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राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का एलान और भाजपा का दलित दांव

Sanjeevni Today 20-06-2017 15:54:47

नई दिल्ली। काफी समय की अटकलों के बीच एनडीए ने अपना राष्ट्रपति उमीदवार घोषित कर दिया है। राष्ट्रपति पद के लिए अधिसूचना आने के बाद से विपक्ष और भाजपा में उम्मीदवार को लेकर काफी गहमागहमी थी। प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार भी अपने फैसले से चौंकाया है और ऑफ़ द लाइन जाकर अपना प्रत्याशी घोषित किया है। इससे पूरा विपक्षी खेमा बँट गया है और नहीं लगता की वो अब एकजुट होने का प्रयास करेगा। भाजपा के दलित दांव लगाने के बाद विपक्षी एकजुटता नहीं बन सकती है। हालांकि मीरा कुमार और प्रकाश आंबेडकर के नाम सामने आ रहे है परन्तु पूरा विपक्ष एक साथ होगा इसका कोई आसार अभी तक नहीं लग रहा है। 

रामनाथ कोविंद हमेशा से भाजपा से जुड़े रहे है। उन्हें वकालत का भी काफी ज्ञान है वो भी उनकी उम्मीदवारी के लिए एक फैक्टर रहा है। कानपूर के पास एक गांव में जन्मे रामनाथ कोविंद ने बिहार के राजयपाल के रूप में भी अच्छा काम किया है। जब उन्हें तीन साल पहले राजयपाल बनाया गया था तब ये बात उठी थीं की दिल्ली तरह वहां भी सीएम के साथ विवाद होगा लेकिन सबसे पहले प्रशंसा करने वालों में नीतीश कुमार सामने आये। हमेशा सादगी के लिए प्रसिद्द रहे रामनाथ कोविंद कोली जाति से सबंध रखते हैं जो कि उत्तरप्रदेश में एक एसटी जाति है। वे कोली समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके है। जब वो राजयसभा में थे तब कई संसदीय समितियों के सदस्य रहे थे उनमे अनुसूचित जाति जनजाति समिति में काम किया। जब मोरारजी भाई देसाई प्रधानमंत्री थे तब वो उनके सलाहकार भी थे। इस तरह से वकालात से लेकर सुप्रीम कोर्ट में सरकारी वकील रहना और राजयपाल के रूप में सेवा देना निश्तित रूप से राष्ट्रपति के उम्मीदवार निर्धारण में सही साबित हुआ। 

भाजपा ने दलित दांव खेलकर रामनाथ कोविंद को जिस तरह से उम्मीदवार बनाया है उससे यही लग रहा है की पार्टी अपनी दलित छवि सुधारने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने जिस तरह से प्रत्याशी खड़ा करने में चौंकाया है उससे पूरा विपक्ष अभी एकजुट होने की स्थिति में नहीं है। इससे पहले विपक्ष महागठबंधन बनाने के लिए अपना साझा प्रत्याशी खड़ा कर रहा था परन्तु अब लगभग बीजेपी के उमीदवार की जीत लगभग तय लग रही है। भाजपा अपनी दलित राजनीति में पैठ बनाना चाहती है ये पिछले काफी समय से चल रहा है। दलित राष्ट्रपति बनाकर ये भी कहा जा रहा है वो आने वाले लोकसभा चुनाव में दलित वोट बैंक सेंध लगाना चाहती है। हालाँकि कई जानकार ये भी कहते है की रामनाथ कोविंद की छवि कभी भी दलित भलाई वाली नहीं रही है।

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