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जानें थावरचंद की जगह कोविंद क्यूँ बने मोदी की पहली पसंद
sanjeevnitoday.com | Monday, June 19, 2017 | 06:47:16 PM
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नई दिल्ली। राष्ट्रपति पद की दावेदारी को लेकर लगभग पिछले एक साल से अनेक पार्टियों, संघो द्वारा कई प्रकार के कायस्त लगाए जा रहे थे। इस दावेदारी को लेकर एनडीए सरकार व संघ के भीतर उम्मीदवार को लेकर विचार होता रहा है। जिस में एक नाम थावर चंद गहलोत का भी था। उम्मीद लगाई जा रही थी कि मोदी शायद राष्ट्रपति पद के लिए किसी दलित नेता को चुनने वाले है, जिसमे सबसे ऊपर नाम थावर चंद गहलोत का था। 

 

बता दे कि थावर चंद गहलोत एमपी प्रदेश से बीजेपी सांसद है और दलित समुदाय से भी तालुक रखते है और वर्तमान में एमडीए सरकार में सामाजिक न्याय एवं सहकारिता मंत्री पद पर कार्यरत है। भाजपा की राजनीति का गणित अलग ही है क्योकि पार्टी में दलित चहरे तो है पर उतने चर्चित नहीं है, जो चर्चित है उनमे थावर चंद गहलोत का नाम सबसे ऊपर है। 

थावर चंद गहलोत का नाम जब सबसे ऊपर था तो ऐसा क्या हुआ कि एमपी प्रदेश की जगह मोदी ने कानपुर के एक अन्य दलित चेहरे को अपनी पसंद बनाया। मोदी राजनीति में अपनी सूची वहां से शुरू करते हैं जहां से लोगों के कयासों की सूची खत्म होती है। जिन नामों पर लोग विचार करते हैं, ऐसा लगता है कि मोदी उन नामों को अपनी सूची से बाहर करते चले जाते हैं। उनकी यह नीति ही सबसे हटकर साबित होती है। 

क्यों हुआ रामनाथ कोविंद का चयन
रामनाथ कोविंद स्वयंसेवक होने के साथ बीजेपी के पुराने नेता भी है और संघ और भाजपा में कई प्रमुख पदों पर अपना कार्यभार भी समाल चुके है। यह बीजेपी से सांसद, एससीएसटी प्रकोष्ठ के प्रमुख का दायित्व और संगठन की मुख्यधारा की ज़िम्मेदारियां भी निभा चुके है। वे दलित समुदाय में आने वाले कोरी समाज से तालुक रखते है। यानी उत्तर प्रदेश में दलितों की तीसरी सबसे बड़ी आबादी, पहली जाटव और दूसरी पासी है। 

शैक्षणिक स्तर
अगर कोविंद की शिक्षा को लेकर बात की जाये तो वह काफी पढ़े-लिखे हैं, कई भाषाओं का ज्ञान भी है, इन सब के साथ उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता के तौर पर एक अच्छा खासा अनुभव है और सरकारी वकील भी है। हमारे देश के राष्ट्रपति पद के लिए जो मूलभूत योग्यताए होनी चहिये वह उनमे मौजूद है। वह व्यवहारी रूप से मृदुभाषी, कम बोलने वाले व शांत प्रकर्ति के व्यक्ति है।

क्यों करते है मोदी ऐसे लोगो का चयन 
योगी को छोड़ कर मोदी उन व्यक्तियों का चयन करते आये है जो बोलें कम और सुनें ज़्यादा। शांत लोग मोदी को पसंद आते हैं क्योंकि वो समानांतर स्वरों को तरजीह देने में यकीन नहीं रखते। संघ भी इस नाम से खुश है क्योंकि कोविंद की जड़ें संघ में निहित हैं। 

प्रदेशिक स्तर पर बदलाव 
अगर हम प्रदेशिक स्तर पर बात करे तो कोविंद उत्तर प्रदेश से आते हैं और मोदी के लिए राजनीतिक रूप से मध्य प्रदेश के दलित की जगह उत्तर प्रदेश के दलित को चुनना हर लिहाज से फायदेमंद है। कोविंद के साथ नीतीश का तालमेल भी अच्छा है। उत्तर प्रदेश से होना और बिहार का राज्यपाल होना दोनों राज्यों में सीधे एक संदेश भेजता है। यह संदेश मध्यप्रदेश से जाता तो शायद इतना प्रभावी न होता। 

मोदी राजनीति में जिन जगहों पर अपने लिए अधिक संभावना देख रहे हैं उनमें मध्यप्रदेश से कहीं आगे उत्तर प्रदेश का नाम है। बिहार मोदी के लिए एक अभेद्य दुर्ग है और वहां भी एक मज़बूत संदेश भेजने में मोदी सफल रहे। थावरचंद की जगह कोविंद का चयन मोदी के हक में ज्यादा बेहतर और उचित फैसला साबित होगा। 



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