकिन ऊपरी अदालतों में केवल अंग्रेजी का प्रयोग मुवक्किलों को कार्यवाही से लेकर बहस के सभी संदर्भों को समझने से वंचित कर देता है। वादी-प्रतिवादी को आमतौर पर सिर्फ  फैसला समझा दिया जाता है। जबकि वहां प्रांतीय भाषा में काम हो तो वे शुरू से लेकर अंत तक, समूची कार्यवाही खुद समझ सकते हैं। न्याय के तकाजे में भाषा का पहलू भी शामिल किया जाना चाहिए।

यह भी पढ़े...बड़ी बात: विपक्ष सड़क पर एकजुट नहीं

यह भी पढ़े...बड़ी बात: सरकार का रवैया हैरानी भरा

More From editorial

loading...
Trending Now
Recommended