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अलग गोरखालैंड राज्य की मांग में कितना है दम
sanjeevnitoday.com | Tuesday, June 20, 2017 | 05:33:52 PM
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दार्जिलिंग।  भारत में अलग राज्य बनाने की मांग कोई पुरानी बात नहीं है। सबसे पहले देश में अलग राज्य भाषायी आधार पर बने थे जिसमे यह मांग उठी थी की भाषा के आधार पर राज्यों को बनाया जाये। उसके बाद इस बात पर ज्यादा जोर रहा की क्षेत्रीय विविधता के आधार राज्यों का बंटवारा किया जाये। इस तरह से हरयाणा और अन्य राज्य बने। नए राज्य बनाने के लिए कई बार आंदोलन हुए यही जिसमे तेलंगाना का उदाहरण सामने है। ताजा स्थिति को देखें तो पशिचमी बंगाल में अलग गोरखालैंड बनाने की मांग की जा रही है। गोरखा लोगों की मांग काफी समय से चली आ रही है। इससे पहले 1986 में गोरखा मूवमेंट हुआ था जिसमे लगभग 1500 लोग मारे गए थे। अब आंदोलन की शुरुआत दरअसल ममता बनर्जी के एक आदेश जिसमे स्कूलों में बंगाली भाषा को अनिवार्य करने हुई है। दार्जिलिंग के लोग ये नहीं चाहते की उनके बच्चों को बंगाली अनिवार्य रूप से पढ़नी पड़े। इस घोषणा के बाद ही गोरखालैंड आंदोलन शुरू हुआ था। 

गोरखा आंदोलन विकास और संस्कृति के मुद्दे पर नहीं यह पहचान के लिए ज्यादा चलाया जा रहा है। अपनी अलग पहचान के लिए ही गोरखालैंड आंदोलन दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूच बिहार जिलों को अलग करने के लिए चला रहे है। ये एक अलग राज्य बनाए की मांग कर रहे है। गोरखा आंदोलन भारत की आजादी से भी पुराना है जिसमे 1935 में सिक्किम से गोरखालैंड को बंगाल में जोड़ दिया गया था। गोरखाओं पर यह आरोप लगता है की वो विदेशी है क्योंकि ये नेपाल से आये थे। भारत नेपाल संधि की वजह से भी आजादी के बाद यह आंदोलन तेजी से शुरू हुआ था। हालाँकि बाद में आठवीं अनुसूची में नेपाली भाषा को 1992 में डाला गया था।  इस तरह से विकास के नाम पर होने वाला गोरखा आंदोलन वास्तव में पहचान (आइडेंटिटी) का आंदोलन जिसमे गोरखा ये मानते है की अलग राज्य का निर्माण ही उनकी पहचान साबित करेगा। इसके लिए ही वर्तमान में क्लास 1 से 9 तक बंगाली भाषा के अनिवार्य किये जाने खिलाफ ये आंदोलन हुआ है। अलग गोरखालैंड बनाना सरकार के लिए इतना आसान नहीं होगा क्योंकि दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी का इतना क्षेत्र नहीं है एक अलग राज्य बन सकें। प. बंगाल सरकार को ही आगे आकर गोरखालैंड मांग पर बातचीत से हल निकला जाना चाहिए।  केवल अपनी पहचान की राजनीती के लिए अलग राज्य बनाना आसान नहीं है। गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के नेताओं के साथ सरकार उनकी मांगो पर विचार करे और बंगाली भाषा को अनिवार्य रूप से नहीं थोपे। 



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